रीवा. सफेद बाघों की वैश्विक पहचान के पीछे मध्य प्रदेश के रीवा क्षेत्र का एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ा हुआ है। 27 मई 1951 को तत्कालीन रीवा रियासत के सीधी जिले के बरगड़ी और कुसमी के जंगलों में एक सफेद बाघ मिला था, जिसे बाद में ‘मोहन’ नाम दिया गया। उसे जंगल से पकड़कर रीवा के महाराजा मार्तंड सिंह जूदेव के संरक्षण में रखा गया। मोहन को आमतौर पर आधुनिक समय में दर्ज सफेद बाघों के प्रजनन वंश का प्रमुख आधार माना जाता है। उसकी मौजूदगी ने न केवल रीवा को एक विशिष्ट पहचान दी, बल्कि सफेद बाघों के संरक्षण और प्रजनन की दिशा में भी एक नई शुरुआत की। आज दुनिया के विभिन्न चिड़ियाघरों में दिखाई देने वाले अनेक सफेद बाघों का वंश इसी ऐतिहासिक कड़ी से जुड़ा हुआ है।
महाराजा मार्तंड सिंह की दूरदर्शिता ने बचाई विरासत
सफेद बाघों के संरक्षण की कहानी में रीवा के महाराजा मार्तंड सिंह जूदेव की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। उन्होंने मोहन को केवल एक दुर्लभ वन्यजीव के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसके संरक्षण और प्रजनन के माध्यम से इस विशेष वंश को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। इतिहासकार और वैज्ञानिक नलिन कुमार दुबे, जो एक दशक से अधिक समय से सफेद बाघों पर शोध कर रहे हैं, के अनुसार महाराजा के प्रयासों और दूरदर्शिता के कारण ही इस वंश को आगे बढ़ाने में सफलता मिली। उस दौर में दुर्लभ वन्यजीवों के वैज्ञानिक प्रबंधन और प्रजनन की सुविधाएं आज जैसी विकसित नहीं थीं। ऐसे में मोहन का संरक्षण और उसके वंश को आगे बढ़ाना एक बड़ी चुनौती थी। महाराजा के प्रयासों ने रीवा को सफेद बाघों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया।
मोहन और राधा से आगे बढ़ा सफेद बाघों का कुनबा
मोहन के वंश को आगे बढ़ाने में राधा नाम की बाघिन की भी अहम भूमिका रही। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, मोहन और राधा से चार सफेद बाघों का जन्म हुआ, जिन्होंने आगे चलकर इस वंश के विस्तार का आधार तैयार किया। सफेद बाघों का जन्म सामान्य बाघों की आबादी में पाई जाने वाली एक दुर्लभ आनुवंशिक विशेषता से जुड़ा होता है। इसके लिए दोनों अभिभावकों में संबंधित अप्रभावी जीन का होना आवश्यक है। इसलिए सफेद बाघों का प्रजनन केवल संयोग का विषय नहीं, बल्कि आनुवंशिक समझ और सावधानीपूर्वक प्रबंधन से जुड़ी प्रक्रिया है। मोहन और राधा से शुरू हुई यह प्रजनन परंपरा आगे विभिन्न चिड़ियाघरों तक पहुंची और सफेद बाघों की संख्या बढ़ने के साथ भारत की इस विरासत को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
अमेरिका तक पहुंची रीवा के सफेद बाघों की पहचान
रीवा के सफेद बाघों की लोकप्रियता भारत तक सीमित नहीं रही। महाराजा मार्तंड सिंह ने मोहन के एक बेटे को अमेरिका को उपहार के रूप में दिया था। उस बाघ का स्वागत तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर ने किया था। यह प्रसंग बताता है कि उस समय भी भारतीय सफेद बाघों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितना आकर्षण और महत्व प्राप्त था। अमेरिका जैसे देश में भारतीय सफेद बाघ का पहुंचना वन्यजीव जगत की एक उल्लेखनीय घटना थी। इसके बाद दुनिया के विभिन्न चिड़ियाघरों में सफेद बाघों को देखने के प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ती गई। इस तरह रीवा के जंगलों में शुरू हुई कहानी धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव जगत का हिस्सा बन गई और मोहन का नाम सफेद बाघों के इतिहास में स्थायी रूप से दर्ज हो गया।
देश के 33 चिड़ियाघरों में मौजूद हैं करीब 120 सफेद बाघ
भारत में सफेद बाघों का संरक्षण अब कई चिड़ियाघरों के माध्यम से किया जा रहा है। दिल्ली चिड़ियाघर के निदेशक डॉ. संजीत कुमार के अनुसार, देश के 33 चिड़ियाघरों में करीब 120 सफेद बाघ मौजूद हैं। इनमें से बड़ी संख्या का संबंध दिल्ली चिड़ियाघर में विकसित प्रजनन वंश से बताया जाता है। यह संख्या भारत में सफेद बाघों के संरक्षण और प्रजनन के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण संकेत है। हालांकि, सफेद रंग के कारण ये बाघ अलग दिखाई देते हैं, लेकिन वे बाघ की कोई अलग प्रजाति नहीं हैं। उनका सफेद रंग एक दुर्लभ आनुवंशिक विशेषता के कारण होता है। इसलिए इनके संरक्षण में केवल संख्या बढ़ाना ही नहीं, बल्कि आनुवंशिक विविधता और पशु कल्याण का ध्यान रखना भी जरूरी है।
मोहन की विरासत के साथ संरक्षण की जिम्मेदारी भी बढ़ी
आज सफेद बाघ भारत के लिए केवल आकर्षण का केंद्र नहीं, बल्कि रीवा की ऐतिहासिक विरासत और वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों का प्रतीक भी हैं। मोहन से शुरू हुआ वंश दुनिया के अनेक चिड़ियाघरों तक पहुंच चुका है, लेकिन इस उपलब्धि के साथ संरक्षण से जुड़ी जिम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं। सफेद बाघों का दुर्लभ रंग उन्हें विशेष पहचान देता है, मगर उनके स्वास्थ्य, प्रजनन और आनुवंशिक स्थिति पर वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है। सीमित आनुवंशिक आधार पर लगातार प्रजनन होने से कुछ स्वास्थ्य संबंधी जोखिम पैदा हो सकते हैं, इसलिए विशेषज्ञों के लिए संतुलित प्रजनन प्रबंधन महत्वपूर्ण है। रीवा के जंगलों में मिले मोहन की कहानी इस बात की याद दिलाती है कि किसी दुर्लभ वन्यजीव की पहचान को बचाए रखने के लिए केवल लोकप्रियता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक वैज्ञानिक संरक्षण और संवेदनशील देखभाल भी आवश्यक है।