सनातन धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष धार्मिक महत्व है। यह व्रत देवाधिदेव भगवान शिव को समर्पित होता है और प्रत्येक माह के कृष्ण व शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। जब किसी माह की त्रयोदशी शनिवार के दिन पड़ती है, तब उसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है। यह व्रत श्रद्धा और आस्था का प्रतीक माना जाता है।
शनि प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव के साथ-साथ शनि देव की भी विधिवत पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, मानसिक तनाव कम होता है, आर्थिक परेशानियों से राहत मिलती है और शनि से संबंधित दोष शांत होते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस वर्ष का पहला शनि प्रदोष व्रत कब रखा जाएगा, साथ ही इसका शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व क्या है।
शनि प्रदोष व्रत कब है?
पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि का आरंभ 14 फरवरी 2026 को शाम 4 बजकर 01 मिनट पर होगा, जबकि इसका समापन 15 फरवरी 2026 को शाम 5 बजकर 04 मिनट पर होगा। चूंकि प्रदोष व्रत में प्रदोष काल के दौरान भगवान शिव की पूजा की जाती है, इसलिए वर्ष का पहला शनि प्रदोष व्रत 14 फरवरी 2026 (शनिवार) को रखा जाएगा।
पूजा का शुभ मुहूर्त-
14 फरवरी 2026 को प्रदोष व्रत के दिन पूजा का शुभ समय शाम 6 बजकर 10 मिनट से शुरू होकर रात 8 बजकर 44 मिनट तक रहेगा। इस प्रकार भक्तों को पूजा के लिए लगभग 2 घंटे 34 मिनट का शुभ समय प्राप्त होगा।
शनि प्रदोष व्रत की पूजा विधि-
- इस दिन भक्त सूर्योदय से सूर्यास्त तक निर्जल या निराहार व्रत रखें, चाहें तो फलाहार कर सकते हैं।
- शाम को प्रदोष काल में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और विधिपूर्वक पूजा करें।
- शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और अक्षत अर्पित करें।
- इस दिन रुद्राभिषेक करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- इसके बाद शनि मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
- काले तिल, उड़द की दाल या लोहे से बनी वस्तुओं का दान करें।
शनि प्रदोष व्रत का महत्व-
शनि प्रदोष व्रत रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और शनि देव के अशुभ प्रभाव से मुक्ति मिलती है। इस व्रत के प्रभाव से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। मान्यता है कि इससे साढ़ेसाती, ढैय्या और कुंडली में स्थित शनि दोष का प्रभाव कम होता है। साथ ही यह व्रत राहु-केतु दोष और पितृ दोष की शांति के लिए भी अत्यंत फलदायी माना गया है।
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