कूनो राष्ट्रीय उद्यान में रह रहे अफ्रीकी चीते कई बार निर्धारित क्षेत्र से बाहर निकलकर राजस्थान की ओर पहुँच चुके हैं। पहली नजर में यह व्यवहार असामान्य लग सकता है, लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञ इसे चीतों की प्राकृतिक खोजी प्रवृत्ति से जोड़कर देखते हैं। चीते किसी मानचित्र या प्रशासनिक सीमा को नहीं समझते; उनके लिए जंगल का क्षेत्र मनुष्य द्वारा खींची गई रेखाओं से नहीं, बल्कि भोजन, पानी, सुरक्षा और प्रजनन जैसी प्राकृतिक आवश्यकताओं से तय होता है। जब किसी क्षेत्र में शिकार की उपलब्धता, प्रतिस्पर्धा या अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियाँ बदलती हैं, तो चीता नए इलाके की तलाश में लंबी दूरी तय कर सकता है। कूनो से राजस्थान की ओर उनकी आवाजाही को इसी व्यापक प्राकृतिक व्यवहार के संदर्भ में समझना अधिक उचित होगा।
शिकार की तलाश में जंगल से खेतों तक पहुंच जाते हैं चीते
कूनो से बाहर निकलने के बाद ये चीते केवल घने जंगलों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि झाड़ियों वाले क्षेत्रों, खेतों और गांवों के बाहरी इलाकों तक पहुँच जाते हैं। इनके लिए सबसे बड़ा आकर्षण अक्सर ऐसे क्षेत्र होते हैं जहाँ पर्याप्त शिकार उपलब्ध हो। किसी नए इलाके में यदि हिरण, नीलगाय के छोटे बच्चे या अन्य उपयुक्त वन्यजीव मिलते हैं तो चीता वहां कुछ समय तक रुक सकता है। यही वजह है कि उनकी गतिविधियाँ केवल जंगल की सीमा के भीतर नहीं रहतीं। राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में पहुँचने के बाद भी वे कई सप्ताह तक विचरण कर सकते हैं। इस दौरान वन विभाग को उनके स्थान की लगातार निगरानी करनी पड़ती है, ताकि वे मानव बस्तियों के बहुत करीब न पहुँचें और किसी संभावित संघर्ष की स्थिति पैदा न हो।
कूनो से राजस्थान तक बार-बार पहुंचने का रिकॉर्ड
‘प्रोजेक्ट चीता’ के भारत में शुरू होने के बाद से कूनो से राजस्थान की ओर चीतों की आवाजाही कई बार सामने आ चुकी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अब तक कम से कम 11 बार चीते राजस्थान की सीमा में प्रवेश कर चुके हैं और उन्हें वापस लाने के लिए कई अभियान चलाने पड़े हैं। इन अभियानों में वन विभाग की टीमें लगातार चीतों की गतिविधियों पर नजर रखती हैं और उनके पदचिह्न, रेडियो कॉलर तथा अन्य निगरानी साधनों के आधार पर उनकी स्थिति का पता लगाती हैं। जब किसी चीते को वापस लाना आवश्यक समझा जाता है, तब प्रशिक्षित दल उसे सुरक्षित रूप से बेहोश करने के बाद कूनो वापस लाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में पशु चिकित्सा विशेषज्ञों और वन्यजीव अधिकारियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहती है।
केपी-2 का व्यवहार सबसे ज्यादा चर्चा में
कूनो से राजस्थान की ओर बार-बार जाने वाले चीतों में केपी-2 का नाम विशेष रूप से सामने आया है। यह चीता भारत में जन्मा है, लेकिन इसके व्यवहार में नए क्षेत्रों की तलाश की प्रवृत्ति लगातार दिखाई देती रही है। इसे राजस्थान से वापस लाने के लिए तीन बार पकड़कर कूनो लाया जा चुका है। हाल की एक घटना में वह करीब 55 दिनों तक कूनो से बाहर रहा, जिसमें लगभग 45 दिन राजस्थान के बारां जिले और करीब 10 दिन कोटा क्षेत्र में उसके विचरण की जानकारी सामने आई। इतने लंबे समय तक किसी चीते का संरक्षित क्षेत्र से बाहर रहना वन विभाग के लिए चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन यह उसके प्राकृतिक क्षेत्र विस्तार और भोजन की तलाश से जुड़ी गतिविधियों को समझने का महत्वपूर्ण अवसर भी प्रदान करता है।
केपी-3 ने भी अपनाया राजस्थान की ओर जाने वाला रास्ता
