नई दिल्ली. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश के कुल 1.46 लाख किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क में से लगभग 62 फीसदी हिस्सा स्थायी डेवलपर या डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड के सुरक्षा कवच में नहीं है। यानी नेटवर्क पर सफर सुरक्षित नहीं है। इन सड़कों को महज अल्पकालिक अनुबंधों और पेचवर्क की खानापूर्ति के भरोसे छोड़ दिया गया है जो हाईवे पर सफर करने वाले करोड़ों यात्रियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि देश के 90,000 किलोमीटर से अधिक लंबा हाईवे नेटवर्क बिना किसी स्थायी जवाबदेही के केवल अल्पकालिक अनुबंधों और प्रदर्शन-आधारित रखरखाव अनुबंधों के भरोसे है।
अल्पकालिक अनुबंधों की सीमाएं
शॉर्ट-टर्म मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट्स की औसतन अवधि केवल 1 से 2 वर्ष होती है। इतने कम समय के लिए कोई भी ठेकेदार सड़क के डामरीकरण या उसकी नींव को मजबूत करने जैसा स्थायी कार्य नहीं करता। इन अनुबंधों का दायरा केवल गड्ढे भरने नालियों की सफाई या साइनबोर्ड लगाने तक सीमित रह जाता है। कोई पारदर्शी केंद्रीय डेटाबेस न होने से जवाबदेही किसी एक बड़ी कंपनी के बजाय छोटे-छोटे स्थानीय ठेकेदारों में बंट जाती है जिससे काम की गुणवत्ता की निगरानी लगभग न के बराबर हो जाती है। विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे के दावों के बीच पेचवर्क की इस खानापूर्ति का सबसे दर्दनाक परिणाम आम वाहन चालकों को अपनी जान गंवाकर भुगतना पड़ रहा है।
ब्लैक स्पॉट्स और सुरक्षा उपकरणों की कमी
दीर्घकालिक डेवलपर न होने के कारण सड़कों के ब्लैक स्पॉट्स वर्षों तक नहीं सुधारे जाते हैं। इसके अलावा क्रैश बैरियर रेट्रो-रिफ्लेक्टिव साइनेज सोलर स्टड्स और पर्याप्त स्ट्रीट लाइटों का रखरखाव समय पर न होने से रात या कोहरे में वाहन चालकों को किनारे या डिवाइडर का सही अंदाजा नहीं लगता। मानसून में ड्रेनेज खराब होने से सड़क पर पानी जमा होने से गाड़ियों का फिसलना और बड़े गड्ढे जानलेवा साबित होते हैं। सुरक्षा उपकरणों की कमी से हादसों का खतरा लगातार बना रहता है। इन खामियों के कारण हाईवे पर यात्रा करना जोखिम भरा हो गया है।
मौतों के आंकड़े चिंताजनक
मंत्रालय और सेवलाइफ फाउंडेशन के आंकड़ों के अनुसार हाईवे पर होने वाली कुल मौतों में से लगभग 55 से 62 फीसदी मौतें उन्हीं हिस्सों पर होती हैं जहां दीर्घकालिक रखरखाव का अभाव है। राष्ट्रीय राजमार्गों के 58 फीसदी से 60 प्रतिशत हादसे इन 90,000 किमी से अधिक फैले शॉर्ट-टर्म मेंटेनेंस वाले हिस्सों में होते हैं। हाईवे पर हर साल 55 हजार से 60 हजार मौतें दर्ज की जाती हैं। ये आंकड़े रखरखाव की अनदेखी के गंभीर परिणाम को दर्शाते हैं। अल्पकालिक व्यवस्थाओं के कारण सड़कें लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह पातीं।
मॉनसून के बाद सड़कों की बदहाली
हाईवे विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी राष्ट्रीय राजमार्ग की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए पूरी लाइफ-साइकिल मेंटेनेंस यानी 5 से 10 वर्ष की दीर्घकालिक जवाबदेही आवश्यक होती है। 1-2 साल के टुकड़ों में बांटे गए अनुबंध सड़क की उम्र बढ़ाने में पूरी तरह विफल साबित हो रहे हैं और हर मानसून के बाद सड़कें फिर बदहाल हो जाती हैं। रखरखाव में पर्याप्त धनराशि खर्च नहीं की जाती है। मॉनसून के पानी से गड्ढे और क्षति बढ़ जाती है जिसे अल्पकालिक ठेकेदार स्थायी रूप से ठीक नहीं करते। इससे यात्रियों का खतरा और बढ़ जाता है।
दीर्घकालिक रखरखाव की जरूरत
सड़क परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय राजमार्गों की सुरक्षा और दीर्घायु के लिए स्थायी डेवलपर या लंबी अवधि के रखरखाव अनुबंध जरूरी हैं। अल्पकालिक व्यवस्थाओं से काम की गुणवत्ता प्रभावित होती है और जवाबदेही बिखर जाती है। ब्लैक स्पॉट्स को समय पर सुधारने सुरक्षा उपकरणों का नियमित रखरखाव और पर्याप्त फंडिंग सुनिश्चित करने की जरूरत है। मॉनसून के बाद सड़कों को फिर से ठीक करने के बजाय पहले से मजबूत व्यवस्था बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए। तभी हाईवे पर सफर सुरक्षित हो सकेगा और मौतों के आंकड़े कम हो सकेंगे।