नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के नेतृत्व में नई राष्ट्रीय समिति के गठन के बाद, अगले वर्ष होने वाले सात राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए तैयारियां जोरों पर शुरू हो गई हैं। इसमें देश के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली राज्य उत्तर प्रदेश को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पार्टी की नजरें एक बार फिर सत्ता पर टिकी हैं। पार्टी नेतृत्व ने राज्य में संभावित सत्ता विरोधी रुझानों (anti-incumbency) और विपक्षी दलों की रणनीतियों को ध्यान में रखते हुए अभी से चुनावी व्यूह-रचना तैयार करनी शुरू कर दी है।
दिल्ली में हुई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक
पिछले सप्ताह नई दिल्ली स्थित बीजेपी केंद्रीय कार्यालय में पार्टी के शीर्ष नेताओं ने उत्तर प्रदेश की राजनीतिक स्थिति और विपक्षी दलों की संभावित रणनीतिक चालों पर गहन मंथन किया। इस विश्लेषणात्मक बैठक में इस बात पर विशेष चर्चा हुई कि आगामी चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस एक बार फिर गठबंधन करके बीजेपी के सामने कड़ी चुनौती पेश कर सकती हैं। इसी संभावित चुनौती का मुकाबला करने और राज्य में पूर्ण बहुमत सुनिश्चित करने के लिए पार्टी ने अपनी तैयारियों को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है।
320 और 83 सीटों का प्रारंभिक फॉर्मूला
बीजेपी की राष्ट्रीय समिति की शुरुआती बैठकों में यह खाका खींचा गया है कि 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में बीजेपी खुद 320 सीटों पर चुनावी मैदान में उतरेगी, जबकि बाकी बची हुई 83 सीटें एनडीए के सहयोगियों के लिए छोड़ी जा सकती हैं। हालांकि, पार्टी सूत्रों का कहना है कि एनडीए सहयोगियों के साथ कई दौर की बातचीत के बाद यह प्राथमिक फॉर्मूला जरूर तैयार हुआ है, लेकिन इसे अभी अंतिम फैसला नहीं माना जा रहा है। जमीनी हकीकत (ground reality) और हर सीट के समीकरणों की विस्तृत समीक्षा के बाद ही इस पर अंतिम मुहर लगाई जाएगी।
शमीकरण और सहयोगियों को साधने की कवायद
साल 2022 के पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अपना दल (एस) और निषाद पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, जबकि बाद के चरणों में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) भी एनडीए गठबंधन का हिस्सा बन गए। वर्तमान में एनडीए खेमे में चार प्रमुख शरिक दल शामिल हैं। बीजेपी नेतृत्व यह अच्छी तरह समझता है कि सीट बंटवारे को लेकर किसी भी प्रकार का असंतोष गठबंधन के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। यही वजह है कि चुनाव से काफी पहले ही सीटों के इस शुरुआती तालमेल पर काम शुरू कर दिया गया है ताकि समय रहते सभी सहयोगियों को संतुष्ट किया जा सके।