विश्व जलवायु प्रणाली एक बार फिर ऐसे मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है, जहां प्रशांत महासागर में बनने वाली एक प्राकृतिक लेकिन अत्यंत प्रभावशाली जलवायु घटना पूरी दुनिया के मौसम का स्वरूप बदल सकती है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और अंतरराष्ट्रीय मौसम वैज्ञानिकों द्वारा जारी ताजा आंकड़ों ने संकेत दिए हैं कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के भीतर बड़ी मात्रा में गर्म जल तेजी से जमा हो रहा है। समुद्र की सतह का लगातार ऊपर उठना इस बात का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है कि अल नीनो अब एक अत्यंत शक्तिशाली स्वरूप ग्रहण कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही तो इसका प्रभाव कृषि, जल संसाधनों, ऊर्जा उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था तक व्यापक रूप से महसूस किया जाएगा।
नासा के सैटेलाइट ने उजागर की समुद्र के भीतर छिपी गर्मी
नासा के ‘सेंटिनल-6 माइकल फ्रेलिच’ सैटेलाइट से प्राप्त नवीनतम आंकड़ों ने वैज्ञानिकों को प्रशांत महासागर की बदलती स्थिति का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण उपलब्ध कराया है। सैटेलाइट द्वारा मापे गए समुद्र की सतह के स्तर में असामान्य वृद्धि यह दर्शाती है कि समुद्र के भीतर बड़ी मात्रा में ऊष्मा लगातार जमा हो रही है। समुद्री जल के गर्म होने पर उसका आयतन बढ़ता है, जिससे समुद्र की सतह सामान्य से ऊंची दिखाई देती है। वैज्ञानिकों के अनुसार यही प्रक्रिया अल नीनो के विकसित होने का प्रमुख संकेत होती है। आधुनिक उपग्रह प्रौद्योगिकी की सहायता से अब समुद्र के भीतर हो रहे इन सूक्ष्म परिवर्तनों का अध्ययन पहले की तुलना में कहीं अधिक सटीकता से किया जा रहा है, जिससे भविष्य के मौसम का बेहतर अनुमान लगाने में सहायता मिल रही है।
1997 के ऐतिहासिक ‘गॉडजिला अल नीनो’ जैसी बन रही परिस्थितिया
नासा की जेट प्रोपल्शन प्रयोगशाला के शोधकर्ताओं का कहना है कि वर्तमान समुद्री परिस्थितियां वर्ष 1997 में विकसित हुए ऐतिहासिक और अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो से काफी समानता रखती हैं। उस समय उत्पन्न जलवायु परिवर्तन ने विश्व के अनेक देशों में विनाशकारी बाढ़, भीषण सूखा, जंगलों में आग और कृषि उत्पादन में भारी गिरावट जैसी परिस्थितियां पैदा कर दी थीं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार भी पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में बनने वाली विशाल ‘केल्विन वेव्स’ बड़ी मात्रा में गर्म जल को पूर्वी प्रशांत की ओर धकेल रही हैं। यदि यही प्रक्रिया अगले कुछ महीनों तक जारी रहती है तो यह दशकों के सबसे प्रभावशाली अल नीनो में बदल सकता है, जिसके वैश्विक परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते हैं।
विश्व मौसम प्रणाली पर बढ़ेगा व्यापक प्रभाव
अल नीनो केवल समुद्र तक सीमित रहने वाली घटना नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की संपूर्ण वायुमंडलीय परिसंचरण प्रणाली को प्रभावित करती है। विश्व मौसम संगठन पहले ही चेतावनी दे चुका है कि मजबूत अल नीनो के दौरान अनेक क्षेत्रों में सामान्य से कहीं अधिक तापमान, समुद्री हीटवेव, भीषण सूखा तथा कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा जैसी चरम मौसमी घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, एशिया तथा ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक क्षेत्रों में मौसम के पारंपरिक स्वरूप में बदलाव देखा जा सकता है। जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन के साथ यदि शक्तिशाली अल नीनो जुड़ जाता है तो चरम मौसम की घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति दोनों बढ़ सकती हैं।
भारत के मानसून, कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है गहरा असर
भारत की कृषि व्यवस्था आज भी बड़े पैमाने पर दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है। ऐसे में अल नीनो की तीव्रता बढ़ने से मानसूनी वर्षा का वितरण असंतुलित हो सकता है। कई क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होने पर जलाशयों का स्तर प्रभावित हो सकता है, जबकि कुछ स्थानों पर अल्प अवधि में अत्यधिक वर्षा से बाढ़ जैसी परिस्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं। इसका सीधा प्रभाव खरीफ फसलों, खाद्य उत्पादन, ग्रामीण आय, पेयजल उपलब्धता तथा ऊर्जा उत्पादन पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है तो खाद्य मुद्रास्फीति, कृषि लागत और आर्थिक विकास दर पर भी दबाव बढ़ सकता है। इसलिए वैज्ञानिक संस्थान लगातार समुद्री और वायुमंडलीय गतिविधियों की निगरानी कर रहे हैं ताकि समय रहते आवश्यक रणनीतियां तैयार की जा सकें।
जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ी वैश्विक सतर्कता
जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्तमान समय में पृथ्वी पहले से ही रिकॉर्ड स्तर के वैश्विक तापमान का सामना कर रही है। ऐसे में शक्तिशाली अल नीनो का विकसित होना जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और अधिक तीव्र बना सकता है। अनेक देशों ने कृषि प्रबंधन, जल संरक्षण, आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली, स्वास्थ्य सेवाओं और खाद्य सुरक्षा को लेकर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। वैज्ञानिक समुदाय इस बात पर भी बल दे रहा है कि आधुनिक सैटेलाइट तकनीक, महासागरीय निगरानी नेटवर्क और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पूर्वानुमान प्रणालियों का अधिक प्रभावी उपयोग कर संभावित जोखिमों को कम किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले कुछ महीने वैश्विक मौसम विज्ञान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे और इन्हीं के आधार पर यह स्पष्ट होगा कि वर्तमान अल नीनो किस स्तर तक प्रभाव छोड़ने वाला है।