अमेरिका में रूस की तेल और गैस बिक्री पर प्रतिबंधों से जुड़े लंबे समय से लंबित विधेयक को सीनेट ने मंजूरी दे दी है। इस प्रस्तावित कानून का असर केवल रूस तक सीमित नहीं रहने की आशंका है। भारत, चीन, जापान और यूरोप के कुछ देशों के साथ होने वाले व्यापार पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
सीनेट में भारी बहुमत से पारित हुआ बिल
रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से लाए गए इस विधेयक के पक्ष में 86 सीनेटरों ने वोट दिया, जबकि 11 ने इसका विरोध किया। प्रस्ताव का मकसद रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय को प्रभावित करना और यूक्रेन युद्ध को लेकर मॉस्को पर दबाव बढ़ाना है। इस प्रस्ताव के समर्थकों में रिपब्लिकन पार्टी के दिवंगत सांसद लिंडसे ग्राहम भी शामिल थे। अब इस विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी मिलना बाकी है।
प्रतिनिधि सभा से पास होने के बाद राष्ट्रपति के पास जाएगा
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक विधेयक को सितंबर में प्रतिनिधि सभा में पेश किए जाने की संभावना है। यदि वहां भी इसे मंजूरी मिल जाती है, तो इसे अमेरिकी राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ही प्रस्तावित प्रतिबंध कानून का रूप ले सकेंगे।
भारत पर क्यों पड़ सकता है असर?
इस प्रस्ताव को लेकर भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता रूस से होने वाला ऊर्जा आयात है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में काफी बढ़ोतरी की है। रूस भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया है। प्रस्तावित अमेरिकी कानून में रूस के साथ कारोबार करने वाले देशों पर भी भारी शुल्क लगाने का प्रावधान चर्चा में है। ऐसे में यदि भारत से जुड़े व्यापार पर अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका असर दोनों देशों के कारोबारी संबंधों पर पड़ सकता है।
चीन भी आ सकता है दायरे में
भारत के अलावा चीन भी रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा और अन्य वस्तुओं का कारोबार करता है। जापान और यूरोप के कुछ देशों पर भी संभावित प्रभाव की बात सामने आ रही है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में संबंधित देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने की शक्ति मिल सकती है। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि अभी यह कानून लागू नहीं हुआ है। प्रतिनिधि सभा की मंजूरी और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ही इसके प्रावधान प्रभावी होंगे।
रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिश
अमेरिका और उसके सहयोगी देश रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाकर यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत की दिशा में आगे बढ़ने का दबाव बनाना चाहते हैं। रूस की ऊर्जा बिक्री उसकी अर्थव्यवस्था और सरकारी आय का महत्वपूर्ण स्रोत है, इसलिए तेल और गैस कारोबार को निशाना बनाना प्रतिबंध रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
आगे क्या होगा?
अब पूरी नजर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की कार्यवाही पर रहेगी। यदि बिल वहां से भी पारित होता है और राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाती है, तो भारत समेत रूस के साथ ऊर्जा कारोबार करने वाले देशों के लिए नई व्यापारिक और आर्थिक चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। फिलहाल भारत पर किसी नए अमेरिकी टैरिफ का लागू होना तय नहीं है, क्योंकि विधेयक अभी कानून नहीं बना है।