पूर्व सीएम कमलनाथ ने मध्यप्रदेश में जर्जर पुलों और सड़क सुरक्षा को लेकर राज्य सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं।पूर्व सीएम कमलनाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश की सड़कों पर दौड़ती बसें और डंपर सिर्फ यातायात का साधन नहीं, बल्कि हर पल मंडराता हुआ खतरा बन चुके हैं। जिस प्रदेश में 253 पुल जर्जर हालत में हों, जहां सरियों पर सिर्फ सीमेंट का लेप चढ़ाकर उन्हें सुरक्षित घोषित कर दिया जाए, वहां सरकार की प्राथमिकताएं साफ दिखाई देती हैं। सवाल यह है कि क्या जनता की जान इतनी सस्ती हो गई है कि भ्रष्टाचार की परत से ढककर पुलों को फिर से चालू कर दिया जाए?
क्या सरकार किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही है?
जबलपुर में आरओबी धंसने की घटना ने पूरे प्रदेश को चेताया था। 46 पुलों को खुद एमपीआरडीसी ने बेहद खतरनाक घोषित किया। इसके बावजूद इन पुलों पर भारी वाहन धड़ल्ले से दौड़ रहे हैं। क्या सरकार किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही है? क्या किसी भयावह दुर्घटना के बाद ही जिम्मेदारों की नींद खुलेगी?
रिपोर्ट बताती है कि कई पुलों की सरिया सड़ चुकी है, संरचना कमजोर हो चुकी है, फिर भी मरम्मत के नाम पर सिर्फ ऊपरी लीपापोती की जा रही है। यह मरम्मत नहीं, मौत को आमंत्रण है। यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं, सीधा आपराधिक कृत्य है। अगर किसी पुल के गिरने से सैकड़ों जानें जाती हैं, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? क्या फाइलों में बैठा कोई अधिकारी? क्या ठेकेदार? या फिर वह सरकार, जिसने आंखें मूंद रखी हैं?
क्यों भारी वाहनों पर रोक नहीं लगाई गई?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब खुद सरकारी एजेंसियां पुलों को खतरनाक बता चुकी हैं, तो उन पर ट्रैफिक क्यों जारी है? क्यों भारी वाहनों पर रोक नहीं लगाई गई? क्यों वैकल्पिक मार्ग विकसित नहीं किए गए? क्या इसलिए कि मरम्मत के नाम पर फिर से करोड़ों का खेल खेला जा सके?
क्या किसी जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई हुई?
यह सिर्फ पुलों का मामला नहीं है, यह सरकार की नीयत और नियतंत्रण क्षमता की परीक्षा है। अगर 253 पुल खतरे में हैं, तो हर दिन लाखों लोग मौत के साये में सफर कर रहे हैं। सरकार विकास के बड़े बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बुनियादी ढांचा ही चरमराया हुआ है।जनता को यह जानने का अधिकार है कि इन पुलों की मरम्मत पर कितना खर्च हुआ, किन कंपनियों को ठेके दिए गए, और गुणवत्ता की जांच किसने की? क्या किसी जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई हुई? या फिर हमेशा की तरह फाइलें दबा दी जाएंगी और हादसे के बाद मुआवजे की राजनीति शुरू हो जाएगी?
अब समय आ गया है कि सरकार जवाब दे। पुलों की तत्काल स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए, खतरनाक घोषित पुलों पर भारी वाहनों की आवाजाही तुरंत रोकी जाए, और दोषी अधिकारियों व ठेकेदारों पर आपराधिक मामला दर्ज हो। जनता की जान से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
अगर सरकार अब भी नहीं चेती, तो यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं होगी, बल्कि यह जनता के साथ विश्वासघात माना जाएगा। विकास के नाम पर मौत का यह ढांचा कब तक खड़ा रहेगा इसका जवाब मुख्यमंत्री और उनकी सरकार को देना ही होगा।
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