सिलिगुड़ी: उत्तर बंगाल के संकटग्रस्त चाय उद्योग को मंदी के दौर से बाहर निकालने के लिए चाय बागान मालिकों और छोटे उत्पादकों ने कमर कस ली है। राज्य में नवगठित 'डबल इंजन' सरकार से उम्मीदें लगाए नॉर्थ बंगाल टी प्रोड्यूसर्स वेलफेयर एसोसिएशन' और कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन स्मॉल टी ग्रोअर्स एसोसिएशन के पदाधिकारी अगले महीने मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक करने की तैयारी में हैं। चाय व्यापारियों की मांग है कि असम की भाजपा सरकार की तर्ज पर उत्तर बंगाल के चाय बागानों का भी कायाकल्प किया जाए।
चाय उत्पादकों के एक बड़े हिस्से का मानना है कि पिछली ममता बनर्जी सरकार उत्तर बंगाल के बीमार चाय उद्योग को बचाने में पूरी तरह विफल रही थी। आरोप है कि उस समय राज्य सरकार ने केंद्र के साथ टकराव की नीति अपनाकर स्थिति को और पेचीदा बना दिया था। 'चाय सुंदरी' जैसी राज्य सरकार की योजनाएं जमीन पर पूरी तरह फ्लॉप साबित हुईं और चाय श्रमिकों को जमीन का पट्टा देने के नाम पर असंतोष और बढ़ गया। न्यूनतम मजदूरी और कच्चे पत्तों के सही दाम जैसे वास्तविक मुद्दों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।
जून में मुख्यमंत्री से होगी निर्णायक बातचीत
'कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन स्मॉल टी ग्रोअर्स एसोसिएशन' के अध्यक्ष विजयगोपाल चक्रवर्ती ने कहा:
"हम जून महीने में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के साथ बैठक करेंगे। हमारी मुख्य मांग यह है कि पश्चिम बंगाल में भी असम की तरह ही क्रांतिकारी कदम उठाए जाएं। केंद्र सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का सीधा लाभ असम के चाय बागानों को मिल रहा है, जिसे पिछली बंगाल सरकार ने रोक रखा था।"
उन्होंने आगे बताया कि प्रधानमंत्री आवास और स्वास्थ्य योजनाओं के जरिए असम में चाय श्रमिकों के इलाज, आवास और उनके बच्चों की शिक्षा के लिए अभूतपूर्व काम हुआ है। चुनावी अभियान के दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी वादा किया था कि असम में चाय श्रमिकों को राशन के साथ ₹280 दैनिक मजदूरी मिलती है और वहां बागान बंद नहीं होने दिए जाते।
वहीं, 'वेस्ट बंगाल यूनाइटेड फोरम ऑफ स्मॉल टी ग्रोअर्स' के चेयरमैन रजत कार्जी ने भी इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि केंद्र और राज्य के संयुक्त प्रयासों से असम का चाय उद्योग तेजी से आगे बढ़ रहा है। विजयगोपाल चक्रवर्ती के मुताबिक, चाय उद्योग के विकास के लिए केंद्र सरकार की योजनाओं के 314 करोड़ रुपये राज्य को मिलने वाले हैं, जिससे उत्तर बंगाल में असम की तरह ही कई चाय बागानों को मिलाकर बड़े अस्पताल और स्मार्ट क्लास वाले स्कूल शुरू किए जा सकते हैं।
संकट में दार्जिलिंग चाय का गौरव, बिकने की कगार पर 25 बागान
चाय संगठनों की इस बैठक में केवल तराई या डुआर्स ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर मशहूर 'दार्जिलिंग चाय' के अस्तित्व को बचाने की भी गुहार लगाई जाएगी।दार्जिलिंग चाय पर मंडराता खतरा: दार्जिलिंग पहाड़ियों में जीआई (GI) टैग प्राप्त कुल 87 चाय बागान हैं, जिनमें से कम से कम 15 बागान इस वक्त पूरी तरह बंद पड़े हैं। बाकी बचे बागानों में 100 से 150 साल पुराने पौधे हैं, जिससे उत्पादन लगातार घट रहा है। भारी घाटे के कारण बागान मालिक नए पौधे लगाने का जोखिम नहीं उठा पा रहे हैं। हालात इतने बदतर हैं कि लगभग 25 चाय बागानों के मालिक अब खरीदार (ग्राहक) ढूंढ रहे हैं।
इसके अलावा, पिछले दो दशकों में दार्जिलिंग पहाड़ियों में बारिश में करीब 20 प्रतिशत की गिरावट आई है। इस जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण 'सिल्वर नीडल व्हाइट टी' समेत दार्जिलिंग चाय का उत्पादन पिछले साढ़े पांच दशकों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। चाय व्यापारी इस संकट से निपटने के लिए मुख्यमंत्री के सामने एक अत्याधुनिक चाय अनुसंधान केंद्र (Research Centre) स्थापित करने का प्रस्ताव भी रखेंगे।
भाजपा के चुनावी घोषणापत्र पर टिकी उम्मीदें
गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा जारी किए गए भाजपा के चुनावी संकल्प पत्र में वादा किया गया था कि दार्जिलिंग की पुरानी कनियों (पौधों) को बदलकर वैज्ञानिक तरीके से उच्च उपज देने वाले पौधे लगाए जाएंगे। साथ ही, जैविक (कीटनाशक मुक्त) चाय उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष एक्सपोर्ट सेंटर बनाया जाएगा, जहां गुणवत्ता की जांच हो सके। अब राज्य में सुवेंदु सरकार के आने और मुख्यमंत्री द्वारा उत्तर बंगाल दौरे पर दिए गए सकारात्मक संकेतों के बाद चाय उद्योग को एक नई संजीवनी मिलने की उम्मीद जगी है।