NEET-UG परीक्षा को लेकर बिहार से एक बार फिर चौंकाने वाला मामला सामने आया है। परीक्षा में धांधली के खुलासे के बाद जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे सॉल्वर गैंग के नेटवर्क की नई परतें खुल रही हैं। पुलिस जांच में सामने आया है कि गिरोह ने सिर्फ फर्जी परीक्षार्थियों को बैठाने तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि परीक्षा केंद्रों पर मौजूद बायोमेट्रिक सत्यापन प्रणाली में भी सेंध लगा दी थी। जांच एजेंसियों के मुताबिक, बायोमेट्रिक प्रक्रिया से जुड़े कुछ कर्मियों की कथित मिलीभगत से असली अभ्यर्थियों की जगह दूसरे लोगों को परीक्षा केंद्रों के अंदर प्रवेश दिलाया गया। इसके बाद मेडिकल कॉलेजों के छात्रों को सॉल्वर बनाकर परीक्षा दिलाई गई।
मेडिकल कॉलेज का छात्र निकला पूरे रैकेट का मास्टरमाइंड
पुलिस सूत्रों के अनुसार, अब तक की जांच में पावापुरी मेडिकल कॉलेज, राजगीर के छात्र रविशंकर का नाम मुख्य संचालक के रूप में सामने आया है। आरोप है कि उसने विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे छात्रों को सॉल्वर के रूप में तैयार किया और उन्हें परीक्षा में बैठाने की पूरी योजना बनाई। गिरोह ऐसे अभ्यर्थियों की तलाश करता था, जो किसी भी कीमत पर मेडिकल कॉलेज में दाखिला चाहते थे। इसके बदले उनसे मोटी रकम वसूली जाती थी।
बायोमेट्रिक स्टाफ बनकर पहुंचा मेडिकल छात्र
जांच में एक और बड़ा खुलासा हुआ है। पटना मेडिकल कॉलेज के चौथे वर्ष के छात्र और हाजीपुर निवासी मयंक कश्यप पर आरोप है कि उसने अंकित कुमार के नाम से बायोमेट्रिक स्टाफ के रूप में काम किया। इसी के जरिए गिरोह ने बायोमेट्रिक सत्यापन प्रक्रिया को प्रभावित किया और फर्जी परीक्षार्थियों को केंद्र के भीतर प्रवेश दिलाने में सफलता हासिल की। इसके बाद वास्तविक उम्मीदवारों की जगह सॉल्वर परीक्षा में शामिल हुए।
अब तक 30 लोग गिरफ्तार, 9 सॉल्वर भी मेडिकल छात्र
पुलिस ने इस मामले में अब तक कुल 30 लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें नौ सॉल्वर ऐसे हैं, जो खुद मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे छात्र बताए जा रहे हैं। इसके अलावा बायोमेट्रिक एजेंसी से जुड़े कर्मी, गिरोह के सदस्य और एक मूल परीक्षार्थी को भी गिरफ्तार किया गया है। कई अन्य संदिग्धों से पूछताछ जारी है। अधिकारियों का मानना है कि जांच आगे बढ़ने के साथ इस नेटवर्क से जुड़े कई और नाम सामने आ सकते हैं।
एक सीट के लिए 10 से 12 लाख रुपये का सौदा
लखीसराय के एसडीपीओ शिवम कुमार के अनुसार, प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि प्रत्येक अभ्यर्थी से 10 से 12 लाख रुपये में सौदा तय किया गया था। इसमें एक से दो लाख रुपये एडवांस लिए जाते थे, जबकि बाकी रकम परीक्षा में सफलता और मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिलने के बाद वसूली जानी थी। अब पुलिस बैंक खातों, मोबाइल कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल ट्रांजैक्शन की भी जांच कर रही है, ताकि पूरे आर्थिक नेटवर्क का पता लगाया जा सके।
FIR दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू
इस मामले में केंद्रीय विद्यालय लखीसराय के प्रभारी प्राचार्य और सिटी कोऑर्डिनेटर दिनेश कुमार भगत के आवेदन पर प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। पुलिस का कहना है कि जांच का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है और इस पूरे रैकेट में शामिल हर व्यक्ति की भूमिका की बारीकी से जांच की जा रही है।
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