ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका का दबाव यूरोपीय देशों पर लगातार बढ़ता जा रहा है। इस मुद्दे ने अमेरिका के उन व्यापारिक वादों की पोल खोल दी है, जो उसने यूरोपीय संघ और यूनाइटेड किंगडम के साथ ट्रेड डील के दौरान किए थे। डील पर हस्ताक्षर होने के बावजूद, विरोध करने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी यह दर्शाती है कि अमेरिकी समझौते कितने अस्थिर हो सकते हैं।
ईयू-यूके की ट्रेड डील अब खुद संकट में
अमेरिका की टैरिफ चेतावनियों ने यूरोपीय संघ के सांसदों को ईयू-यूएस व्यापार समझौते की मंजूरी रोकने की कगार पर ला दिया है। फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार यूरोपीय देश 93 अरब यूरो तक के जवाबी उपायों पर विचार कर रहे हैं। इनमें अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ और अमेरिकी कंपनियों की यूरोपीय बाजार तक पहुंच सीमित करना शामिल है, जो ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में नई दरार का संकेत है।
ट्रंप की टैरिफ नीति: व्यापार नहीं, दबाव का औजार
यह पूरा घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि ट्रंप प्रशासन के लिए टैरिफ केवल व्यापारिक नीति नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक दबाव का हथियार हैं। किसी भी देश के साथ ट्रेड डील होने के बाद भी टैरिफ से सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं रहती। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और रणनीतिक लक्ष्यों को साधने के लिए टैरिफ का इस्तेमाल अमेरिका की आक्रामक नीति को उजागर करता है।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील: क्यों नहीं दिखाई जल्दबाज़ी
अमेरिका लंबे समय से भारत के साथ भी ट्रेड डील करना चाहता है, लेकिन यह समझौता अब तक अटका हुआ है। ट्रंप भारत से कृषि और डेयरी सेक्टर में अमेरिकी कंपनियों को प्रवेश देने की मांग कर चुके हैं, जिसका भारत में व्यापक विरोध हुआ। रूसी तेल के मुद्दे पर 50 फीसदी तक टैरिफ लगाए जाने के बावजूद भारत ने दबाव में आकर कोई त्वरित फैसला नहीं किया।
भारत की रणनीति: धैर्य ही असली ताकत
भारत ने समय रहते यह समझ लिया कि समय-सीमा में किया गया सौदा भले ही तात्कालिक लाभ दिखाए, लेकिन दीर्घकालिक सुरक्षा नहीं देता। जहां यूरोप अब इस सच्चाई से सीधे जूझ रहा है, वहीं भारत के वार्ताकारों ने घबराहट के बजाय धैर्य और रणनीतिक गहराई को प्राथमिकता दी। यही वजह है कि भारत आज मजबूत स्थिति में खड़ा दिखता है और वैश्विक व्यापार में अपनी शर्तों पर बात करने की क्षमता बनाए हुए है।
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