भारत में बच्चों के पालन-पोषण के तौर-तरीकों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। ‘यूगोव-मिंट-सीपीआर मिलेनियल सर्वे’ के अनुसार आज के माता-पिता अपने बच्चों को उसी माहौल में बड़ा नहीं करना चाहते, जिसमें वे स्वयं पले-बढ़े थे। सर्वेक्षण में शामिल केवल लगभग 20 प्रतिशत लोगों ने माना कि वे अपने बच्चों की परवरिश बिल्कुल अपने माता-पिता की तरह करना चाहेंगे। अधिकांश अभिभावक अब अधिक खुले, संवादात्मक और आधुनिक दृष्टिकोण को अपनाने के पक्षधर हैं, जहां बच्चों की भावनाओं, रुचियों और व्यक्तित्व को प्राथमिकता दी जाती है।
अब केवल अंकों से नहीं तय होती सफलता
एक समय था जब बच्चों के अच्छे अंक ही उनकी सफलता का सबसे बड़ा पैमाना माने जाते थे, लेकिन अब यह सोच बदल रही है। सर्वेक्षण बताता है कि पहले जहां 54 प्रतिशत अभिभावकों का पूरा ध्यान केवल पढ़ाई पर केंद्रित रहता था, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर 43 प्रतिशत रह गया है। आधुनिक माता-पिता मानते हैं कि जीवन में सफलता केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि खेल, संगीत, कला, रचनात्मकता और नेतृत्व क्षमता जैसी प्रतिभाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
खेल, कला और रुचियों को मिल रहा नया सम्मान
आज के अभिभावक बच्चों को उनकी पसंद के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। चाहे वह खेलकूद हो, संगीत हो, नृत्य हो या कोई अन्य रचनात्मक गतिविधि, माता-पिता अब बच्चों को अपनी पहचान बनाने की स्वतंत्रता देना चाहते हैं। करियर चयन के मामले में भी पहले की तुलना में अधिक खुलापन देखने को मिल रहा है। बच्चों पर पारंपरिक अपेक्षाएं थोपने की प्रवृत्ति कम हो रही है और उनकी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को महत्व दिया जा रहा है।
‘जेंटल पेरेंटिंग’ बन रही नई पहचान
भारतीय समाज में सौम्य पालन-पोषण यानी ‘जेंटल पेरेंटिंग’ का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 75 प्रतिशत अभिभावक बच्चों को डांटने, मारने या अत्यधिक सख्ती करने की बजाय प्रेम, धैर्य और समझदारी से समझाना अधिक प्रभावी मानते हैं। यह दृष्टिकोण बच्चों में आत्मविश्वास, भावनात्मक संतुलन और स्वस्थ संवाद की संस्कृति विकसित करने में मदद करता है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि सकारात्मक संवाद बच्चों के मानसिक विकास के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।
दक्षिण भारत में सबसे उदार पेरेंटिंग मॉडल
सर्वेक्षण में क्षेत्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण अंतर सामने आए हैं। दक्षिण भारतीय राज्यों में अभिभावकों का रवैया अपेक्षाकृत अधिक उदार और लचीला पाया गया है। यहां केवल 39 प्रतिशत लोग पढ़ाई को सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता मानते हैं। इसके विपरीत उत्तर, पूर्व और पश्चिम भारत में 43 से 47 प्रतिशत अभिभावक अब भी शैक्षणिक उपलब्धियों को सर्वोच्च महत्व देते हैं। यह अंतर सामाजिक परिवेश, शिक्षा स्तर और बदलती जीवनशैली के प्रभाव को दर्शाता है।
आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों की अलग प्राथमिकताए
रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक रूप से मजबूत और संसाधन संपन्न परिवारों में अब भी सुरक्षित और स्थिर करियर को विशेष महत्व दिया जाता है। ऐसे परिवारों का झुकाव सरकारी सेवाओं या प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट नौकरियों की ओर अधिक देखा गया है। हालांकि वे आधुनिक पेरेंटिंग के कई पहलुओं को स्वीकार कर रहे हैं, फिर भी करियर और आर्थिक सुरक्षा को लेकर उनकी सोच अपेक्षाकृत पारंपरिक बनी हुई है।
डिजिटल युग ने बढ़ाई अभिभावकों की चिंताए
तकनीक और इंटरनेट ने बच्चों के विकास के नए अवसर तो दिए हैं, लेकिन इसके साथ कई नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। सर्वेक्षण के अनुसार 65 प्रतिशत अभिभावक बच्चों में बढ़ती स्मार्टफोन और डिजिटल लत को सबसे बड़ी चिंता मानते हैं। मोबाइल गेमिंग, सोशल मीडिया और लगातार स्क्रीन उपयोग बच्चों के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर असर डाल रहे हैं। इसके अलावा 57 प्रतिशत अभिभावक इंटरनेट पर उपलब्ध भ्रामक, हिंसक या अनुपयुक्त सामग्री को लेकर चिंतित हैं।
सुरक्षा और प्रदूषण भी बने बड़े मुद्दे
डिजिटल खतरों के अलावा शहरी जीवन की चुनौतियां भी अभिभावकों की चिंता बढ़ा रही हैं। सर्वेक्षण के अनुसार 51 प्रतिशत माता-पिता बच्चों की शारीरिक सुरक्षा, बढ़ते प्रदूषण और खराब पर्यावरणीय परिस्थितियों को लेकर चिंतित हैं। महानगरों में सीमित खुले स्थान, यातायात का दबाव और वायु प्रदूषण बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए गंभीर चुनौतियां बनते जा रहे हैं।