पटना: बिहार की धरती पर कई ऐसे प्राचीन धार्मिक स्थल हैं, जिनसे जुड़ी आस्था और लोककथाएं आज भी लोगों को अपनी ओर खींचती हैं। इन्हीं में से एक है बिहटा के पास स्थित मां वन देवी मंदिर, जिसे स्थानीय लोग करीब 350 से 400 साल पुराना बताते हैं। घने जंगल और ग्रामीण परिवेश के बीच स्थित यह मंदिर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही आध्यात्मिक मान्यताओं और रहस्यमयी लोककथाओं का केंद्र भी रहा है।
जंगल के बीच विराजमान हैं मां वन देवी
पटना से करीब 35 किलोमीटर दूर बिहटा क्षेत्र में स्थित मां वन देवी मंदिर अमहरा, राघोपुर और कंचनपुर गांवों की सीमाओं के आसपास बताया जाता है। जंगल के बीच स्थित इस धार्मिक स्थल का वातावरण सामान्य मंदिरों से काफी अलग है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर की सबसे बड़ी पहचान मां वन देवी के प्रति गहरी आस्था और उनसे जुड़ी पीढ़ियों पुरानी मान्यताएं हैं।
प्रतिमा नहीं, पवित्र पिंड के रूप में होती है पूजा
मां वन देवी की पूजा यहां पारंपरिक प्रतिमा के बजाय पवित्र पिंड के स्वरूप में किए जाने की बात कही जाती है। स्थानीय श्रद्धालु वन देवी को जंगल की रक्षक शक्ति के रूप में देखते हैं। मान्यता है कि मां वन देवी अपने क्षेत्र और वहां रहने वाले लोगों की रक्षा करती हैं। इसी विश्वास के कारण आसपास के ग्रामीणों के बीच इस स्थान की धार्मिक महत्ता लंबे समय से बनी हुई है।
मां विंध्यवासिनी से जुड़ी है मंदिर की स्थापना की लोककथा
मंदिर की स्थापना को लेकर एक पुरानी लोककथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि विद्यानंद मिश्रा मां विंध्यवासिनी के भक्त थे और नियमित रूप से विंध्याचल जाकर देवी की पूजा करते थे। उम्र बढ़ने के साथ जब उनके लिए इतनी दूर जाना मुश्किल होने लगा, तब लोकमान्यता के अनुसार देवी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए।
कहा जाता है कि देवी ने उन्हें स्थानीय क्षेत्र में पवित्र पिंड स्थापित करने का संकेत दिया। इसके बाद जंगल के बीच पिंड की स्थापना हुई और धीरे-धीरे यह स्थान मां वन देवी के पवित्र धाम के रूप में श्रद्धा का केंद्र बन गया। हालांकि, यह विवरण स्थानीय लोककथा और धार्मिक मान्यता का हिस्सा है, जिसका स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण स्पष्ट नहीं है।
सूर्यास्त के बाद बदल जाता है मंदिर का माहौल
मां वन देवी मंदिर से जुड़ी सबसे अनोखी मान्यता सूर्यास्त के बाद जंगल में प्रवेश और मंदिर में ठहरने को लेकर है। स्थानीय परंपरा के अनुसार शाम होने के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इसके बाद पुजारी भी मंदिर परिसर से चले जाते हैं और रात में यहां ठहरने की परंपरा नहीं है।
रात में वन देवी के जंगल में विचरण करने की मान्यता
स्थानीय लोकविश्वास में कहा जाता है कि सूर्यास्त के बाद मां वन देवी जंगल में विचरण करती हैं। इसी वजह से अंधेरा होने के बाद लोगों को जंगल और मंदिर परिसर से दूर रहने की सलाह दी जाती है। मंदिर से जुड़ी कथाओं में रात के समय यहां ठहरने को लेकर रहस्यमयी और डरावनी बातें भी सुनने को मिलती हैं।
हालांकि, इन घटनाओं और अलौकिक मान्यताओं की वैज्ञानिक रूप से पुष्टि नहीं हुई है। इन्हें स्थानीय लोगों की आस्था, मौखिक परंपरा और पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाओं के संदर्भ में ही समझना उचित है।
आखिर रात में क्यों नहीं रुकते लोग?
