नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने चीनी मिलों और शोधकों को आवंटित किए गए अप्रयुक्त कच्ची चीनी आयात कोटे को वापस करने की समयसीमा बढ़ा दी है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) की ओर से सोमवार को जारी सार्वजनिक सूचना के अनुसार, कोटा धारक अब 30 सितंबर तक अपनी बची हुई मात्रा सरकार को समर्पित कर सकेंगे। इसके लिए आयात के समय समर्पित की गई चीनी के मूल्य का 0.5% के बराबर राशि चुकानी होगी। सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में उल्लेखनीय नरमी आई है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें ऊपर गई हैं। इससे आयात की आर्थिक व्यवहार्यता पर सवाल खड़े हो गए हैं और मिलों के सामने उपलब्ध कोटे का इस्तेमाल करने के बजाय उसे वापस करने का विकल्प अधिक आकर्षक बन गया है।
पहले 15 दिन की अवधि में करना था फैसला
सरकार ने कोटा वापस करने की व्यवस्था में भी बदलाव किया है। पहले कारोबारियों को हर 15 दिन में यह निर्णय लेने का अवसर दिया गया था कि वे आवंटित कोटे में से कितनी मात्रा का उपयोग करना चाहते हैं और कितनी मात्रा छोड़ना चाहते हैं। अब इस लगातार चलने वाली व्यवस्था के स्थान पर 30 सितंबर की एक निश्चित अंतिम तारीख निर्धारित की गई है। इससे चीनी मिलों और शोधकों को बाजार की बदलती परिस्थितियों का आकलन करने के लिए अधिक समय मिल गया है। मौजूदा परिस्थितियों में यह अतिरिक्त समय खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि आयात का निर्णय केवल उपलब्ध कोटे पर निर्भर नहीं रह गया है, बल्कि घरेलू और वैश्विक कीमतों के बीच बढ़ते अंतर से भी सीधे प्रभावित हो रहा है। मिलें अब आगामी महीनों में कीमतों की दिशा, घरेलू आपूर्ति और आयात लागत को देखते हुए अंतिम फैसला कर सकती हैं।
10 लाख टन शुल्क-मुक्त आयात का था फैसला
सरकार ने त्योहारी मौसम से पहले घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने और कीमतों को नियंत्रण में रखने के उद्देश्य से 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी थी। यह विशेष कोटा सरकार ने घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के उपाय के तौर पर पेश किया था, ताकि बढ़ती मांग के दौरान बाजार में किसी तरह की कमी की स्थिति न बने। उस समय आयात को एक ऐसे कदम के रूप में देखा गया था, जिससे घरेलू कीमतों पर दबाव कम करने और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, आयात नीति की घोषणा के बाद बाजार का समीकरण तेजी से बदला है। घरेलू कीमतों में गिरावट और वैश्विक कीमतों में वृद्धि ने उस समय के अनुमान और मौजूदा आर्थिक गणित के बीच स्पष्ट अंतर पैदा कर दिया है।
घरेलू और वैश्विक कीमतों के बीच बदला अंतर
चीनी के आयात का फैसला सामान्यतः तभी व्यावहारिक माना जाता है जब विदेश से चीनी मंगाने की कुल लागत घरेलू बाजार में उपलब्ध चीनी की कीमत के मुकाबले प्रतिस्पर्धी हो। मौजूदा स्थिति में यह अंतर उलट गया है। घरेलू कीमतों में पर्याप्त सुधार के कारण भारत में उपलब्ध चीनी अपेक्षाकृत सस्ती हो गई है, जबकि वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने से विदेश से चीनी मंगाना महंगा पड़ रहा है। एक चीनी बाजार विश्लेषक के अनुसार, घरेलू कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट और वैश्विक कीमतों में वृद्धि के बाद फिलहाल आयात के लिए आवश्यक मूल्य-समानता नहीं रह गई है। ऐसे में शुल्क-मुक्त आयात की सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद वास्तविक आयात लागत मिलों के लिए आकर्षक नहीं रह गई है। यही कारण है कि सरकार द्वारा कोटा लौटाने के लिए अतिरिक्त समय देना बाजार की मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप माना जा रहा है।
बड़े आवंटन वाली मिलों पर सबसे अधिक असर
जिन चीनी मिलों और शोधकों को शुरुआती चरण में कोटे का बड़ा हिस्सा मिला था, उनके सामने अब अपने आवंटन के इस्तेमाल का फैसला अधिक कठिन हो गया है। यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें घरेलू बाजार से ऊपर बनी रहती हैं, तो आयातित चीनी खरीदने के बाद उसे भारतीय बाजार में बेचने पर अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पाएगा। ऐसी स्थिति में अप्रयुक्त कोटा लौटाना मिलों के लिए अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प हो सकता है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि शुरुआती आवंटन का बड़ा हिस्सा पाने वाली मिलों में से कई मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए अपनी बची हुई मात्रा का समर्पण कर सकती हैं। इससे वास्तविक आयात सरकार द्वारा स्वीकृत कुल कोटे से काफी कम रह सकता है। हालांकि, अंतिम तस्वीर 30 सितंबर तक कीमतों की दिशा और घरेलू आपूर्ति की स्थिति पर निर्भर करेगी।
7,97,450 टन कोटा पहले ही आवंटित
सरकारी सूचना के अनुसार, 10 लाख टन के विशेष आयात कोटे में से 7,97,450 टन मात्रा का आवंटन पहले ही किया जा चुका है। इसके लिए चीनी मिलों और शोधकों से आवेदन प्राप्त हुए थे, जिसके आधार पर उन्हें आयात की अनुमति दी गई। इस आवंटन के बाद 2,02,550 टन मात्रा अभी उपलब्ध थी, जिसके लिए विदेश व्यापार महानिदेशालय ने इसी महीने की शुरुआत में नए आवेदन आमंत्रित किए थे। अब बाजार में कीमतों का बदला हुआ समीकरण इस शेष मात्रा की मांग और वास्तविक आयात को भी प्रभावित कर सकता है। यदि घरेलू कीमतें कमजोर और अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो अतिरिक्त कोटा हासिल करने के बावजूद कारोबारी आयात से दूरी बना सकते हैं। इस तरह सरकार की आपूर्ति बढ़ाने की शुरुआती पहल का वास्तविक प्रभाव बाजार की कीमतों और मिलों के कारोबारी निर्णयों पर निर्भर करेगा।
त्योहारी मांग के बीच सरकार की निगाह बाजार पर
चीनी की कीमतों और उपलब्धता का महत्व त्योहारी मौसम में और बढ़ जाता है, जब घरेलू खपत में सामान्य दिनों की तुलना में तेजी देखने को मिलती है। सरकार का शुल्क-मुक्त आयात का फैसला इसी संभावित मांग को ध्यान में रखकर लिया गया था। लेकिन अब घरेलू कीमतों में आई गिरावट ने तत्काल आयात की जरूरत को कमजोर किया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगी चीनी खरीदना मिलों के लिए वित्तीय रूप से कम आकर्षक हो गया है। ऐसे में 30 सितंबर तक कोटा लौटाने की अनुमति मिलों को बाजार के अनुरूप निर्णय लेने की स्वतंत्रता देती है। आने वाले दिनों में घरेलू उत्पादन, मांग, निर्यात-आयात लागत और वैश्विक चीनी बाजार की चाल यह तय करेगी कि विशेष आयात योजना के तहत वास्तव में कितनी चीनी भारत पहुंचती है। सरकार के लिए भी यह स्थिति घरेलू कीमतों और उपभोक्ता हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की परीक्षा होगी।