फ्लोरिडा/नई दिल्ली: दुनिया ने आज एक ऐतिहासिक पल का दीदार किया है। ठीक आधी सदी के लंबे इंतजार के बाद, इंसान ने एक बार फिर चंद्रमा के रहस्यों को सुलझाने के लिए पृथ्वी की निचली कक्षा (Lower Earth Orbit) की दहलीज को पार कर लिया है। नासा (NASA) का Artemis II मिशन फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर से सफलतापूर्वक लॉन्च हो गया है।
32 मंजिला रॉकेट ने भरी हुंकार
गुरुवार, 2 अप्रैल को स्थानीय समयानुसार शाम 6:35 बजे (भारतीय समयानुसार तड़के 4:04 बजे), एक विशाल 32-मंजिला SLS (Space Launch System) रॉकेट ने गगनभेदी गर्जना के साथ अंतरिक्ष की ओर प्रस्थान किया। इस रॉकेट का थ्रस्ट इतना शक्तिशाली था कि इसकी गूंज कई किलोमीटर दूर तक महसूस की गई। लॉन्च के ठीक 8 मिनट बाद 'ओरियन' (Orion) स्पेसक्राफ्ट रॉकेट से अलग होकर अपनी निर्धारित राह पर आगे बढ़ गया।
इतिहास रचने वाले 'शक्तिशाली चार'
इस मिशन की कमान चार जांबाज अंतरिक्ष यात्रियों के हाथ में है, जिन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा लिया है:
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रीड वाइजमैन (Reid Wiseman): मिशन कमांडर।
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विक्टर ग्लोवर (Victor Glover): मिशन पायलट (चंद्र मिशन पर जाने वाले पहले अश्वेत अंतरिक्ष यात्री)।
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क्रिस्टिना कोच (Christina Koch): मिशन स्पेशलिस्ट (चंद्रमा की यात्रा करने वाली पहली महिला)।
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जेरेमी हैनसन (Jeremy Hansen): कनाडाई अंतरिक्ष यात्री (पहले गैर-अमेरिकी जो चांद की कक्षा में जा रहे हैं)।
क्या है Artemis II का लक्ष्य?
यह मिशन करीब 10 दिनों का है। हालांकि, यह अंतरिक्ष यात्री सीधे चांद की सतह पर कदम नहीं रखेंगे, बल्कि चंद्रमा के चारों ओर चक्कर लगाकर वापस लौटेंगे। इस यात्रा की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
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दूरी: पृथ्वी से लगभग 4 लाख किलोमीटर दूर तक का सफर।
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सुरक्षा: यह यान 'Free-return Trajectory' का पालन करेगा, जिससे आपात स्थिति में ईंधन की कमी होने पर भी यान प्राकृतिक रूप से पृथ्वी पर वापस आ सकेगा।
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परीक्षण: ओरियन यान के लाइफ-सपोर्ट सिस्टम (ऑक्सीजन, तापमान, पानी) और गहरे अंतरिक्ष में मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों की जांच करना।
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भविष्य की तैयारी: यह मिशन Artemis III के लिए रास्ता साफ करेगा, जिसके तहत इंसान फिर से चांद की मिट्टी पर कदम रखेगा।
चांद के बाद अब मंगल की बारी
1972 में 'अपोलो 17' के बाद यह पहली बार है जब इंसान चंद्रमा के इतने करीब जा रहा है। नासा का लक्ष्य सिर्फ चांद पर पहुंचना नहीं है, बल्कि वहां एक स्थायी बेस बनाना है। यही अनुभव भविष्य में इंसान को मंगल ग्रह (Mars) तक ले जाने का आधार बनेगा।