देश तेजी से डिजिटल और आर्थिक विकास की ओर बढ़ रहा है, लेकिन दहेज प्रथा की जड़ें अब भी समाज में गहराई तक फैली हुई हैं। हाल के महीनों में सामने आए कई मामलों ने यह साबित किया है कि उच्च शिक्षा, अच्छी नौकरी और शहरी जीवनशैली भी महिलाओं को दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से सुरक्षा नहीं दे पा रही है। भोपाल की ट्विशा, ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर और दिल्ली की स्वाट कमांडो काजल चौधरी की संदिग्ध मौतों ने समाज को झकझोर दिया है। इन मामलों में परिवारों ने दहेज की मांग और उत्पीड़न को मौत का कारण बताया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल ग्रामीण या पिछड़े क्षेत्रों तक सीमित नहीं है।
आंकड़े बताते हैं भयावह सच्चाई
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2024 में दहेज से जुड़ी हिंसा के कारण प्रतिदिन औसतन 16 महिलाओं की मौत दर्ज की गई। महानगरों में दहेज हत्या के मामलों में दिल्ली लगातार पांचवें वर्ष शीर्ष पर रही, जबकि दहेज उत्पीड़न के सर्वाधिक मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए। इसके बाद बिहार और कर्नाटक का स्थान रहा। ये आंकड़े बताते हैं कि कानूनों और जागरूकता अभियानों के बावजूद दहेज की मानसिकता समाज के बड़े हिस्से में अब भी मौजूद है।
दहेज सिर्फ लेन-देन नहीं, सत्ता और नियंत्रण का माध्यम
विशेषज्ञों का मानना है कि दहेज केवल आर्थिक लेन-देन का मुद्दा नहीं है। यह पितृसत्तात्मक सोच, सामाजिक प्रतिष्ठा की होड़ और महिलाओं पर नियंत्रण की मानसिकता से भी जुड़ा हुआ है। विवाह को सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बनाने की प्रवृत्ति ने दहेज को एक तरह से सामाजिक स्वीकृति प्रदान कर दी है। कई परिवार इसे उपहार, शगुन या सम्मान के नाम पर स्वीकार्य मान लेते हैं, जबकि वास्तविकता में यही सोच आगे चलकर शोषण और हिंसा का आधार बनती है।
कानून मौजूद, लेकिन सामाजिक बदलाव अधूरा
भारत में दहेज निषेध कानून और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में महिलाएं समय रहते शिकायत दर्ज नहीं करा पातीं। परिवार की प्रतिष्ठा, वैवाहिक संबंध बचाने का दबाव और सामाजिक बदनामी का डर उन्हें चुप रहने पर मजबूर कर देता है। कई मामलों में पीड़ित महिलाओं को पर्याप्त सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समर्थन भी नहीं मिल पाता, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है। यही कारण है कि कानून होने के बावजूद अपराध पूरी तरह नहीं रुक पा रहे हैं।
आर्थिक स्वतंत्रता और जागरूकता ही समाधान की कुंजी
विशेषज्ञों के अनुसार दहेज प्रथा के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक जागरूकता है। जब लड़कियां आर्थिक रूप से मजबूत होंगी और परिवार विवाह को आर्थिक लेन-देन के बजाय समानता और सम्मान के रिश्ते के रूप में स्वीकार करेंगे, तब इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण संभव होगा। साथ ही विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से युवाओं में लैंगिक समानता और सम्मान आधारित वैवाहिक मूल्यों का प्रचार-प्रसार भी आवश्यक है।
बेटियों की सुरक्षा के लिए बदलनी होगी मानसिकता
दहेज हत्या की घटनाएं केवल अपराध नहीं बल्कि समाज के सामूहिक नैतिक संकट का प्रतीक हैं। जब तक विवाह को प्रतिष्ठा प्रदर्शन और आर्थिक सौदेबाजी का माध्यम समझा जाता रहेगा, तब तक कानून अकेले इस समस्या का समाधान नहीं कर पाएंगे। आवश्यकता इस बात की है कि परिवार, समाज और संस्थाएं मिलकर ऐसी मानसिकता विकसित करें जहां बेटी को बोझ नहीं बल्कि समान अधिकारों वाली नागरिक के रूप में देखा जाए। तभी दहेज की इस कुप्रथा पर स्थायी अंकुश लगाया जा सकेगा और अनगिनत बेटियों का भविष्य सुरक्षित हो सकेगा।