मुम्बई. 13 अगस्त 1933 को तत्कालीन मद्रास में जन्मीं वैजयंतीमाला ने बहुत कम उम्र में नृत्य और अभिनय की दुनिया में कदम रख दिया था। उन्होंने तमिल फिल्म ‘वाजकाई’ से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की और इसके बाद हिन्दी सिनेमा में ‘बहार’ के जरिए राष्ट्रीय पहचान बनानी शुरू की। नृत्य की गहरी साधना, प्रभावशाली व्यक्तित्व और कैमरे के सामने असाधारण आत्मविश्वास ने उन्हें अपने दौर की दूसरी अभिनेत्रियों से अलग खड़ा किया। 1950 और 1960 के दशक में वह हिन्दी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय और सर्वाधिक पारिश्रमिक पाने वाली अभिनेत्रियों में शामिल रहीं। भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में उनके योगदान को पहले पद्म श्री और बाद में वर्ष 2024 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया।
‘देवदास’ से ‘गंगा जमुना’ तक, अभिनय की मिसाल बनीं
वैजयंतीमाला का करियर केवल ग्लैमर और नृत्य तक सीमित नहीं था। ‘नागिन’ की सफलता के बाद बिमल रॉय की ‘देवदास’ में चंद्रमुखी की भूमिका ने यह साबित कर दिया कि वह गंभीर और जटिल चरित्रों को भी उतनी ही प्रभावशाली ढंग से निभा सकती हैं। इसके बाद ‘नया दौर’, ‘आशा’, ‘गंगा जमुना’, ‘मधुमती’, ‘लीडर’ और ‘ज्वेल थीफ’ जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी। अभिनय के साथ उनका नृत्य कौशल उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया और यही वह संयोजन था जिसने उन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास में विशिष्ट स्थान दिलाया। उनके अभिनय और नृत्य की शैली ने आगे आने वाली अभिनेत्रियों के लिए भी एक नया मानदंड स्थापित किया।
‘संगम’ ने रचा नया इतिहास और बढ़ीं चर्चाओं की परतें
राज कपूर की वर्ष 1964 की फिल्म ‘संगम’ वैजयंतीमाला के करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में रही। फिल्म में राज कपूर और राजेंद्र कुमार के साथ उनकी भूमिका ने दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ा। फिल्म अपने समय की महंगी और भव्य प्रस्तुतियों में शामिल थी तथा विदेशों में फिल्मांकन के कारण भी चर्चा में रही। इसी फिल्म से जुड़े कुछ दृश्यों ने उस दौर के सामाजिक वातावरण में हलचल पैदा की और वैजयंतीमाला के आधुनिक स्क्रीन व्यक्तित्व को लेकर बहस छिड़ी। लेकिन ‘संगम’ की चर्चा केवल फिल्म तक सीमित नहीं रही; राज कपूर के साथ उनके कथित संबंधों की खबरों ने भी लंबे समय तक सुर्खियां बटोरीं।
राज कपूर से रिश्ते की कहानी पर आज भी दो अलग दावे
वैजयंतीमाला की निजी जिंदगी का सबसे चर्चित अध्याय राज कपूर से कथित प्रेम संबंध रहा है। अपनी आत्मकथा ‘बॉन्डिंग’ में वैजयंतीमाला ने इस रिश्ते की चर्चाओं को खारिज करते हुए कहा था कि उन्हें राज कपूर से जोड़ना प्रचार की रणनीति का हिस्सा था और उनके बीच वैसा कोई संबंध नहीं था। लेकिन कपूर परिवार की ओर से सामने आई स्मृतियों ने इस दावे को अलग दृष्टिकोण दिया। ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि उनके पिता और वैजयंतीमाला के संबंधों को लेकर उस समय परिवार में गंभीर तनाव पैदा हुआ था और उनकी मां कृष्णा कपूर बच्चों के साथ कुछ समय के लिए घर से अलग रहने चली गई थीं। इस पूरे प्रसंग में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि दोनों पक्षों के दावे अलग रहे हैं, इसलिए इसे निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य के बजाय उस दौर से जुड़ी परस्पर विरोधी स्मृतियों और सार्वजनिक चर्चाओं के रूप में देखना अधिक उचित है।
कृष्णा कपूर के घर छोड़ने की कहानी ने विवाद को और गहरा किया
राज कपूर और वैजयंतीमाला को लेकर चली चर्चाओं का असर कपूर परिवार तक पहुंचने का दावा ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा में किया था। उनके अनुसार एक समय उनकी मां कृष्णा कपूर बच्चों के साथ अलग रहने चली गई थीं और वह तब तक वापस नहीं लौटीं, जब तक राज कपूर ने कथित रूप से उस अध्याय को समाप्त नहीं किया। इस प्रसंग ने वैजयंतीमाला से जुड़ी अफवाहों को उस समय के फिल्मी गलियारों में और अधिक हवा दी। हालांकि वैजयंतीमाला की अपनी आत्मकथा में इन दावों का अलग पक्ष सामने आता है। यही विरोधाभास इस कहानी को आज भी भारतीय फिल्म इतिहास के सबसे चर्चित निजी प्रसंगों में बनाए हुए है। ऐसे मामलों में उस दौर की फिल्मी पत्रकारिता, व्यक्तिगत संस्मरण और बाद में लिखी गई आत्मकथाओं को अलग-अलग स्रोतों के रूप में देखना जरूरी है।
चमनलाल बाली से विवाह और अचानक फिल्मों से दूरी
