भारत के चिकित्सा इतिहास में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, अर्थात एम्स, केवल एक अस्पताल नहीं बल्कि उत्कृष्ट चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान और उपचार का राष्ट्रीय प्रतीक माना जाता है। आमतौर पर इसकी स्थापना का श्रेय तत्कालीन सरकार को दिया जाता है, लेकिन इसके पीछे जिस महिला की दूरदृष्टि, संघर्ष और अटूट संकल्प था, उसका नाम राजकुमारी अमृत कौर है। शाही परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने विलासिता का जीवन त्यागकर स्वतंत्रता आंदोलन, महिला अधिकारों और जनस्वास्थ्य को अपना जीवन समर्पित कर दिया। स्वतंत्र भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उन्होंने आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की ऐसी नींव रखी, जिसका लाभ आज करोड़ों भारतीयों को मिल रहा है।
शाही परिवार की बेटी, लेकिन जीवन का लक्ष्य था समाज सेवा
राजकुमारी अमृत कौर का जन्म 2 फरवरी 1889 को लखनऊ में कपूरथला के शाही परिवार से जुड़े राजा हरनाम सिंह के घर हुआ था। परिवार संपन्न था और शिक्षा के लिए उन्हें इंग्लैंड भेजा गया, जहां उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। विदेश में आधुनिक शिक्षा और वैचारिक वातावरण ने उनके व्यक्तित्व को व्यापक दृष्टि प्रदान की। हालांकि वे चाहतीं तो आरामदायक जीवन जी सकती थीं, लेकिन भारत लौटने के बाद उन्होंने देश की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को अपनी जीवन यात्रा का केंद्र बना लिया।
उनका झुकाव धीरे-धीरे सामाजिक सुधार की ओर बढ़ा। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, समान अधिकार और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध अभियान चलाना शुरू किया। बाल विवाह, पर्दा प्रथा और देवदासी जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ उनकी आवाज उस दौर में अत्यंत प्रभावशाली मानी गई। बाद में उन्होंने महिला सशक्तिकरण के लिए स्थापित अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
महात्मा गांधी के विचारों ने बदल दी जीवन की दिशा
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में महात्मा गांधी के विचारों ने अमृत कौर को गहराई से प्रभावित किया। प्रारंभ में गांधीजी ने उन्हें अपने आश्रम में स्थान देने से संकोच किया, क्योंकि उन्हें लगता था कि शाही परिवेश में पली-बढ़ी युवती आश्रम के कठिन जीवन को स्वीकार नहीं कर पाएगी। लेकिन अमृत कौर ने अपने कार्यों से यह साबित कर दिया कि उनका समर्पण केवल भावनात्मक नहीं बल्कि कर्मप्रधान है।
सामाजिक कार्यों में उनकी सक्रियता और राष्ट्रसेवा के प्रति प्रतिबद्धता देखकर अंततः गांधीजी ने उन्हें सेवाग्राम आश्रम में बुलाया। अगले लगभग सोलह वर्षों तक उन्होंने गांधीजी की निकट सहयोगी और सचिव के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने सादगी, स्वावलंबन और जनसेवा को अपने जीवन का स्थायी सिद्धांत बना लिया। खादी पहनना और समाज के सबसे कमजोर वर्गों के बीच काम करना उनकी पहचान बन गया।
स्वतंत्रता आंदोलन से संविधान निर्माण तक निभाई ऐतिहासिक भूमिका
राजकुमारी अमृत कौर केवल समाज सुधारक ही नहीं रहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की सक्रिय सेनानी भी बनीं। नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन और अंग्रेजों की विभाजनकारी नीतियों के विरुद्ध उन्होंने खुलकर संघर्ष किया। कई बार उन्हें गिरफ्तार किया गया, जेल भेजा गया और पुलिस की कठोर कार्रवाई का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
स्वतंत्रता के बाद उन्हें संविधान सभा का सदस्य चुना गया। मौलिक अधिकारों से संबंधित समिति में रहते हुए उन्होंने महिलाओं के अधिकारों, सामाजिक सुधार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने वाले प्रावधानों का समर्थन किया। उनका स्पष्ट मत था कि धर्म के नाम पर किसी भी सामाजिक कुरीति को संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। संविधान में समाज सुधार संबंधी कानूनों के लिए जो संवैधानिक आधार तैयार हुआ, उसमें उनके विचारों की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
