बेंगलुरु. भारत लंबे समय से विश्व के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ताओं में शामिल रहा है, लेकिन घरेलू उत्पादन हमेशा मांग की तुलना में अत्यंत सीमित रहा है। यही कारण है कि देश अपनी अधिकांश आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी करता रहा है, जिससे विदेशी मुद्रा पर भारी दबाव पड़ता है। ऐसे परिदृश्य में आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले के जोन्नागिरि क्षेत्र में निजी स्वामित्व वाली पहली व्यावसायिक स्वर्ण खदान का संचालन प्रारंभ होना भारतीय खनन क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने परियोजना का उद्घाटन करते हुए इसके दूसरे चरण की आधारशिला भी रखी। इस पहल से न केवल घरेलू उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है, बल्कि भारत के खनिज संसाधनों के दोहन में निजी निवेश की नई संभावनाएं भी खुलेंगी।
आधुनिक तकनीक और बड़े निवेश से तैयार हुई परियोजना
करीब 405 करोड़ रुपये की लागत से विकसित इस महत्वाकांक्षी परियोजना को अत्याधुनिक खनन एवं प्रसंस्करण तकनीकों से सुसज्जित किया गया है। इसका संचालन जियोमैसूर सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा डेक्कन गोल्ड माइंस लिमिटेड तथा त्रिवेणी अर्थमूवर्स के सहयोग से किया जा रहा है। राज्य सरकार ने परियोजना के लिए लगभग 1500 एकड़ भूमि उपलब्ध कराई है, जिसमें प्रथम चरण के अंतर्गत लगभग 600 एकड़ क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियां प्रारंभ हो चुकी हैं। खदान तक जलापूर्ति सुनिश्चित करने के लिए 'हंड्री नीवा सुजला स्रवंती' परियोजना के माध्यम से लगभग 18 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन भी बिछाई गई है, जिससे औद्योगिक संचालन को स्थिर आधार मिलेगा।
विदेशी निर्भरता कम करने की दिशा में निर्णायक पहल
भारत की वार्षिक स्वर्ण आवश्यकता की तुलना में घरेलू उत्पादन अभी भी बेहद कम है। वर्तमान में देश में लगभग डेढ़ टन सोने का उत्पादन होता है, जो कुल मांग का केवल एक छोटा हिस्सा है। इस नई स्वर्ण खदान से पहले ही वर्ष लगभग 400 किलोग्राम सोना निकालने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। आगामी वर्षों में उत्पादन को क्रमशः बढ़ाकर 900 से 1000 किलोग्राम तथा परियोजना के दूसरे चरण के पूर्ण होने के बाद लगभग दो टन वार्षिक क्षमता तक पहुंचाने की योजना है। यदि यह लक्ष्य हासिल होता है तो भारत के घरेलू स्वर्ण उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होगी तथा आयात पर निर्भरता कम होने से विदेशी मुद्रा की बचत भी संभव होगी।
निजी क्षेत्र की भागीदारी से बदलेगा खनन उद्योग का स्वरूप
खनन क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि निजी निवेश से आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रबंधन, उत्पादन क्षमता और संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग को बढ़ावा मिलेगा। अब तक देश में सरकारी स्वामित्व वाली खदानें ही स्वर्ण उत्पादन का प्रमुख स्रोत रही हैं। निजी क्षेत्र के प्रवेश से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, उत्पादन दक्षता में सुधार होगा और रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। इसके साथ ही स्थानीय उद्योगों, परिवहन, मशीनरी, निर्माण और सेवा क्षेत्रों को भी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना है। यदि यह मॉडल सफल रहता है तो देश के अन्य खनिज क्षेत्रों में भी निजी निवेश को गति मिल सकती है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार को मिलेगा नया आधार
जोन्नागिरि क्षेत्र में इस परियोजना के शुरू होने से स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों में उल्लेखनीय तेजी आने की उम्मीद है। खदान के संचालन, प्रसंस्करण इकाइयों, परिवहन व्यवस्था तथा सहायक सेवाओं के माध्यम से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत संरचना का विस्तार, सड़क, जल, बिजली और अन्य सुविधाओं के विकास को भी गति मिलेगी। इससे क्षेत्रीय विकास को नया आयाम मिलेगा तथा स्थानीय युवाओं के लिए औद्योगिक रोजगार की संभावनाएं मजबूत होंगी।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में मजबूत कदम
वैश्विक स्तर पर स्वर्ण केवल आभूषण उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि वित्तीय सुरक्षा, निवेश और औद्योगिक उपयोग के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण धातु माना जाता है। ऐसे समय में जब वैश्विक बाजारों में भू-राजनीतिक अस्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े जोखिम बढ़ रहे हैं, घरेलू स्वर्ण उत्पादन में वृद्धि भारत की आर्थिक सुरक्षा को भी मजबूत करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में इसी प्रकार की परियोजनाओं को प्रोत्साहन मिलता रहा तो भारत धीरे-धीरे स्वर्ण उत्पादन के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बन सकता है और खनिज अर्थव्यवस्था में नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है।