गुवाहाटी. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब केवल बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं रह गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान के साथ वातावरण में बढ़ती नमी इंसानी स्वास्थ्य के लिए कहीं अधिक गंभीर खतरा बनती जा रही है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक विस्तृत अध्ययन में भारत को दुनिया का सबसे अधिक प्रभावित देश बताया गया है, जहां खतरनाक स्तर की उमस भरी गर्मी के संपर्क में आने वाले लोगों की संख्या सबसे अधिक है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: एटमॉस्फियर्स में प्रकाशित हुआ है और इसमें वर्ष 1950 से 2020 तक के वैश्विक आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।
शोध के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती जनसंख्या ने मिलकर इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में बड़ी आबादी खुले वातावरण में काम करती है, जिससे अत्यधिक नमी और गर्मी का संयुक्त प्रभाव स्वास्थ्य पर व्यापक असर डाल रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही तो आने वाले वर्षों में यह चुनौती सार्वजनिक स्वास्थ्य, श्रम उत्पादकता और आर्थिक विकास पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।
‘वेट बल्ब ग्लोब टेम्परेचर’ ने खोली वास्तविक खतरे की तस्वीर
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने केवल सामान्य तापमान के बजाय वेट बल्ब ग्लोब टेम्परेचर (WBGT) और ह्यूमिडेक्स जैसे वैज्ञानिक सूचकांकों का उपयोग किया। ये सूचकांक केवल हवा का तापमान नहीं मापते, बल्कि उसमें मौजूद नमी, सूर्य के विकिरण और हवा की गति जैसे कारकों को भी शामिल करते हैं। यही कारण है कि ये मानव शरीर पर पड़ने वाले वास्तविक तापीय दबाव का अधिक सटीक आकलन करते हैं।
शोधकर्ताओं ने 33 डिग्री सेल्सियस से अधिक के WBGT को अत्यंत खतरनाक स्तर माना है। इस स्तर पर लंबे समय तक शारीरिक श्रम करना हीट स्ट्रेस, निर्जलीकरण, हीट स्ट्रोक, अंगों की कार्यक्षमता प्रभावित होने और कई मामलों में मृत्यु तक का कारण बन सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कई बार वास्तविक तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से कम होता है, लेकिन अधिक नमी के कारण शरीर को महसूस होने वाली गर्मी उससे कहीं अधिक हो जाती है।
सात दशक में 19 गुना बढ़ा भारत का जोखिम
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ताओं में शामिल वैज्ञानिक डॉ. सुबोध कुमार साहा के अनुसार, वैश्विक स्तर पर खतरनाक नमी वाली गर्मी के संपर्क में आने की दर वर्ष 1950 के दशक की तुलना में लगभग 16 गुना बढ़ चुकी है। शुरुआती दशकों में यह आंकड़ा लगभग 12 अरब ‘पर्सन-आवर’ था, जो 2020 के दशक में बढ़कर लगभग 195 अरब ‘पर्सन-आवर’ तक पहुंच गया है। लेकिन भारत में यह वृद्धि वैश्विक औसत से भी अधिक रही है।
शोध के अनुसार, भारत में इस प्रकार की गर्मी के संपर्क में आने की दर लगभग 19 गुना बढ़ी है और वैश्विक वृद्धि का लगभग आधा हिस्सा अकेले भारत से जुड़ा हुआ है। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि देश की विशाल आबादी कृषि, निर्माण, परिवहन, उद्योग और असंगठित क्षेत्र में खुले वातावरण में कार्य करती है। ऐसे में अत्यधिक उमस वाली गर्मी का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देश की आर्थिक गतिविधियों पर भी प्रत्यक्ष असर डालता है।
सबसे अधिक खतरे में खुले में काम करने वाले श्रमिक
अध्ययन में संभावित व्यावसायिक उत्पादकता हानि (Potential Occupational Productivity Loss) का भी विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि भारत की कामकाजी आयु वर्ग की आबादी पर इस प्रकार की गर्मी का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। वर्ष 1950 के दशक में एक व्यक्ति औसतन वर्षभर में लगभग 12 कार्य-दिवस के बराबर समय खतरनाक उमस वाली गर्मी के संपर्क में बिताता था। अब यह बढ़कर लगभग 65 आठ-घंटे के कार्य-दिवस के बराबर पहुंच चुका है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि श्रमिकों को अधिक समय तक सुरक्षित ढंग से काम करना कठिन हो रहा है। निर्माण स्थलों, खेतों, फैक्ट्रियों, बंदरगाहों, खदानों और सड़क निर्माण जैसे क्षेत्रों में कार्यरत लोगों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है। अत्यधिक गर्मी और नमी के कारण कार्यक्षमता घटती है, दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ता है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं तेजी से सामने आती हैं। इससे उत्पादन, आय और श्रम क्षमता तीनों प्रभावित होती हैं।
