स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती गरीबी, बेरोजगारी, खाद्य संकट और कमजोर औद्योगिक आधार की थी। देश का अधिकांश हिस्सा कृषि पर निर्भर था, लेकिन खेती पारंपरिक तरीकों से की जाती थी और उत्पादकता बेहद कम थी। उस समय सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र आधारित आर्थिक मॉडल अपनाया, जिसके तहत बड़े उद्योगों और आधारभूत ढांचे के निर्माण पर विशेष जोर दिया गया। हालांकि इन प्रयासों ने औद्योगिक विकास की बुनियाद रखी, लेकिन अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर लंबे समय तक सीमित रही। कई दशकों तक भारत की औसत आर्थिक विकास दर लगभग 3 से 4 प्रतिशत के बीच रही, जिसे बाद में अर्थशास्त्रियों ने ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ के नाम से परिभाषित किया। सीमित उत्पादन क्षमता और बढ़ती आबादी के कारण देश लगातार संसाधनों के दबाव का सामना करता रहा।
जब विदेशी गेहूं पर निर्भर था भारत और ‘शिप-टू-माउथ’ की स्थिति बनी
उन्नीस सौ पचास और साठ के दशक में भारत गंभीर खाद्य संकट से जूझ रहा था। उस समय देश की आबादी आज की तुलना में काफी कम थी, लेकिन कृषि उत्पादन मांग के अनुरूप नहीं था। अमेरिका के साथ हुए पीएल-480 समझौते के तहत भारत बड़े पैमाने पर गेहूं आयात करता था और विदेशी सहायता पर निर्भर रहता था। हालात ऐसे थे कि विदेशी बंदरगाहों से अनाज लेकर आने वाले जहाजों पर देश की खाद्य सुरक्षा टिकी हुई थी। इसी कारण उस दौर को ‘शिप-टू-माउथ’ कहा गया, अर्थात जहाज से अनाज पहुंचे तभी लोगों का पेट भर सके। लगातार सूखा, सिंचाई सुविधाओं की कमी, उन्नत बीजों का अभाव और कृषि तकनीकों की सीमित पहुंच ने इस संकट को और गहरा कर दिया था। खाद्य आत्मनिर्भरता उस समय देश के लिए एक राष्ट्रीय लक्ष्य बन चुकी थी।
हरित क्रांति ने बदली तस्वीर और खाद्य आत्मनिर्भरता की नींव रखी
उन्नीस सौ साठ के दशक के उत्तरार्ध में शुरू हुई हरित क्रांति भारतीय कृषि इतिहास का निर्णायक मोड़ साबित हुई। उच्च उत्पादकता वाले बीज, रासायनिक उर्वरकों का उपयोग, सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों ने गेहूं तथा धान उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि की। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों ने खाद्यान्न उत्पादन के केंद्र के रूप में पहचान बनाई। आने वाले दशकों में भारत न केवल अपनी खाद्य जरूरतें पूरी करने में सक्षम हुआ, बल्कि कई कृषि उत्पादों के निर्यातक देशों की श्रेणी में भी शामिल हो गया। इस परिवर्तन ने खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति प्रदान की और देश को विदेशी खाद्यान्न निर्भरता से बाहर निकलने का अवसर दिया।
आर्थिक सुधारों से खुला विकास का नया अध्याय
उन्नीस सौ इक्यानवे में लागू आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दी। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों ने निवेश, उद्योग और व्यापार के नए अवसर पैदा किए। निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी, विदेशी निवेश आकर्षित हुआ और सेवा क्षेत्र तेजी से विकसित हुआ। सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, बैंकिंग और विनिर्माण क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति देखने को मिली। इन सुधारों के बाद भारत की विकास दर में लगातार सुधार हुआ और देश वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरने लगा। आर्थिक विस्तार का लाभ धीरे-धीरे सामाजिक कल्याण योजनाओं और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों तक भी पहुंचा, जिससे विकास की प्रक्रिया अधिक व्यापक बनी।
डिजिटल शासन और कल्याणकारी योजनाओं ने बदली वितरण व्यवस्था
पिछले एक दशक में डिजिटल तकनीक के व्यापक उपयोग ने सरकारी योजनाओं की पहुंच और पारदर्शिता को मजबूत किया है। जनधन खाते, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी पर आधारित प्रणाली ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को प्रभावी बनाया। इससे सरकारी सहायता सीधे लाभार्थियों तक पहुंचने लगी और बिचौलियों की भूमिका कम हुई। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने, राशन कार्डों के सत्यापन और ई-पॉस मशीनों के उपयोग से खाद्यान्न वितरण में पारदर्शिता बढ़ी। इसी आधार पर बड़े पैमाने पर खाद्य सुरक्षा योजनाओं का संचालन संभव हुआ, जिससे करोड़ों परिवारों तक नियमित रूप से अनाज पहुंचाया जा सका।
80 करोड़ लोगों तक मुफ्त राशन पहुंचाने की क्षमता कैसे बनी
आज भारत दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा व्यवस्थाओं में से एक का संचालन कर रहा है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से करोड़ों लाभार्थियों को रियायती या मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। यह उपलब्धि केवल सरकारी खरीद और भंडारण प्रणाली का परिणाम नहीं है, बल्कि दशकों से विकसित कृषि उत्पादन क्षमता, विशाल सार्वजनिक वितरण नेटवर्क और तकनीकी निगरानी व्यवस्था का संयुक्त प्रभाव है। भारतीय खाद्य निगम, राज्य एजेंसियों और लाखों उचित मूल्य दुकानों की मदद से खाद्यान्न देश के दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचाया जा रहा है। यह स्थिति उस दौर से बिल्कुल विपरीत है जब देश विदेशी अनाज पर निर्भर था और खाद्य सुरक्षा को लेकर लगातार अनिश्चितता बनी रहती थी।
विकास यात्रा अभी जारी है
भारत का सफर खाद्य संकट और सीमित आर्थिक संसाधनों से लेकर वैश्विक स्तर पर उभरती आर्थिक शक्ति बनने तक कई चरणों से होकर गुजरा है। कृषि सुधार, हरित क्रांति, आर्थिक उदारीकरण, डिजिटल शासन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने मिलकर इस परिवर्तन को संभव बनाया। हालांकि गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन, कृषि आय बढ़ाने और समावेशी विकास जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि जिस देश को कभी विदेशी अनाज का इंतजार करना पड़ता था, वही देश आज करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम है। भारत की यह यात्रा न केवल आर्थिक परिवर्तन की कहानी है, बल्कि आत्मनिर्भरता, संस्थागत विकास और जनकल्याण आधारित नीति निर्माण का भी महत्वपूर्ण उदाहरण है।