कोलकाता: पश्चिम बंगाल की अट्ठारहवीं विधानसभा के भीतर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर की बगावत ने अब राज्य की पूरी संसदीय व्यवस्था को पलट कर रख दिया है। दो दिन पहले ही सांगठनिक अनुशासनहीनता और दल-विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बंद्योपाध्याय (Ritabrata Banerjee) अब विधानसभा में अधिकारिक रूप से विपक्ष के नेता (LoP) बन गए हैं।
बुधवार दोपहर को करीब 35 बागी विधायकों ने सशरीर उपस्थित होकर विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) रथींद्र बोस को कुल 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाली चिट्ठी सौंपी थी। इस बहुमत को स्वीकार करते हुए स्पीकर ने ऋतब्रत बंद्योपाध्याय के नाम पर मुहर लगा दी है। मान्यता मिलने के तुरंत बाद विधानसभा परिसर में नेता प्रतिपक्ष का आधिकारिक कमरा खोलकर उन्हें सौंप दिया गया।
ममता बनर्जी की पसंद को बागियों ने किया 'खारिज'
यह घटनाक्रम सीधे तौर पर टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी के फैसलों को बड़ी चुनौती है। दरअसल, ममता बनर्जी ने इस पद के लिए वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष, असीमा पात्रा और नयना बंद्योपाध्याय को उप-नेता और फिरहाद हकीम को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाने का मन बनाया था। लेकिन, विद्रोही विधायकों ने ममता बनर्जी की इस पूरी लिस्ट को दरकिनार करते हुए ऋतब्रत को अपना बॉस चुन लिया।
स्पीकर को दी गई चिट्ठी में बागी गुट ने अपनी नई टीम की घोषणा की है:
नेता प्रतिपक्ष: ऋतब्रत बंद्योपाध्याय
उप-नेता (डेप्युटी लीडर): श्यूली साहा, जावेद खान और संदीपन साहा
मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप): रघुनाथगंज के विधायक अखरुজ্জামান
"ममता बनर्जी हमारी नेत्री, लेकिन अभिषेक बनर्जी से कोई रिश्ता नहीं"
नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी संभालने के बाद एक भीड़भाड़ वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऋतब्रत बंद्योपाध्याय ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लेकर अपनी नीति साफ की। उन्होंने चालाकी भरा रुख अपनाते हुए कहा:"हम अभी 58 लोगों की टीम हैं, जो जल्द ही बढ़कर 60 होने वाली है क्योंकि कुछ विधायक राज्य से बाहर हैं। हमारी नेत्री आज भी ममता बनर्जी ही हैं। हम उनसे अनुरोध करते हैं कि वह हमारी मुख्य सलाहकार (परामर्शदाता) बनें और संसदीय दल को अपना मार्गदर्शन दें। लेकिन, एक बात मैं बहुत साफ कर दूँ— इस 18वीं विधानसभा से अभिषेक बनर्जी का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है।"
ऋतब्रत ने आगे कहा कि बंगाल की जनता ने हमें विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है और हम उसका सम्मान करते हैं। मैं यहाँ कोई 'बॉस' बनकर काम नहीं करूँगा, हम सब मिलकर लोकतांत्रिक तरीके से फैसले लेंगे। हम सदन से वॉक-आउट करके सत्तापक्ष को फायदा पहुंचाने वाली 'कमजोर' विपक्ष की भूमिका नहीं निभाएंगे, बल्कि एक जिम्मेदार और रचनात्मक विरोध करेंगे।
अभिषेक बनर्जी के 'कब्जे' के खिलाफ बगावत: श्यूली साहा
बागी खेमे की कद्दावर नेता श्यूली साहा ने भी इस मौके पर सीधे तौर पर टीएमसी के भीतर जारी तानाशाही पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, "हम ममता बनर्जी के सैनिक थे, हैं और हमेशा रहेंगे। लेकिन जब पूरी पार्टी को कोई और (अभिषेक बनर्जी) अपने कब्जे में लेने की कोशिश करेगा, तो हम उसे कतई स्वीकार नहीं करेंगे। हम पार्टी के भीतर एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था चाहते थे, जिसके लिए यह कदम उठाना जरूरी था।
बुधवार सुबह से ही विधानसभा में बागियों की तरफ से भारी हलचल देखी गई। श्यूली साहा, सबीना यास्मिन, अखारुज्जमान, चंद्रनाथ सिन्हा, अरूप रॉय और जावेद खान जैसे अलग-अलग जिलों के कद्दावर टीएमसी विधायक सुबह ही विधानसभा पहुंच गए थे। इस विद्रोह ने न सिर्फ विधानसभा के गणित को बदल दिया है, बल्कि टीएमसी के भविष्य के सांगठनिक ढांचे को भी गहरे संकट में डाल दिया है।