प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का असामान्य रूप से गर्म होना इस समय वैश्विक मौसम वैज्ञानिकों की निगाह में है। अल नीनो की स्थिति तब बनती है जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाता है। इसका असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव के माध्यम से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तापमान, वर्षा और सूखे के स्वरूप को प्रभावित कर सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन के जुलाई के आकलन के अनुसार, नीनो-3.4 क्षेत्र में साप्ताहिक समुद्री सतह का तापमान सामान्य से लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस अधिक था। पूर्वी प्रशांत के नीनो-1+2 क्षेत्र में यह असामान्यता 2.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गई थी। इसलिए पूरे प्रशांत महासागर के तापमान को एक समान 2 डिग्री बढ़ा हुआ बताना सही नहीं होगा; अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों में तापमान असामान्यता अलग-अलग है।
2026 के अंत तक बन सकता है बेहद शक्तिशाली अल नीनो
मौजूदा परिस्थितियां इस आशंका को मजबूत कर रही हैं कि वर्ष 2026 के उत्तरार्ध में अल नीनो काफी ताकतवर हो सकता है। अमेरिकी मौसम एजेंसी के जुलाई पूर्वानुमान में अक्टूबर से दिसंबर के दौरान बहुत शक्तिशाली अल नीनो बनने की संभावना 81 प्रतिशत बताई गई थी। एजेंसी ने यह भी कहा है कि यह घटनाक्रम 1950 के बाद दर्ज सबसे बड़े अल नीनो घटनाक्रमों में शामिल हो सकता है।
हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि किसी मौसम प्रणाली के शक्तिशाली होने का अर्थ यह नहीं है कि उसका प्रभाव हर देश और क्षेत्र में एक जैसा होगा। अल नीनो के प्रभाव स्थानीय समुद्री तापमान, वायुमंडलीय परिसंचरण, हिंद महासागर की परिस्थितियों और अन्य मौसमी प्रणालियों के साथ उसकी परस्पर क्रिया पर निर्भर करते हैं। इसलिए केवल अल नीनो की तीव्रता के आधार पर किसी क्षेत्र में बारिश या सूखे की निश्चित भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा।
भारत के लिए तत्काल असर का खतरा अपेक्षाकृत कम
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रशांत महासागर में बन रही यह स्थिति भारतीय मानसून को किस हद तक प्रभावित करेगी। अल नीनो और भारतीय मानसून के बीच ऐतिहासिक रूप से संबंध देखा गया है, लेकिन हर अल नीनो वर्ष में भारत में बारिश का व्यवहार बिल्कुल एक जैसा नहीं रहता। मौजूदा घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण पहलू इसका समय है।
हालिया आकलनों में संकेत दिया गया है कि प्रशांत क्षेत्र में विकसित होने वाले अल नीनो के प्रभाव को भारत तक पहुंचने में कुछ समय लग सकता है। इसी वजह से मौजूदा दक्षिण-पश्चिम मानसून के अंतिम चरण पर इसका सीधा प्रभाव सीमित रह सकता है। भारतीय मानसून सामान्यतः सितंबर के अंत तक विदा होने लगता है, इसलिए यदि अल नीनो का सबसे मजबूत चरण वर्ष के उत्तरार्ध में आता है तो उसका बड़ा प्रभाव मानसून के बाद की मौसमी परिस्थितियों में दिखाई दे सकता है।
हिंद महासागर की भूमिका भारत के लिए बन सकती है सुरक्षा कवच
भारत के मौसम को समझने में केवल प्रशांत महासागर को देखना पर्याप्त नहीं है। हिंद महासागर द्विध्रुव यानी आईओडी भी मानसून के व्यवहार को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक है। सकारात्मक आईओडी की स्थिति कुछ परिस्थितियों में अल नीनो के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने में मदद कर सकती है।
