कोलकाता: पश्चिम बंगाल में शिक्षक डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस को लेकर स्वास्थ्य विभाग की नई गाइडलाइन पर विवाद गहरा गया है। सर्विस डॉक्टर्स फोरम ने 24 अगस्त को जारी निर्देशिका पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे अव्यावहारिक और कई सवाल खड़े करने वाला बताया है। संगठन ने आरोप लगाया कि नई व्यवस्था से शिक्षक डॉक्टरों के प्राइवेट प्रैक्टिस के अधिकार का दायरा काफी सीमित हो सकता है।
प्रैक्टिसिंग अलाउंस कटने के बाद भी प्रैक्टिस पर पाबंदी का सवाल
सर्विस डॉक्टर्स फोरम का कहना है कि प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले शिक्षक डॉक्टरों से सरकार प्रैक्टिसिंग अलाउंस के रूप में एक बड़ी राशि काटती है। इसके बदले डॉक्टरों को ड्यूटी के निर्धारित समय के बाहर प्राइवेट प्रैक्टिस करने की अनुमति मिलती रही है। संगठन का आरोप है कि नई गाइडलाइन से यह अवसर और सीमित हो जाएगा।
फोरम के मुताबिक, निर्देशिका में ऐसे कई प्रावधान हैं, जिनको लेकर शिक्षक डॉक्टरों के बीच संशय की स्थिति बनी हुई है। संगठन का दावा है कि कुछ नियमों को व्यवहारिक स्तर पर लागू करना भी बेहद मुश्किल होगा।
एडमिशन डे ड्यूटी से प्राइवेट प्रैक्टिस लगभग खत्म होने की आशंका
डॉक्टरों की कमी के कारण कई मेडिकल कॉलेजों और विभिन्न विभागों में एक शिक्षक डॉक्टर को सप्ताह में दो से तीन दिन तक एडमिशन डे ड्यूटी करनी पड़ती है। सर्विस डॉक्टर्स फोरम का कहना है कि यदि एडमिशन डे के बाद अगले दो दिनों तक प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं करने दी जाती है, तो कई डॉक्टरों के पास सप्ताह में प्रैक्टिस करने के लिए शायद ही कोई दिन बचेगा।
संगठन ने कहा कि ऐसी स्थिति में कई शिक्षक डॉक्टरों का प्राइवेट प्रैक्टिस का अधिकार व्यवहारिक रूप से पूरी तरह समाप्त हो सकता है। फोरम ने इसे शिक्षक डॉक्टरों के अधिकारों में कटौती बताते हुए इसका विरोध किया है।
कुछ विभागों के लिए अलग स्थिति, भेदभाव का आरोप
सर्विस डॉक्टर्स फोरम ने गाइडलाइन को शिक्षक डॉक्टरों के बीच असमानता पैदा करने वाला भी बताया है। संगठन के अनुसार, कुछ विभाग ऐसे हैं जहां शिक्षक डॉक्टरों के लिए एडमिशन डे की व्यवस्था नहीं है। हालांकि ऐसे विभागों की संख्या सीमित है, लेकिन मौजूदा निर्देशिका के कारण अलग-अलग विभागों के डॉक्टरों पर नियमों का असर अलग-अलग पड़ सकता है।
फोरम ने मांग की है कि सरकार गाइडलाइन में आवश्यक संशोधन करने के साथ-साथ इसके सभी प्रावधानों पर स्पष्ट व्याख्या जारी करे।
90 के दशक की स्थिति दोहराने का डर
सर्विस डॉक्टर्स फोरम ने इस मामले में 1990 के दशक की स्थिति का भी जिक्र किया है। संगठन के अनुसार, उस समय वाम मोर्चा सरकार ने मेडिकल कॉलेजों के शिक्षकों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर पूरी तरह रोक लगा दी थी, जिसके बाद 400 से अधिक प्रतिष्ठित डॉक्टरों ने नौकरी छोड़ दी थी।
संगठन का दावा है कि उस फैसले का असर मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर पड़ा था। फोरम ने सवाल उठाया है कि क्या मौजूदा गाइडलाइन भी कुछ शिक्षक डॉक्टरों को नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर कर सकती है।
सर्विस डॉक्टर्स फोरम ने रखीं तीन प्रमुख मांगें
संगठन ने सबसे पहले प्राइवेट प्रैक्टिस से जुड़ी मौजूदा गाइडलाइन में तत्काल संशोधन की मांग की है। फोरम का कहना है कि शिक्षक डॉक्टरों से प्राइवेट प्रैक्टिस का अधिकार किसी भी स्थिति में नहीं छीना जाना चाहिए।
दूसरी मांग में कहा गया है कि एडमिशन डे सहित सप्ताह के निर्धारित ड्यूटी घंटों के बाहर शिक्षक डॉक्टरों को प्राइवेट प्रैक्टिस करने की अनुमति दी जाए। साथ ही प्राइवेट प्रैक्टिस के दायरे को बढ़ाने की भी मांग की गई है।
तीसरी मांग के तहत संगठन ने कहा है कि शिक्षक डॉक्टरों को हर साल प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए ऑप्ट-इन या ऑप्ट-आउट करने का अवसर मिलना चाहिए। इसे ट्रांसफर या प्रमोशन जैसी प्रशासनिक प्रक्रियाओं से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
स्वास्थ्य विभाग की इस गाइडलाइन को लेकर शिक्षक डॉक्टरों के बीच बढ़ते विरोध के बाद अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार संगठन की मांगों पर कोई संशोधन या स्पष्टीकरण जारी करती है या नहीं।