नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में लाल किले पर आयोजित 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की गैरमौजूदगी चर्चा का विषय बनी रही। दोनों वरिष्ठ नेता लगातार दूसरे वर्ष इस राष्ट्रीय समारोह में शामिल नहीं हुए। स्वतंत्रता दिवस का आयोजन देश के सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यक्रमों में माना जाता है, जिसमें विभिन्न दलों के नेताओं, संवैधानिक पदाधिकारियों, सैन्य अधिकारियों और विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति रहती है।
राहुल गांधी के लिए तय थी प्रोटोकॉल के अनुसार सीट
इस वर्ष समारोह में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते राहुल गांधी के लिए प्रोटोकॉल के अनुसार केंद्रीय मंत्रिपरिषद के सदस्यों के ठीक बाद बैठने की व्यवस्था निर्धारित की गई थी। यह व्यवस्था 'टेबल ऑफ प्रेसीडेंस' के अनुरूप मानी जाती है, जिसके आधार पर राष्ट्रीय आयोजनों में गणमान्य व्यक्तियों के बैठने का क्रम तय किया जाता है। हालांकि, निर्धारित सीट होने के बावजूद राहुल गांधी समारोह में शामिल नहीं हुए।
पिछले वर्ष बैठने की व्यवस्था पर हुआ था विवाद
स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान बैठने की व्यवस्था को लेकर वर्ष 2025 (पिछले वर्ष आयोजित समारोह) में भी राजनीतिक विवाद सामने आया था। उस समय राहुल गांधी को विपक्ष के अनुसार परंपरागत प्रोटोकॉल से अलग दूसरी अंतिम पंक्ति में स्थान दिए जाने पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। विपक्ष ने इसे नेता प्रतिपक्ष के पद और लोकतांत्रिक परंपराओं के सम्मान से जुड़ा मुद्दा बताया था।
दूसरी ओर, कार्यक्रम का आयोजन करने वाले रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि उस वर्ष पेरिस ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले भारतीय खिलाड़ियों को विशेष सम्मान देने और उनके लिए स्थान सुनिश्चित करने के कारण बैठने की व्यवस्था में बदलाव किया गया था। मंत्रालय ने इसे प्रशासनिक आवश्यकता बताया था और किसी राजनीतिक उद्देश्य से इनकार किया था।
संसद सत्र के बाद बढ़ी राजनीतिक दूरी
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की अनुपस्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब संसद का मानसून सत्र हाल ही में समाप्त हुआ है। सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर तीखा टकराव देखने को मिला। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर संसद की कार्यवाही बाधित करने के आरोप लगाए। कई महत्वपूर्ण विषयों पर लगातार गतिरोध बना रहा, जिसके कारण सदन की कार्यवाही बार-बार प्रभावित हुई।
हालांकि सत्र के दौरान कुल 12 विधेयक पारित किए गए, लेकिन विस्तृत चर्चा सीमित विषयों पर ही हो सकी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हालिया संसदीय टकराव ने सरकार और विपक्ष के बीच संवाद की दूरी को और स्पष्ट किया है।
चाय पार्टी के बहिष्कार से भी दिया था राजनीतिक संदेश
मानसून सत्र समाप्त होने के बाद कांग्रेस ने अपने सहयोगी दलों तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सहित अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा आयोजित पारंपरिक चाय पार्टी का भी बहिष्कार किया था। विपक्ष ने इसे राजनीतिक असहमति और संसदीय मुद्दों पर अपने विरोध का प्रतीकात्मक कदम बताया था। इस घटनाक्रम ने पहले ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ती राजनीतिक दूरी को रेखांकित किया था।
राष्ट्रीय आयोजनों में उपस्थिति पर फिर उठे सवाल
लगातार दूसरे वर्ष कांग्रेस के दोनों शीर्ष नेताओं की अनुपस्थिति ने राष्ट्रीय आयोजनों में राजनीतिक दलों की भागीदारी को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। हालांकि, उनकी अनुपस्थिति के कारणों पर आधिकारिक स्तर पर कोई विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि ऐसे राष्ट्रीय अवसरों पर सभी दलों की उपस्थिति लोकतांत्रिक परंपराओं और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक मानी जाती है, जबकि अनुपस्थिति को अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोणों से देखा जाता है।
स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर देश की लोकतांत्रिक विरासत और स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को याद करने का अवसर होते हैं। ऐसे आयोजनों में प्रमुख राजनीतिक नेताओं की मौजूदगी या गैरमौजूदगी स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाती है।