भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून इस सीजन में लगातार असमान व्यवहार कर रहा है। जून के अंत में देशव्यापी बारिश की कमी करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जिसके बाद जुलाई और अगस्त की बारिश ने स्थिति में कुछ सुधार किया। हालांकि, 13 अगस्त तक देश में संचयी बारिश अभी भी दीर्घकालिक औसत से 12 प्रतिशत कम रही। अगस्त के पहले पखवाड़े में कई हिस्सों में अच्छी बारिश हुई, लेकिन यह बारिश इतनी व्यापक और लगातार नहीं रही कि पूरे देश की मौसमी कमी में बड़ा सुधार हो सके। अब मौसम पूर्वानुमानों में अगस्त के दूसरे हिस्से में मानसूनी गतिविधियों के कमजोर पड़ने की संभावना जताई जा रही है, जिससे कृषि क्षेत्र की चिंता बढ़ गई है।
खरीफ फसलों के लिए अगला पखवाड़ा बेहद अहम
सोयाबीन, धान, मक्का और कपास समेत कई प्रमुख खरीफ फसलें इस समय विकास के ऐसे चरण में पहुंच रही हैं, जो आगे चलकर उनकी अंतिम पैदावार तय करेंगे। ऐसे में अगले करीब 15 दिन इन फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इस समय केवल कुल बारिश की मात्रा देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह देखना ज्यादा जरूरी है कि खेतों को जरूरत के समय पर्याप्त नमी मिल रही है या नहीं। यदि बारिश के बीच लंबा शुष्क अंतराल आया तो मिट्टी की नमी तेजी से घट सकती है और फसलों की वृद्धि तथा दाने बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
बुवाई लगभग पूरी, अब पैदावार पर निर्भर फसल
इस साल खरीफ फसलों की बुवाई का मौसम लगभग समाप्त हो चुका है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 14 अगस्त तक खरीफ फसलों की कुल बुवाई का क्षेत्र पिछले साल की समान अवधि की तुलना में करीब 2 प्रतिशत कम रहा। धान का रकबा लगभग 3.7 प्रतिशत घटा है, जबकि अरहर और मक्का की बुवाई में करीब 4 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। कपास का रकबा लगभग 1 प्रतिशत और गन्ने का करीब 0.5 प्रतिशत कम रहा। अब अतिरिक्त बुवाई की गुंजाइश सीमित होने के कारण इस साल के उत्पादन का बड़ा हिस्सा इस बात पर निर्भर करेगा कि पहले से बोई गई फसलों को अगस्त और सितंबर में कितनी पर्याप्त नमी मिलती है।
मानसून ट्रफ के उत्तर की ओर खिसकने का असर
भारत मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वानुमानों ने भी मानसून की आगे की स्थिति को लेकर सावधानी का संकेत दिया है। 31 जुलाई के दीर्घावधि पूर्वानुमान में अगस्त और सितंबर दोनों महीनों में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई गई थी। अगस्त में बारिश दीर्घावधि औसत 254.9 मिलीमीटर की करीब 94 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। अगस्त के शुरुआती दिनों में बारिश लगभग सामान्य रहने के बाद इसके दूसरे हिस्से में गतिविधि कमजोर पड़ने की संभावना जताई गई थी। 13 अगस्त के विस्तारित पूर्वानुमान में भी 13 से 19 अगस्त के बीच लगभग सामान्य बारिश और 20 से 26 अगस्त के दौरान सामान्य से कम बारिश की संभावना बताई गई है। इस दौरान मानसून ट्रफ के दोबारा हिमालय की तलहटी की ओर खिसकने से देश के अलग-अलग हिस्सों में बारिश का वितरण और अधिक असमान हो सकता है।
देशभर की औसत बारिश से ज्यादा महत्वपूर्ण है स्थानीय स्थिति
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खरीफ फसलों के लिए देशव्यापी 12 प्रतिशत बारिश की कमी अपने आप में पूरी तस्वीर नहीं बताती। किसी जिले में लगातार बारिश और जलभराव हो सकता है, जबकि कुछ ही दूरी पर स्थित दूसरे इलाके में लंबे समय तक बारिश नहीं होने से खेत सूखे रह सकते हैं। प्रयागराज स्थित कृषि विशेषज्ञ भास्कर दुबे के अनुसार इस समय सबसे बड़ी चिंता कुल मौसमी कमी नहीं, बल्कि बारिश का असमान वितरण, लंबे शुष्क दौर और फसल के महत्वपूर्ण विकास चरणों में मिट्टी की नमी की उपलब्धता है। यही कारण है कि कृषि पर मौसम के असर को समझने के लिए जिला और क्षेत्र स्तर के आंकड़े अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
तेज बारिश भी हमेशा फसल के लिए फायदेमंद नहीं
कृषि क्षेत्र में केवल बारिश की मात्रा बढ़ जाना अच्छी फसल की गारंटी नहीं है। यदि एक-दो दिनों में बहुत ज्यादा बारिश हो और उसके बाद लंबे समय तक मौसम सूखा रहे, तो अतिरिक्त पानी फसल के लिए स्थायी लाभ नहीं देता। भारी बारिश से कई इलाकों में जलभराव और बाढ़ की स्थिति बन सकती है, जबकि बारिश के बाद शुष्क मौसम आने पर मिट्टी की नमी तेजी से कम हो सकती है। इस साल भी अलग-अलग क्षेत्रों में बाढ़ और बारिश की कमी दोनों तरह की परिस्थितियां देखने को मिल रही हैं। इससे स्पष्ट होता है कि बारिश का समय, वितरण और अंतराल खरीफ उत्पादन के लिए कुल वर्षा जितने ही महत्वपूर्ण हैं।
अगस्त-सितंबर की बारिश पर टिकी उम्मीद
अब किसानों और कृषि क्षेत्र की निगाहें अगस्त के बाकी दिनों और सितंबर की बारिश पर टिकी हैं। खरीफ फसलों के विकास के लिए इस अवधि में पर्याप्त और नियमित नमी मिलना जरूरी होगा। यदि मानसून कमजोर पड़ता है और लंबे शुष्क दौर बढ़ते हैं तो सोयाबीन, मक्का, धान और अन्य फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, यदि बारिश संतुलित रूप से होती है तो मौजूदा कमी के बावजूद फसल उत्पादन को संभालने का अवसर बना रहेगा। इसलिए आने वाले सप्ताह इस साल के खरीफ उत्पादन की वास्तविक तस्वीर तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।