तृणमूल कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम पिछले कई वर्षों का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट माना जा रहा है। पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें पहले से सामने आ रही थीं, लेकिन अब मामला खुली बगावत तक पहुंच गया है। बागी सांसदों का दावा है कि लगभग 20 लोकसभा सांसदों ने एक अलग संसदीय समूह बनाने का फैसला किया है और इसके संबंध में लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भी भेजा गया है। यदि यह दावा पूरी तरह सही साबित होता है तो यह तृणमूल कांग्रेस के संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा विभाजन माना जाएगा। इस घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी नेतृत्व के सामने संगठनात्मक एकता बनाए रखने की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
एनडीए को समर्थन देने का किया दावा
बागी खेमे की ओर से दावा किया गया है कि सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन देने का निर्णय लिया है। बागी नेताओं का कहना है कि उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को अपने रुख से अवगत करा दिया है और संसद में अलग पहचान के साथ बैठने की भी मांग की है। विद्रोही सांसदों का तर्क है कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों और जनता के जनादेश को देखते हुए उनका भविष्य का राजनीतिक मार्ग एनडीए के साथ होना चाहिए। इस घोषणा ने राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल बढ़ा दी है क्योंकि इससे संसद के शक्ति संतुलन पर असर पड़ सकता है।
काकोली घोष दस्तीदार बनीं बगावत का चेहरा
इस पूरे घटनाक्रम में सांसद काकोली घोष दस्तीदार सबसे प्रमुख चेहरा बनकर उभरी हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया है कि लगभग 20 सांसद उनके साथ हैं और सभी ने मिलकर अलग संसदीय गुट बनाने का निर्णय लिया है। बागी खेमे के अनुसार, काकोली घोष दस्तीदार इस नए समूह की प्रमुख भूमिका निभाएंगी, जबकि अन्य वरिष्ठ सांसद भी संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभालेंगे। बागी सांसदों का कहना है कि यह कदम किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के कारण नहीं बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठाया गया है।
‘असली टीएमसी’ होने का दावा, बढ़ी कानूनी लड़ाई की संभावना
बागी सांसदों ने खुद को ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ बताने का दावा भी किया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि दो-तिहाई सांसद वास्तव में बागी गुट के साथ होते हैं, तो दल-बदल कानून और संसदीय मान्यता को लेकर कानूनी बहस शुरू हो सकती है। सूत्रों के अनुसार, बागी सांसद फिलहाल पार्टी से इस्तीफा दिए बिना अलग संसदीय समूह के रूप में कार्य करना चाहते हैं। इससे आने वाले दिनों में लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि उन्हें संसदीय नियमों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर निर्णय लेना होगा।
टीएमसी नेतृत्व ने दावों पर उठाए सवाल
दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक नेताओं ने बागी खेमे के दावों को चुनौती दी है। पार्टी नेताओं का कहना है कि 20 सांसदों के समर्थन का दावा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है और कई सांसदों ने ऐसे किसी पत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया है। पार्टी का आरोप है कि विरोधी दल तृणमूल कांग्रेस को कमजोर करने के लिए भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ वरिष्ठ नेताओं ने बागी सांसदों को ‘विश्वासघाती’ तक करार दिया है और कहा है कि पार्टी इस संकट का मजबूती से सामना करेगी।
बंगाल से दिल्ली तक फैल गया राजनीतिक संकट
पश्चिम बंगाल में हाल के दिनों में विधायकों के असंतोष और संगठनात्मक विवादों की खबरें पहले ही चर्चा में थीं। अब संसद में सांसदों की बगावत ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह विभाजन औपचारिक रूप लेता है तो इसका असर केवल पश्चिम बंगाल की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति और संसद के समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है। आने वाले दिनों में ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और बागी सांसदों के अगले कदम पर पूरे देश की नजरें टिकी रहेंगी।