अपने करियर के शिखर पर वैजयंतीमाला ने वर्ष 1968 में चिकित्सक चमनलाल बाली से विवाह किया। चमनलाल बाली राज कपूर परिवार के चिकित्सक भी रहे थे और विवाह के बाद वैजयंतीमाला ने धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया से दूरी बना ली। उन्होंने पहले से अनुबंधित कुछ फिल्मों का काम पूरा किया, लेकिन इसके बाद अभिनय को लगभग अलविदा कह दिया। उन्होंने अपने निर्णय को बाद में अपनी जिंदगी का समझदारी भरा फैसला बताया और कहा कि उन्हें इस बात का कोई पछतावा नहीं है कि उन्होंने सही समय पर फिल्मों से दूरी बनाई। विवाह के बाद उनका जीवन चेन्नई में परिवार और नृत्य के इर्द-गिर्द अधिक केंद्रित रहा, जबकि मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से उनका कला से रिश्ता लगातार बना रहा।
अभिनय छोड़ा, लेकिन नृत्य को कभी नहीं छोड़ा
फिल्मों से दूरी बनाने के बाद भी वैजयंतीमाला की कलात्मक यात्रा रुकी नहीं। भरतनाट्यम उनके जीवन का ऐसा पक्ष रहा, जिसने उन्हें सिनेमा से परे भी विशिष्ट पहचान दी। भारत सरकार के अनुसार उन्होंने दशकों तक भरतनाट्यम के पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया और देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुतियां दीं। वह संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक विशेष अवसर पर प्रस्तुति देने वाली पहली भारतीय नृत्यांगना भी रहीं। उनकी कला यात्रा यह बताती है कि वैजयंतीमाला के लिए अभिनय उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, लेकिन नृत्य उनकी मूल साधना बना रहा। यही वजह है कि उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी पहचान केवल एक पुरानी फिल्म अभिनेत्री के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय कला की महत्वपूर्ण साधिका के रूप में कायम है।
अयोध्या में ‘राग सेवा’ ने फिर याद दिलाई उनकी अद्भुत ऊर्जा
वर्ष 2024 में अयोध्या स्थित राम मंदिर में आयोजित ‘राग सेवा’ के अवसर पर वैजयंतीमाला की भरतनाट्यम प्रस्तुति ने एक बार फिर देश का ध्यान उनकी ओर खींचा। उम्र के नौवें दशक में भी मंच पर उनकी उपस्थिति और नृत्य के प्रति समर्पण ने दर्शकों को प्रभावित किया। यह अवसर उनके लिए केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं था, बल्कि उस कला-साधना की निरंतरता का प्रमाण भी था जिसे उन्होंने बचपन से अपने जीवन का हिस्सा बनाया। अभिनय की चकाचौंध से दूर रहने के बावजूद जब भी वह मंच पर दिखाई देती हैं, उनकी प्रस्तुति यह याद दिलाती है कि महान कलाकारों की पहचान समय के साथ धुंधली नहीं पड़ती। उनका नृत्य आज भी उसी अनुशासन और गरिमा की झलक देता है जिसने उन्हें भारतीय कला जगत में अलग स्थान दिलाया।
फिल्मों से राजनीति तक, सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय रहीं
वैजयंतीमाला का सार्वजनिक जीवन केवल सिनेमा और नृत्य तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने राजनीति में भी प्रवेश किया और संसद की सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निभाई। वर्ष 1984 में उन्होंने लोकसभा चुनाव जीतकर संसदीय राजनीति में कदम रखा और बाद में राज्यसभा की सदस्य भी रहीं। इस तरह उनका जीवन भारतीय सिनेमा की लोकप्रियता से निकलकर सार्वजनिक सेवा और राष्ट्रीय जीवन के व्यापक क्षेत्र तक पहुंचा। कला, राजनीति और नृत्य—इन तीनों क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति यह बताती है कि उन्होंने अपने जीवन को किसी एक पहचान तक सीमित नहीं रखा। पद्म विभूषण से सम्मानित किया जाना भी इसी व्यापक योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति है।
93 की उम्र में भी विरासत उतनी ही जीवंत
वैजयंतीमाला की कहानी भारतीय सिनेमा के उस दौर की कहानी है जब एक अभिनेत्री को केवल पर्दे की सुंदरता के आधार पर नहीं, बल्कि अभिनय, नृत्य, व्यक्तित्व और पेशेवर अनुशासन के आधार पर अपनी जगह बनानी पड़ती थी। उन्होंने दक्षिण भारतीय सिनेमा से शुरुआत कर हिन्दी फिल्मों के सबसे बड़े सितारों के बीच अपना मुकाम बनाया और अपने दौर की सबसे प्रभावशाली अभिनेत्रियों में स्थान हासिल किया। उनकी निजी जिंदगी को लेकर चाहे जितनी चर्चाएं और विरोधाभासी दावे रहे हों, उनकी कलात्मक उपलब्धियां उन सब से कहीं बड़ी हैं। 93 वर्ष की आयु में भी उनका सक्रिय रहना और मंच से जुड़ाव इस बात का प्रमाण है कि सच्ची कला उम्र की सीमाओं से परे होती है। वैजयंतीमाला का नाम इसलिए केवल भारतीय सिनेमा की स्वर्णिम स्मृतियों में दर्ज नहीं है, बल्कि वह भारतीय नृत्य और अभिनय की उस परंपरा की जीवंत कड़ी हैं, जिसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों तक बना रहेगा।