सरकारी अधिकारियों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत व्यापक आर्थिक आधार, संतुलित वित्तीय प्रबंधन और दीर्घकालिक निवेश रणनीति के कारण निरंतर विकास के मार्ग पर बनी हुई है। पश्चिम एशिया में हाल के भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़े प्रभाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय लचीलापन प्रदर्शित किया है। अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्रीय परिस्थितियों में धीरे-धीरे सुधार आने से बाहरी दबाव कम हुए हैं, जिससे सरकार को नियोजित वित्तीय अनुशासन बनाए रखने और विकासोन्मुख नीतियों को आगे बढ़ाने में सहायता मिली है। वैश्विक स्तर पर अनिश्चितताओं के इस दौर में भारत की विकास दर और निवेश क्षमता को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान भी अपेक्षाकृत मजबूत मान रहे हैं।
पूंजीगत व्यय में दो अंकों की वृद्धि से बुनियादी ढांचा विकास को मिली नई गति
सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 में भी पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देते हुए सार्वजनिक निवेश की गति बनाए रखी है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल और मई 2026 के दौरान पूंजीगत व्यय बढ़कर लगभग 2.51 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह लगभग 2.21 लाख करोड़ रुपये था। इस प्रकार पूंजीगत निवेश में लगभग 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वित्तीय वर्ष के प्रारंभिक महीनों में अधिक निवेश करने की रणनीति से परियोजनाओं का क्रियान्वयन तेज होता है, निर्माण गतिविधियों को गति मिलती है तथा इस्पात, सीमेंट, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक उपकरण जैसे अनेक क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं। इससे रोजगार सृजन और निजी निवेश को भी सकारात्मक प्रोत्साहन मिलने की संभावना रहती है।
महंगी ऊर्जा और उर्वरक आयात के बावजूद किसानों व उपभोक्ताओं को राहत
पश्चिम एशिया में संघर्ष और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास उत्पन्न व्यवधानों के कारण कच्चे तेल और उर्वरकों की वैश्विक कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। इसके बावजूद सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं और किसानों को राहत देने के लिए सब्सिडी व्यवस्था जारी रखी है। सरकारी तेल विपणन कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों के प्रभाव से उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए लगभग 1.23 लाख करोड़ रुपये की सहायता उपलब्ध कराई गई। वहीं सरकार किसानों को उर्वरक लगभग 300 रुपये प्रति बोरी की दर से उपलब्ध करा रही है, जबकि आयात लागत बढ़कर लगभग 3,000 रुपये प्रति बोरी तक पहुंच गई है। इसी बढ़ती लागत को देखते हुए उर्वरक विभाग ने वित्त वर्ष 2027 के लिए सब्सिडी आवंटन को लगभग दोगुना कर 3.42 लाख करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव रखा है।
सड़क, रेल, रक्षा और दूरसंचार पर रहेगा निवेश का विशेष फोकस
सरकारी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक निवेश की रणनीति का केंद्र बुनियादी अवसंरचना का विस्तार ही रहेगा। सड़क, रेलवे, दूरसंचार, रक्षा अवसंरचना, ऊर्जा संपर्क, परिवहन नेटवर्क और अन्य आधारभूत परियोजनाओं में निवेश को प्राथमिकता दी जा रही है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे निवेश का प्रभाव केवल निर्माण क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे विनिर्माण, सेवा क्षेत्र, आपूर्ति श्रृंखला, निजी उद्योग और रोजगार पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। दीर्घकाल में मजबूत आधारभूत ढांचा देश की उत्पादक क्षमता बढ़ाने, लॉजिस्टिक्स लागत कम करने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
राजकोषीय संतुलन और विकास के बीच संतुलित रणनीति पर सरकार का जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में किसी भी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती विकास, महंगाई नियंत्रण और राजकोषीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखना है। भारत ने एक ओर सामाजिक सुरक्षा और सब्सिडी के माध्यम से नागरिकों तथा किसानों को राहत देने का प्रयास किया है, वहीं दूसरी ओर दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए पूंजीगत निवेश की गति भी बनाए रखी है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार यदि वैश्विक ऊर्जा बाजारों में स्थिरता बनी रहती है और सार्वजनिक निवेश इसी प्रकार जारी रहता है, तो भारत आने वाले वर्षों में विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है। मजबूत व्यापक आर्थिक आधार, अवसंरचना निर्माण और निवेश-उन्मुख नीतियां भारत की दीर्घकालिक आर्थिक प्रगति के प्रमुख आधार स्तंभ मानी जा रही हैं।