इस मंदिर की सबसे दिलचस्प बात यही है कि यहां दिन में श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है, लेकिन रात होते ही पूरा वातावरण शांत हो जाता है। स्थानीय विश्वास में जंगल को मां वन देवी का क्षेत्र माना जाता है और सूर्यास्त के बाद उस क्षेत्र में इंसानी गतिविधियों को सीमित रखने की परंपरा बन गई है।
यही मान्यता मंदिर की कहानी को आध्यात्मिकता के साथ-साथ रहस्य से भी जोड़ती है। लोगों के लिए यह केवल डर की कहानी नहीं, बल्कि देवी के प्रति सम्मान और उनके क्षेत्र की मर्यादा से जुड़ा विश्वास भी है।
लोककथा पहुंची बॉलीवुड तक
मां वन देवी मंदिर की कहानी अब बिहार के ग्रामीण क्षेत्र से निकलकर बॉलीवुड तक पहुंच चुकी है। सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म ‘The Vvaan: Force of the Forrest’ को इसी क्षेत्र की वन देवी से जुड़ी लोककथाओं से प्रेरित बताया गया है।
फिल्म की कहानी के पीछे वास्तविक स्थान और उससे जुड़ी लोकमान्यताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिल्मकारों ने स्थानीय लोगों और मंदिर से जुड़ी कहानियों को जाना और उसी रहस्यमयी वातावरण को सिनेमाई कहानी का हिस्सा बनाया।
मां की कहानी से शुरू हुआ फिल्म का सफर
फिल्म के लेखक अरुणाभ कुमार के बारे में रिपोर्टों में बताया गया है कि उन्हें वन देवी मंदिर से जुड़ी कहानी अपनी मां से सुनने को मिली थी। इसके बाद उन्होंने मंदिर का दौरा किया और स्थानीय लोगों, पुजारियों तथा ग्रामीणों से वहां की मान्यताओं और लोककथाओं को समझा।
बताया जाता है कि इसी अनुभव ने फिल्म की कहानी के लिए आधार तैयार किया। निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा के साथ इस विचार को आगे बढ़ाया गया और बिहार की स्थानीय लोककथा को बड़े पर्दे की कहानी में ढाला गया।
वास्तविक मंदिर और फिल्मी कहानी में फर्क
यहां यह समझना भी जरूरी है कि मंदिर, उसका धार्मिक महत्व और उससे जुड़ी लोककथाएं वास्तविक सांस्कृतिक संदर्भ का हिस्सा हैं, लेकिन फिल्म में दिखाई जाने वाली रहस्यमयी घटनाएं सिनेमाई प्रस्तुति हैं। यानी वास्तविक मंदिर से जुड़ी आस्था और फिल्म की कहानी को एक ही चीज मानना सही नहीं होगा।
आस्था, प्रकृति और रहस्य का अनोखा संगम
मां वन देवी मंदिर की कहानी में आध्यात्मिकता, प्रकृति और लोकविश्वास तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। जंगल के बीच स्थित देवी का धाम, पिंड स्वरूप में पूजा, सूर्यास्त के बाद मंदिर के कपाट बंद होने की परंपरा और रात में देवी के विचरण की मान्यता इस जगह को बिहार के दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है।
अब जब इस मंदिर से जुड़ी लोककथा बॉलीवुड फिल्म ‘The Vvaan: Force of the Forrest’ तक पहुंच गई है, तो देशभर में लोगों की दिलचस्पी इस प्राचीन धार्मिक स्थल को लेकर बढ़ी है। करीब चार सदियों से आस्था और लोककथाओं को अपने भीतर समेटे यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए मां वन देवी की शक्ति और संरक्षण का प्रतीक बना हुआ है।