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रोग मुक्ति का प्रबल साधन चिकित्सीय दृष्टि से कहें तो उपवास रोग मुक्ति का प्रबल साधन है। उपवास काल में संपूर्ण जीवन शक्ति केवल रोग दूर करने में लग जाती है। जिससे शरीर निरोगी और शक्तिशाली बनता है। दूसरे शब्दों में कहें तो शरीर व आत्मशोधन से स्वास्थ्य प्राप्ति का प्रयत्न ही उपवास है। प्राकृतिक चिकित्सा की दृष्टि से कहें तो भोजन का पूर्ण रूप से त्याग करते हुए केवल जल पर रहकर पेट को विश्राम देना, उपवास कहलाता है। उपवास से न केवल शरीर ही नहीं, बल्कि मन और आत्मा के तल पर निर्मलता का अनुभव होता है। पाचन संस्थान को विश्राम पाचन संस्थान को विश्राम देने वाला व्रत शारीरिक-मानसिक शुद्धि का साधन भी है। प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगावस्था में कुछ खाना विष और उपवास अमृत के समान है। यह टकसाली सत्य है कि बीमार होने पर भूख स्वभावत: कम हो जाती है। दरअसल, उपवास काल में जीवन शक्ति रोग उपचार में लग जाती है। उपवास से स्वास्थ्य में निरंतर सुधार होता है। शरीर में रोग उत्पन्न करने वाले विजातीय द्रव्य का विनाश होता है। मन और आत्मा का परिष्कार करने वाला उपवास एक चिकित्सकीय उपलब्धि भी है। लेकिन शर्त यह है कि उपवास नियमों के अनुकूल होना चाहिए। वहीं व्रत संयमित जीवन का आधार भी है। इससे हम जीवन के प्रति एकाग्र दृष्टि पाते हैं। व्रत में सावधानी यदि हम बिना चिकित्सक की सलाह के उपवास करते हैं तो उसके लाभ संदिग्ध हो सकते हैं। वास्तव में बिना तैयारी और उपवास कला का ज्ञान पाये बिना दीर्घकालीन उपवास करना अनुचित है। वहीं दूसरी ओर उपचार की दृष्टि से उपवास किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना चाहिए। व्रत खोलने में सतर्कता और नियम सही अर्थों में उपवास खोलना उपवास करने से ज्यादा कठिन कार्य है। इसके लिए कठोर आत्मसंयम होना जरूरी है। दरअसल, उपवास के समय पाचनशक्ति अधिक दुर्बल हो जाती है। अत: उपवास खोलते समय सावधानी के साथ अत्यधिक हल्का व सुपाच्य भोजन कम मात्रा में लिया जाना चाहिए। उपवास खोलने के लिए आवश्यक है कि सबसे पहले जल के समान तरल पदार्थ लेने चाहिए। इसमें फलों का रस या सब्जियों का रस यानी सूप लिया जा सकता है। कुछ दिनों तक यह क्रम जारी रखने के बाद कुछ तरल भोज्य पदार्थ जैसे खिचड़ी (पतली और सादी) कम मात्रा में लेनी चाहिए। फिर धीरे-धीरे उसकी मात्रा और ठोसपन को बढ़ाना चाहिए। इसी क्रम को अपनाते हुए साधारण भोजन पर आना चाहिए।

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