वाशिंगटन. नासा का वॉयजर-1 अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष अन्वेषण के इतिहास में एक और असाधारण उपलब्धि दर्ज करने की ओर बढ़ रहा है। 5 सितंबर 1977 को प्रक्षेपित किया गया यह यान 18 नवंबर 2026 को पृथ्वी से लगभग 16.094 अरब मील यानी 25.902 अरब किलोमीटर दूर पहुंचने की उम्मीद है। यह दूरी एक प्रकाश-दिन के बराबर है, अर्थात वह फासला जिसे प्रकाश 24 घंटे में तय करता है। इस मुकाम पर पृथ्वी से भेजे गए रेडियो संकेतों को वॉयजर-1 तक पहुंचने में करीब एक दिन लगेगा। यान से जवाब लौटकर पृथ्वी तक आने में भी लगभग एक दिन का समय लगेगा। इस तरह किसी संदेश और उसके उत्तर के बीच करीब 48 घंटे का अंतर हो सकता है।
सौरमंडल की सीमाओं से आगे अंतरतारकीय अंतरिक्ष तक
वॉयजर-1 वर्ष 1977 से अंतरिक्ष में अपनी यात्रा जारी रखे हुए है और अब सूर्य के प्रभाव क्षेत्र से बहुत दूर अंतरतारकीय अंतरिक्ष में पहुंच चुका है। इसने हेलियोपॉज को पार किया है, जो वह सीमा है जहां सूर्य से निकलने वाली सौर हवाओं का प्रभाव बाहरी अंतरतारकीय माध्यम के प्रभाव के मुकाबले कमजोर पड़ने लगता है। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वॉयजर-1 अंतरतारकीय अंतरिक्ष में प्रवेश करने वाली मानव निर्मित पहली वस्तु बना था। पृथ्वी से लगातार बढ़ती दूरी के बावजूद इसके उपकरणों से मिलने वाला वैज्ञानिक आंकड़ा वैज्ञानिकों को सूर्य के प्रभाव क्षेत्र से बाहर के वातावरण को समझने में मदद करता रहा है।
बृहस्पति और शनि के रहस्यों से उठाया पर्दा
वॉयजर-1 की ऐतिहासिक पहचान केवल पृथ्वी से उसकी दूरी तक सीमित नहीं है। अपनी शुरुआती यात्रा में इसने बृहस्पति और शनि के बारे में ऐसी जानकारियां जुटाईं, जिन्होंने इन ग्रहों को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि बदल दी। बृहस्पति के अध्ययन के दौरान इसने ग्रह के चारों ओर एक पतली वलय संरचना और उसके दो उपग्रहों थेबे तथा मेटिस की जानकारी दी। शनि के पास पहुंचकर इसने पांच नए उपग्रहों और एक नई वलय संरचना की पहचान में योगदान दिया, जिसे जी-वलय कहा गया। इन खोजों ने बाहरी ग्रहों और उनके उपग्रहों की संरचना तथा गतिशीलता के अध्ययन को नई दिशा दी।
जुड़वां यान वॉयजर-2 को भी पीछे छोड़ा
वॉयजर-1 को अपने जुड़वां अंतरिक्ष यान वॉयजर-2 के बाद प्रक्षेपित किया गया था, लेकिन इसकी यात्रा का मार्ग और गति ऐसी रही कि इसने कुछ ही महीनों में अपने साथी को पीछे छोड़ दिया। 15 दिसंबर 1977 को यह वॉयजर-2 से आगे निकल गया। दोनों यानों को सौरमंडल के बाहरी ग्रहों के अध्ययन के लिए भेजा गया था, लेकिन उनकी अलग-अलग यात्राओं ने वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष के अलग-अलग क्षेत्रों से महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध कराईं। आज दोनों यान पृथ्वी से बेहद दूर हैं और सीमित ऊर्जा तथा तकनीकी संसाधनों के बावजूद अपना वैज्ञानिक मिशन जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं।
संपर्क में आई बाधा और स्वचालित सुरक्षा प्रणाली की भूमिका
हाल के दिनों में वॉयजर-1 से संपर्क को लेकर नासा के सामने तकनीकी चुनौती भी आई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 18 और 19 अक्टूबर को यान से संपर्क स्थापित करने के दो निर्धारित प्रयास सफल नहीं हुए, हालांकि 20 अक्टूबर को नासा ने दोबारा उसका संकेत प्राप्त कर लिया। इसी दौरान यान अपने आप बैकअप थ्रस्टर्स पर चला गया। इंजीनियर इस बदलाव के कारणों की जांच कर रहे हैं। अंतरिक्ष यान में ऐसी स्वचालित सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है, जो ऑनबोर्ड कंप्यूटरों के जरिए सक्रिय थ्रस्टर्स में संभावित समस्या का पता लगाती है। खतरे की आशंका होने पर यह प्रणाली यान को सुरक्षित स्थिति में लाने और सामान्य गतिविधियों को अस्थायी रूप से रोकने जैसी कार्रवाई कर सकती है, जिससे पृथ्वी पर मौजूद विशेषज्ञ समस्या का विश्लेषण कर सकें।
आधी सदी बाद भी विज्ञान को दे रहा है नई जानकारी
वॉयजर-1 का एक प्रकाश-दिन की दूरी तक पहुंचना केवल एक नया रिकॉर्ड नहीं होगा, बल्कि यह मानव तकनीक, वैज्ञानिक जिज्ञासा और अंतरिक्ष अन्वेषण की दीर्घकालिक क्षमता का प्रतीक भी बनेगा। लगभग 49 वर्षों से यात्रा कर रहा यह यान ऐसे क्षेत्र में काम कर रहा है, जहां से संकेतों का आदान-प्रदान बेहद धीमा और चुनौतीपूर्ण हो गया है। इसकी ऊर्जा सीमित है और वैज्ञानिकों को समय के साथ इसके कुछ उपकरणों तथा प्रणालियों को बंद करने जैसे कठिन निर्णय लेने पड़ रहे हैं। इसके बावजूद नासा की टीम उपलब्ध संसाधनों के सहारे यान को यथासंभव लंबे समय तक सक्रिय रखने का प्रयास कर रही है। यदि निर्धारित अनुमान के अनुसार 18 नवंबर 2026 को यह एक प्रकाश-दिन की दूरी तक पहुंचता है, तो यह मानव निर्मित किसी वस्तु की पृथ्वी से दूरी के इतिहास में एक यादगार पड़ाव होगा।