संयुक्त राष्ट्र की वर्ल्ड सिटी रिपोर्ट 2026 ने वैश्विक आवास व्यवस्था को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत आबादी ऐसे घरों में रहने को मजबूर है जो या तो अत्यधिक महंगे हैं, पर्याप्त सुविधाओं से वंचित हैं अथवा सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरते। तेजी से हो रहे शहरीकरण और बढ़ती जनसंख्या ने अधिकांश देशों की आवासीय क्षमता पर भारी दबाव डाल दिया है, जिससे करोड़ों लोगों के लिए गुणवत्तापूर्ण और किफायती आवास एक बड़ी चुनौती बन गया है।
2050 तक दो अरब नई शहरी आबादी बढ़ाएगी दबाव
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2050 तक दुनिया के शहरों में लगभग दो अरब नए लोग जुड़ सकते हैं। इतनी बड़ी आबादी के लिए आवास, परिवहन, जल, ऊर्जा और अन्य बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करना सरकारों के लिए बड़ी चुनौती होगी। यदि वर्तमान गति से आवास निर्माण और शहरी नियोजन जारी रहा तो आने वाले वर्षों में झुग्गी बस्तियों का विस्तार, किराए में वृद्धि और आवासीय असमानता और अधिक बढ़ सकती है।
घर खरीदना ही नहीं, किराए पर रहना भी हुआ मुश्किल
दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों में घरों की कीमतें लोगों की आय की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ी हैं। रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर लगभग 44 प्रतिशत किरायेदार परिवार अपनी कुल आय का 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल किराया चुकाने में खर्च कर रहे हैं। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और बचत जैसे अन्य आवश्यक क्षेत्रों पर खर्च करने की उनकी क्षमता प्रभावित हो रही है। बढ़ती महंगाई और सीमित आय ने मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के लिए आवासीय सुरक्षा को कमजोर कर दिया है।
दुनिया में लगातार बढ़ रही है घरों की कमी
आवास संकट का एक बड़ा कारण उपलब्ध घरों की कमी भी है। वर्ष 2010 में वैश्विक स्तर पर लगभग 25.1 करोड़ घरों की कमी दर्ज की गई थी, जो वर्ष 2023 तक बढ़कर 28.8 करोड़ हो गई। यह आंकड़ा दर्शाता है कि बढ़ती मांग के मुकाबले नए आवासों का निर्माण पर्याप्त गति से नहीं हो पा रहा है। कई देशों में भूमि की बढ़ती कीमत, निर्माण लागत में वृद्धि और शहरी नियोजन संबंधी चुनौतियां इस समस्या को और जटिल बना रही हैं।
भारत में घट रही किफायती घरों की हिस्सेदारी
भारत भी इस वैश्विक संकट से अछूता नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार देश के प्रमुख महानगरों में किफायती आवासों की उपलब्धता तेजी से कम हुई है। वर्ष 2018 में आठ बड़े शहरों में बनने वाले कुल घरों में 52 प्रतिशत हिस्सेदारी किफायती आवासों की थी, लेकिन वर्ष 2025 तक यह घटकर केवल 17 प्रतिशत रह गई। रियल एस्टेट कंपनियां अधिक लाभ वाले मध्यम और प्रीमियम वर्ग के प्रोजेक्ट्स पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, जिससे आम लोगों के लिए घर खरीदना लगातार कठिन होता जा रहा है।
दक्षिण एशिया में आवास निवेश बन सकता है विकास का इंजन
रिपोर्ट में दक्षिण एशिया को आवास क्षेत्र में निवेश के लिए अत्यंत संभावनाशील क्षेत्र बताया गया है। अध्ययन के अनुसार आवास निर्माण पर खर्च किया गया प्रत्येक एक अमेरिकी डॉलर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग पांच डॉलर की आर्थिक गतिविधि उत्पन्न कर सकता है। इससे रोजगार सृजन, निर्माण उद्योग, सीमेंट, इस्पात, परिवहन और वित्तीय सेवाओं जैसे अनेक क्षेत्रों को लाभ मिल सकता है। इसलिए हाउसिंग सेक्टर में निवेश केवल सामाजिक आवश्यकता ही नहीं बल्कि आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण माध्यम भी बन सकता है।
प्रधानमंत्री आवास योजना से मिली कुछ राहत
आवास संकट के बीच प्रधानमंत्री आवास योजना ने लाखों परिवारों को राहत पहुंचाई है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010 में सब्सिडी आधारित आवास योजनाओं की पहुंच केवल 0.3 प्रतिशत परिवारों तक थी, जो वर्ष 2023 तक बढ़कर 7 प्रतिशत हो गई। पीएम आवास योजना (शहरी) के तहत अब तक लगभग 1.2 करोड़ घरों को मंजूरी दी जा चुकी है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की मांग को देखते हुए किफायती आवास निर्माण की गति और बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि हर परिवार को सुरक्षित और सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराया जा सके।