पहली स्वास्थ्य मंत्री के रूप में रखी आधुनिक भारत की चिकित्सा व्यवस्था की नींव
स्वतंत्र भारत की पहली केंद्रीय मंत्रिपरिषद में राजकुमारी अमृत कौर को स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। उस समय देश विभाजन की त्रासदी, संक्रामक रोगों, सीमित चिकित्सा सुविधाओं और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा था। उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को केवल अस्पताल निर्माण तक सीमित न रखते हुए चिकित्सा शिक्षा, नर्सिंग प्रशिक्षण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार पर विशेष बल दिया।
उनके नेतृत्व में देश में आधुनिक नर्सिंग शिक्षा को बढ़ावा मिला और अनेक प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किए गए। सार्वजनिक स्वास्थ्य को राष्ट्र निर्माण का आधार मानते हुए उन्होंने ऐसी नीतियां तैयार कीं, जिनका प्रभाव आने वाले दशकों तक दिखाई देता रहा। स्वास्थ्य मंत्रालय में उनका कार्यकाल भारतीय चिकित्सा व्यवस्था के संस्थागत विकास का महत्वपूर्ण दौर माना जाता है।
एम्स की स्थापना का सपना, जिसने भारत की चिकित्सा व्यवस्था बदल दी
आज एम्स देश का सर्वोच्च चिकित्सा संस्थान माना जाता है, लेकिन इसकी स्थापना आसान नहीं थी। उस समय सीमित आर्थिक संसाधनों के कारण इतने बड़े संस्थान की आवश्यकता को लेकर सरकार के भीतर भी अलग-अलग मत थे। राजकुमारी अमृत कौर ने यह समझ लिया था कि यदि भारत को विश्वस्तरीय चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान और विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध कराना है तो एक ऐसे संस्थान की आवश्यकता होगी, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरे।
उन्होंने केवल विचार प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि इसके लिए संसाधन जुटाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विभिन्न देशों से आर्थिक सहयोग प्राप्त करने के प्रयास किए और व्यापक राजनीतिक सहमति बनाकर 1956 में एम्स संबंधी कानून पारित कराने में निर्णायक योगदान दिया। यही कारण है कि अनेक इतिहासकार और स्वास्थ्य विशेषज्ञ उन्हें एम्स की वास्तविक प्रेरक शक्ति मानते हैं। आज देशभर में स्थापित एम्स संस्थान उसी दूरदृष्टि का विस्तार हैं, जिसकी शुरुआत उन्होंने की थी।
विश्व स्वास्थ्य मंच पर भारत की प्रभावशाली पहचान बनीं अमृत कौर
राजकुमारी अमृत कौर का योगदान केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। वे विश्व स्वास्थ्य संगठन की विश्व स्वास्थ्य सभा की अध्यक्ष बनने वाली पहली महिला और पहली एशियाई थीं। यह उपलब्धि उस दौर में भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी गई। उन्होंने वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सहयोग, रोग नियंत्रण और चिकित्सा शिक्षा के विषयों पर भारत का प्रभावशाली प्रतिनिधित्व किया।
इसके अतिरिक्त भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी तथा महिला एवं बाल कल्याण से जुड़े अनेक संस्थानों के विकास में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। शिक्षा, विशेषकर बालिकाओं की शिक्षा और पोषण संबंधी कार्यक्रमों को उन्होंने हमेशा प्राथमिकता दी। दिल्ली के प्रसिद्ध लेडी इरविन कॉलेज की स्थापना और विकास में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय मानी जाती है।
विरासत जो आज भी हर भारतीय के जीवन को छूती है
6 फरवरी 1964 को राजकुमारी अमृत कौर का निधन हुआ, लेकिन उनके द्वारा स्थापित संस्थागत विरासत आज भी जीवंत है। एम्स जैसे चिकित्सा संस्थान, नर्सिंग शिक्षा का विस्तार, जनस्वास्थ्य की आधुनिक अवधारणा और महिलाओं के अधिकारों के लिए उनका संघर्ष उन्हें भारतीय इतिहास की सबसे प्रभावशाली महिला नेताओं में शामिल करता है।
आज जब देश में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, चिकित्सा अनुसंधान और आधुनिक अस्पतालों की चर्चा होती है, तब राजकुमारी अमृत कौर का योगदान स्वतः स्मरण हो उठता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि स्वस्थ, शिक्षित और सशक्त समाज के निर्माण से संभव होता है। इसी कारण भारतीय जनस्वास्थ्य के इतिहास में उनका नाम सदैव सम्मान और कृतज्ञता के साथ लिया जाता है।