भारत में जन्मे एक अन्य चीते केपी-3 ने भी कूनो से निकलने के बाद राजस्थान की ओर लगभग इसी प्रकार की यात्रा की। वह बारां और झालावाड़ जिलों के अलग-अलग इलाकों में करीब 42 दिनों तक विचरण करता रहा। इसके बाद निगरानी दल ने उसकी गतिविधियों को ट्रैक करते हुए उसे मध्य प्रदेश की सीमा के निकट पकड़ लिया। केपी-2 और केपी-3 जैसे चीतों का व्यवहार वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में जन्मे इन जानवरों की अगली पीढ़ियों के व्यवहार को समझना ‘प्रोजेक्ट चीता’ की दीर्घकालिक सफलता के लिए आवश्यक है। यदि चीते लगातार नए क्षेत्रों की ओर जाते हैं तो भविष्य में उनके लिए सुरक्षित गलियारों और विस्तृत आवास क्षेत्रों की आवश्यकता पर भी गंभीरता से विचार करना पड़ सकता है।
ट्रैंकुलाइज कर वापस लाने की प्रक्रिया क्यों जरूरी होती है
जब कोई चीता कूनो की सीमा से काफी दूर निकल जाता है और उसके मानव बस्तियों या पशुधन के करीब पहुँचने की आशंका होती है, तब वन विभाग के सामने उसे सुरक्षित रूप से वापस लाने की चुनौती होती है। रेडियो कॉलर और अन्य निगरानी साधनों से उसकी गतिविधियों का पता लगाया जाता है और उपयुक्त समय तथा स्थान मिलने पर विशेषज्ञ दल उसे नियंत्रित करने के लिए ट्रैंकुलाइज करते हैं। इसके बाद पशु चिकित्सक उसकी शारीरिक स्थिति की निगरानी करते हैं और सुरक्षित रूप से उसे कूनो वापस पहुँचाया जाता है। यह प्रक्रिया जोखिमपूर्ण होती है, क्योंकि किसी भी जंगली जानवर को पकड़ना उसके लिए तनावपूर्ण हो सकता है। इसलिए वन्यजीव प्रबंधन में ऐसे कदम सामान्यतः तभी उठाए जाते हैं जब चीते की सुरक्षा, मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका या संरक्षण कार्यक्रम की आवश्यकता इसकी मांग करे।
क्या राजस्थान की ओर बढ़ना भविष्य की बड़ी चुनौती का संकेत है
चीतों का बार-बार राजस्थान की ओर जाना एक तरफ संरक्षण प्रबंधन के लिए चुनौती है, तो दूसरी तरफ यह भारत में उनके पुनर्वास की प्रक्रिया को समझने का महत्वपूर्ण अवसर भी है। अफ्रीकी चीतों को भारतीय परिस्थितियों में बसाने का उद्देश्य केवल उन्हें एक निर्धारित उद्यान की सीमा में रखना नहीं, बल्कि दीर्घकाल में ऐसी आबादी तैयार करना है जो पर्याप्त क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से रह और प्रजनन कर सके। यदि चीते लगातार कूनो से बाहर निकलते हैं, तो इससे यह सवाल भी उठता है कि भविष्य में संरक्षित क्षेत्रों के बीच वन्यजीव गलियारों और बड़े सुरक्षित परिदृश्य की कितनी आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों के लिए इन चीतों की हर यात्रा एक तरह का प्राकृतिक अध्ययन है, जो यह समझने में मदद कर रही है कि भारत की भौगोलिक, जलवायु और शिकार संबंधी परिस्थितियों में यह प्रजाति किस प्रकार अपने नए आवास को स्वीकार कर रही है।
प्रोजेक्ट चीता के लिए चुनौती के साथ सीख भी
भारत में चीता पुनर्वास एक दीर्घकालिक संरक्षण परियोजना है, जिसका आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कोई चीता एक निश्चित उद्यान की सीमा में कितने समय तक रहा। वास्तविक सफलता इस बात से भी जुड़ी होगी कि वे पर्याप्त भोजन, पानी और सुरक्षित आवास के साथ कितनी स्वाभाविक जीवन-प्रक्रिया अपना पाते हैं। कूनो से राजस्थान की ओर होने वाली आवाजाही इसी बड़े प्रयोग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन घटनाओं से वन विभाग को चीतों की क्षेत्रीय आवश्यकताओं, शिकार की उपलब्धता और संभावित वन्यजीव गलियारों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल रही है। आने वाले वर्षों में यही अनुभव भारत में चीता संरक्षण की रणनीति को अधिक वैज्ञानिक, व्यावहारिक और दीर्घकालिक बनाने में मदद कर सकता है।