नई दिल्ली - हिमालय जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों से गुजर रहा है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और बदलते मौसम के कारण हिमालयी क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर झीलों से जुड़ी आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। हालिया रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि इसका असर सिर्फ पहाड़ी इलाकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था और जल सुरक्षा पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

पिछले दशक के मुकाबले 65% तेज हुई बर्फ पिघलने की रफ्तार
‘सिस्टेमिक’, ‘इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव’, ICIMOD और जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट से जुड़ी रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार में चिंताजनक बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को जलवायु परिवर्तन से जोड़ते हुए कहा गया है कि हिमालयी पर्यावरण में हो रहा बदलाव आने वाले समय में पानी, खेती, ऊर्जा और पर्यटन जैसे क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है।
नेपाल और तिब्बत की बाढ़ ने बढ़ाई चिंता
हाल में नेपाल और तिब्बत में आई भीषण बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती आपदा संवेदनशीलता को फिर सामने ला दिया है। इन घटनाओं में 1,300 से ज्यादा लोगों की मौत का दावा किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लेशियरों के पिघलने, भारी बारिश और तेजी से बदलते मौसम के बीच हिमालयी इलाकों में अचानक बाढ़ और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम बढ़ सकता है।
हिमालय पर टिकी अर्थव्यवस्था के कई अहम क्षेत्र
हिमालयी क्षेत्र भारत के लिए सिर्फ प्राकृतिक संपदा नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध देश की अर्थव्यवस्था से भी है। इस क्षेत्र से निकलने वाली नदियां सिंचाई और पेयजल के साथ-साथ कृषि, हाइड्रोपावर और पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण हैं। गेहूं, चावल और चाय जैसी फसलों के अलावा पनबिजली परियोजनाएं और धार्मिक पर्यटन भी हिमालयी जलतंत्र पर निर्भर हैं। रिपोर्ट में हिमालय के प्राकृतिक जलतंत्र को भारत की अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से से जोड़कर देखा गया है।
हालांकि, यह कहना कि ग्लेशियरों के पिघलने से भारत की ठीक 20% जीडीपी खत्म हो जाएगी, एक संभावित जोखिम का आकलन है, न कि निश्चित आर्थिक परिणाम। इसका वास्तविक प्रभाव भविष्य की जलवायु परिस्थितियों और उठाए गए कदमों पर निर्भर करेगा।
56 ग्लेशियर झीलें ‘अति-उच्च जोखिम’ वाली
हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों के बढ़ते खतरे को लेकर भी चिंता जताई गई है। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में 189 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों का वैज्ञानिक आकलन किया गया है। इनमें से 56 झीलों को अति-उच्च जोखिम की श्रेणी में रखा गया है। ग्लेशियर झीलों के फटने से अचानक बड़े पैमाने पर पानी नीचे की ओर आने का खतरा रहता है, जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसी घटनाएं जान-माल और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं।
2,485 झीलों पर रखी जा रही नजर
केंद्रीय जल आयोग हिमालयी नदी बेसिनों में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,485 झीलों की निगरानी कर रहा है। इसका उद्देश्य संभावित जोखिमों की पहचान करना और समय रहते जरूरी कदम उठाना है। हिमालय में बदलते पर्यावरण को देखते हुए वैज्ञानिक निगरानी, आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित निर्माण और स्थानीय समुदायों की तैयारी को मजबूत करना बेहद जरूरी माना जा रहा है। आने वाले वर्षों में हिमालय की सुरक्षा सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत की जल, खाद्य, ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ा सवाल बन सकती है।