कोलकाता: राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर शुक्रवार को कोलकाता के इंडियन म्यूजियम में इंडियन म्यूजियम और कलकत्ता टाइम्स की ओर से 'वोवन स्टोरीज़' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस आयोजन में हथकरघा की समृद्ध परंपरा, बुनकरों की मेहनत और भारतीय वस्त्र संस्कृति को अलग-अलग सत्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कलाकार, फैशन डिज़ाइनर, इतिहासकार और हैंडलूम प्रेमी मौजूद रहे। पूरे कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय हथकरघा की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और स्थानीय बुनकरों के काम को सम्मान देना था।
अग्निमित्रा पॉल ने साझा किए अपने अनुभव
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि पश्चिम बंगाल सरकार की शहरी विकास एवं नगर मामलों की मंत्री अग्निमित्रा पॉल रहीं। उन्होंने 'माय हैंडलूम जर्नी' सत्र में अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि हथकरघा सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति और पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने लोगों से स्थानीय बुनकरों द्वारा तैयार किए गए वस्त्रों को अपनाने की अपील भी की। इस दौरान उनकी बातचीत कलकत्ता टाइम्स के संपादक के साथ हुई, जिसमें हैंडलूम के महत्व और भविष्य पर चर्चा की गई।
बुनकरों की विरासत और परंपरा पर हुई चर्चा
कार्यक्रम के 'द लूम्स लेगेसी' सत्र में हैंडलूम से जुड़े विशेषज्ञों, डिज़ाइनरों और कला प्रेमियों ने अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने बताया कि हर हथकरघा का कपड़ा अपने साथ एक कहानी और वर्षों की परंपरा लेकर चलता है। बदलते समय में इस कला को कैसे बचाया जाए और नई पीढ़ी को इससे कैसे जोड़ा जाए, इस पर भी विस्तार से चर्चा हुई। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने भी इस सत्र में काफी रुचि दिखाई।
दास्तानगोई के जरिए जीवंत हुई बुनाई की कहानी
कार्यक्रम का सबसे खास आकर्षण 'दास्तान-ए-तंजेब' रहा। ईस्ट इंडिया दास्तानगोस ने कहानी, कविता, संगीत और इतिहास के जरिए भारतीय बुनाई की यात्रा को बेहद खूबसूरत अंदाज में प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति ने दर्शकों को भारतीय वस्त्र परंपरा के गौरवशाली इतिहास से रूबरू कराया। प्रस्तुति के अंत में कलाकारों को दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सराहा।
फैशन और इतिहास का दिखा अनोखा मेल
कार्यक्रम के 'फैब्रिक्स ऑफ टाइम' सत्र में डिज़ाइनर रोहन परियार ने बताया कि भारतीय पारंपरिक बुनाई आज भी आधुनिक फैशन की प्रेरणा बनी हुई है। उन्होंने इतिहास और फैशन के अनोखे मेल को अपने अंदाज में प्रस्तुत किया। वहीं 'आइकॉन्स एंड एडवोकेट्स' सत्र में वक्ताओं ने हैंडलूम और विरासत से जुड़े अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम के अंत में यही संदेश दिया गया कि भारतीय हथकरघा हमारी संस्कृति की पहचान है और इसे आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।