दक्षिण-पूर्व एशियाई मौसम विज्ञान केंद्र के जुलाई आकलन के मुताबिक, जून 2026 में आईओडी तटस्थ स्थिति में था, जबकि मॉडल अगस्त-सितंबर के दौरान सकारात्मक आईओडी विकसित होने का संकेत दे रहे थे। यदि यह स्थिति मजबूत होती है तो भारत के लिए अल नीनो से जुड़े कुछ प्रतिकूल प्रभावों को संतुलित करने वाला कारक उपलब्ध हो सकता है। हालांकि मौसम प्रणालियां अत्यंत जटिल होती हैं और किसी एक संकेतक के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
भारत में बारिश पहले ही सामान्य से नीचे
अल नीनो की संभावित चुनौती ऐसे समय सामने आ रही है जब भारत में मौजूदा मानसून का प्रदर्शन पूरी तरह संतोषजनक नहीं रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, 1 जून से 13 अगस्त के बीच देश में सामान्य से लगभग 12 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई थी। जून में कमी काफी अधिक रही, जबकि जुलाई में स्थिति में कुछ सुधार हुआ।
इस पृष्ठभूमि में अगस्त और सितंबर की बारिश भारत के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। कृषि, जलाशयों, भूजल, बिजली उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मानसून का सीधा प्रभाव पड़ता है। यदि मानसून के अंतिम चरण में बारिश कमजोर रहती है तो कुछ क्षेत्रों में जल उपलब्धता और कृषि उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, अल नीनो का सबसे मजबूत चरण यदि मानसून के बाद विकसित होता है तो उसके प्रभाव को अगले मौसमों के संदर्भ में देखना अधिक महत्वपूर्ण होगा।
दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया में सूखे का खतरा
अल नीनो का प्रभाव प्रशांत महासागर के आसपास के देशों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। इंडोनेशिया, मलेशिया और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में अल नीनो के दौरान वर्षा में कमी और गर्म तथा शुष्क परिस्थितियों का जोखिम बढ़ सकता है। ऐसी परिस्थितियां कृषि उत्पादन, जल संसाधनों और जंगलों में आग के खतरे को प्रभावित कर सकती हैं।
यही वजह है कि अल नीनो को केवल मौसम विज्ञान की घटना नहीं माना जाता। जब किसी बड़े कृषि उत्पादक क्षेत्र में लंबे समय तक बारिश कम होती है तो उसका असर खाद्य उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच सकता है। दक्षिण-पूर्व एशिया में वनस्पति तेलों और अन्य कृषि उत्पादों की आपूर्ति प्रभावित होने पर वैश्विक कीमतों में भी उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
खाद्य महंगाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
मौसम में बड़े बदलाव का सबसे सीधा आर्थिक असर कृषि पर पड़ता है। यदि प्रमुख उत्पादक देशों में सूखा या अत्यधिक गर्मी लंबे समय तक बनी रहती है तो अनाज, तिलहन और अन्य कृषि उत्पादों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। इससे आपूर्ति कम होने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र भी इससे अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। कृषि उत्पादन घटने पर खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण और परिवहन की लागत बढ़ सकती है। यही कारण है कि बड़े अल नीनो की आशंका को केंद्रीय बैंक, सरकारें और वैश्विक बाजार भी ध्यान से देखते हैं। हालांकि वास्तविक आर्थिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि मौसम कितने समय तक असामान्य रहता है और प्रभावित देशों की खाद्य तथा जल प्रबंधन व्यवस्था कितनी मजबूत है।