उत्तर-पश्चिम भारत में तेजी से बदल रही स्थिति
शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से उत्तर-पश्चिम भारत को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अध्ययन के अनुसार दिल्ली सहित उत्तर-पश्चिमी राज्यों में पिछले चार दशकों के दौरान नमी वाली भीषण गर्मी के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। यहां कई बार वास्तविक तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से कम होता है, लेकिन अधिक आर्द्रता के कारण शरीर पर पड़ने वाला तापीय प्रभाव लगभग 45 डिग्री या उससे अधिक महसूस होता है।
वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि वर्ष 1980 के दशक के बाद इस प्रवृत्ति में अचानक तेजी आई। इसके पीछे बढ़ते वैश्विक तापमान, हिंद-प्रशांत महासागर क्षेत्र में गर्म जल क्षेत्र (इंडो-पैसिफिक वार्म पूल) में हो रहे परिवर्तन तथा भारत की तेजी से बढ़ती जनसंख्या जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं। वर्ष 1950 के बाद देश की कामकाजी आयु वर्ग की आबादी लगभग दोगुनी हो चुकी है, जिससे जोखिम के दायरे में आने वाले लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।
जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ेगी स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि की वर्तमान गति जारी रहती है तो आने वाले वर्षों में अत्यधिक उमस वाली गर्मी भारत के लिए सबसे बड़ी जलवायु चुनौतियों में से एक बन सकती है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ेगा, श्रम उत्पादकता में गिरावट आएगी, कृषि कार्य प्रभावित होंगे और शहरी क्षेत्रों में ऊर्जा की मांग भी तेजी से बढ़ेगी। विशेष रूप से बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं और पहले से बीमार लोग इस प्रकार की परिस्थितियों में अधिक संवेदनशील माने जाते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल तापमान कम करने के उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना, श्रमिकों के लिए कार्य समय में बदलाव, पर्याप्त पेयजल और विश्राम की व्यवस्था, हीट एक्शन प्लान को मजबूत करना तथा मौसम पूर्व चेतावनी प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना समय की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुरूप सार्वजनिक नीतियों में बदलाव किए बिना इस बढ़ती चुनौती का सामना करना कठिन होगा।
वैज्ञानिकों की चेतावनी—अब केवल तापमान नहीं, उमस पर भी रखनी होगी नजर
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि भविष्य में मौसम संबंधी जोखिमों का आकलन केवल अधिकतम तापमान के आधार पर नहीं किया जा सकता। तापमान और नमी का संयुक्त प्रभाव मानव शरीर पर कहीं अधिक गंभीर असर डालता है। इसलिए मौसम विभागों, स्वास्थ्य एजेंसियों और नीति निर्माताओं को ऐसे वैज्ञानिक सूचकांकों को अधिक महत्व देना होगा, जो वास्तविक हीट स्ट्रेस का आकलन कर सकें।
भारत में बढ़ती आबादी, तेजी से हो रहा शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन मिलकर इस चुनौती को और जटिल बना रहे हैं। ऐसे में समय रहते प्रभावी रणनीति अपनाना केवल स्वास्थ्य सुरक्षा का ही नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और सतत विकास का भी महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि अनुकूलन उपायों को प्राथमिकता नहीं दी गई तो आने वाले दशकों में खतरनाक उमस वाली गर्मी भारत के लिए सबसे बड़ी पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल हो सकती है।