अफगानिस्तान के न्याय मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी विवाह संबंधी आदेश के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय में व्यापक बहस शुरू हो गई है। संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन इन अफगानिस्तान (UNAMA) ने कहा है कि आदेश के कुछ प्रावधान महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा करते हैं। विशेष रूप से विवाह में सहमति और कम उम्र में विवाह से जुड़े मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट आपत्ति दर्ज कराई है।
किस प्रावधान पर सबसे अधिक विवाद?
सबसे अधिक विवाद उस प्रावधान को लेकर है जिसमें युवावस्था प्राप्त कर चुकी लड़की की चुप्पी को कुछ परिस्थितियों में विवाह के लिए सहमति के रूप में माना जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र का तर्क है कि विवाह के लिए स्पष्ट, स्वतंत्र और पूर्ण सहमति आवश्यक होनी चाहिए। आलोचकों का कहना है कि ऐसी व्यवस्था लड़कियों की वास्तविक इच्छा और अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं कर पाती तथा इससे बाल विवाह को अप्रत्यक्ष वैधता मिलने की आशंका पैदा हो सकती है।
संयुक्त राष्ट्र ने क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन ने अपने बयान में कहा कि नए नियमों में पहले से विवाहित कम उम्र की लड़कियों से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं, जो बाल विवाह को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। संगठन का मानना है कि कानून बच्चों के सर्वोत्तम हितों की रक्षा और महिलाओं की स्वतंत्र सहमति सुनिश्चित करने के अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल नहीं खाता। संयुक्त राष्ट्र ने अफगान प्रशासन से महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए नियमों की समीक्षा करने का आग्रह किया है।
तालिबान प्रशासन का पक्ष
तालिबान प्रशासन ने संयुक्त राष्ट्र की आलोचनाओं को अस्वीकार करते हुए कहा है कि नया आदेश इस्लामी कानून की व्याख्या के आधार पर तैयार किया गया है। प्रशासन का दावा है कि अफगानिस्तान में जबरन विवाह पहले से प्रतिबंधित है और नए नियम न्यायिक प्रक्रियाओं को स्पष्ट करने के उद्देश्य से बनाए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि कानून का उद्देश्य पारिवारिक विवादों और वैवाहिक मामलों के समाधान के लिए एक स्पष्ट ढांचा उपलब्ध कराना है।
तलाक और गवाही से जुड़े प्रावधान भी चर्चा में
नए नियमों में वैवाहिक विवादों और न्यायिक अलगाव से संबंधित प्रक्रियाएं भी निर्धारित की गई हैं। मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई है कि कुछ परिस्थितियों में महिलाओं के लिए अपने दावों को साबित करना कठिन हो सकता है, विशेषकर तब जब गवाहों की आवश्यकता जैसी शर्तें सामने आती हैं। आलोचकों का कहना है कि इससे महिलाओं की न्याय तक पहुंच प्रभावित हो सकती है, जबकि प्रशासन का दावा है कि प्रक्रियाएं धार्मिक और कानूनी परंपराओं के अनुरूप हैं।
अफगान महिलाओं की स्थिति पर पहले से उठते रहे हैं सवाल
अफगानिस्तान में 2021 में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों को लेकर लगातार अंतरराष्ट्रीय चिंता व्यक्त की जाती रही है। माध्यमिक और उच्च शिक्षा पर प्रतिबंध, कई क्षेत्रों में रोजगार संबंधी सीमाएं तथा सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न मानवाधिकार संगठन पहले भी आलोचना कर चुके हैं। इन प्रतिबंधों के कारण लाखों अफगान लड़कियों और महिलाओं के शिक्षा तथा रोजगार के अवसर प्रभावित हुए हैं।
मानवाधिकार बनाम धार्मिक व्याख्या की बहस
नए विवाह कानून को लेकर विवाद ने एक बार फिर धार्मिक कानूनों की व्याख्या और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के बीच संतुलन पर बहस को तेज कर दिया है। जहां तालिबान प्रशासन इसे अपनी धार्मिक और कानूनी व्यवस्था का हिस्सा बता रहा है, वहीं अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की मांग कर रही हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा अफगानिस्तान और वैश्विक समुदाय के बीच संवाद का महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है।