दुनिया के तापमान पर भी पड़ सकता है असर
अल नीनो के दौरान समुद्र और वायुमंडल के बीच ऊर्जा का आदान-प्रदान वैश्विक तापमान को प्रभावित कर सकता है। विशेष रूप से जब अल नीनो मजबूत होता है, तब वैश्विक औसत तापमान के सामान्य से ऊपर जाने की संभावना बढ़ सकती है। अमेरिकी मौसम एजेंसी ने भी मौजूदा अल नीनो के 2026 के अंत तक मजबूत होने और 2027 की शुरुआत तक बने रहने की उच्च संभावना जताई है।
फिर भी इसे सीधे तौर पर यह कहना कि आने वाला वर्ष निश्चित रूप से दुनिया का सबसे गर्म वर्ष होगा, वैज्ञानिक रूप से सावधानी के बिना किया गया दावा होगा। वैश्विक तापमान पर अल नीनो के साथ दीर्घकालिक मानवजनित जलवायु परिवर्तन, समुद्री परिस्थितियां और अन्य प्राकृतिक कारक भी प्रभाव डालते हैं। इसलिए विशेषज्ञ अल नीनो को वैश्विक गर्मी बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक मानते हैं, लेकिन अकेला कारण नहीं।
भारत के लिए असली चुनौती मानसून के बाद शुरू हो सकती है
भारत के लिए आने वाले महीनों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि अल नीनो का चरम कब आता है और उस समय हिंद महासागर की स्थिति कैसी रहती है। यदि मजबूत अल नीनो मानसून के विदा होने के बाद अपने चरम पर पहुंचता है तो तत्काल मानसूनी नुकसान सीमित हो सकता है, लेकिन सर्दियों के मौसम, वर्षा के वितरण और अगले कृषि चक्र पर इसके संभावित प्रभावों पर नजर रखनी होगी।
मौजूदा वैज्ञानिक आकलन यह जरूर बताते हैं कि 2026 का अल नीनो सामान्य मौसमी घटना से अधिक शक्तिशाली हो सकता है। लेकिन भारत में इसके प्रभाव को लेकर अंतिम तस्वीर केवल प्रशांत महासागर के तापमान से तय नहीं होगी। आईओडी, मानसूनी परिसंचरण, समुद्री तापमान और क्षेत्रीय मौसम प्रणालियों की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
‘सुपर अल नीनो’ से घबराने के बजाय तैयारी जरूरी
प्रशांत महासागर में विकसित हो रही स्थिति निश्चित रूप से गंभीर निगरानी की मांग करती है, लेकिन इसे तत्काल वैश्विक आपदा के रूप में देखना उचित नहीं होगा। मौसम विज्ञान में पूर्वानुमान संभावनाओं पर आधारित होते हैं और समय के साथ उनमें बदलाव संभव है। इसलिए आने वाले महीनों में नए समुद्री तापमान आंकड़ों और मौसम मॉडलों के आधार पर तस्वीर और स्पष्ट होगी।
भारत के लिए प्राथमिकता जलाशयों और भूजल की स्थिति पर नजर रखने, कृषि क्षेत्र को मौसम आधारित सलाह देने, सूखा प्रभावित क्षेत्रों की तैयारी बढ़ाने और खाद्य कीमतों की निगरानी करने की होनी चाहिए। यदि अल नीनो मजबूत होता है तो समय रहते तैयारी ही उसके संभावित प्रभाव को कम करने का सबसे प्रभावी रास्ता होगी।
प्रशांत महासागर की गर्म होती लहरें फिलहाल भारत के दरवाजे पर तत्काल दस्तक देती नजर नहीं आ रही हैं, लेकिन आने वाले महीनों में उनकी दिशा और ताकत पर लगातार नजर रखना जरूरी है। मौजूदा संकेत बताते हैं कि 2026 का अल नीनो सामान्य से कहीं अधिक शक्तिशाली हो सकता है। भारत को राहत इस बात से मिल सकती है कि इसका चरम मानसून के बाद आए और हिंद महासागर की सकारात्मक परिस्थितियां इसके प्रभाव को संतुलित करें। लेकिन मौसम की इस बदलती कहानी में सबसे बड़ा सबक यही है कि राहत को निश्चितता मानने के बजाय तैयारी को प्राथमिकता दी जाए।