दतिया। मध्यप्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव का परिणाम कांग्रेस के पक्ष में गया है। कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों के अंतर से हराकर शानदार जीत दर्ज की। इस जीत के साथ कांग्रेस ने दतिया सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा, जबकि भाजपा को इस मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा।
तीसरे राउंड के बाद कांग्रेस ने बनाई निर्णायक बढ़त
मतगणना के शुरुआती चरण में मुकाबला कांटे का रहा, लेकिन तीसरे राउंड के बाद घनश्याम सिंह लगातार बढ़त बनाते चले गए। मध्य के राउंड में कांग्रेस की बढ़त 12 हजार वोटों से अधिक हो गई थी, जिससे मुकाबला लगभग एकतरफा दिखाई देने लगा।हालांकि अंतिम चरण की मतगणना में भाजपा ने अंतर कम करने की कोशिश की, लेकिन कांग्रेस की शुरुआती बढ़त इतनी मजबूत थी कि आशुतोष तिवारी वापसी नहीं कर सके और घनश्याम सिंह ने जीत अपने नाम कर ली।
तीसरी बार विधायक बने घनश्याम सिंह
दतिया की जनता ने एक बार फिर घनश्याम सिंह पर भरोसा जताया। इस जीत के साथ वे तीसरी बार विधायक चुने गए हैं। चुनाव में उन्हें 66,757 वोट प्राप्त हुए, जबकि भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को 60,741 वोट मिले।दोनों उम्मीदवारों के बीच 6,016 वोटों का अंतर रहा, जिसने कांग्रेस की जीत पर मुहर लगा दी।
आजाद समाज पार्टी ने भी दिखाया प्रभाव
इस उपचुनाव में आजाद समाज पार्टी (एएसपी) के उम्मीदवार दामोदर यादव ने भी उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। उन्हें 22,527 वोट मिले। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एएसपी को मिले वोटों ने चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया और मुकाबले को त्रिकोणीय स्वरूप दिया।
कांग्रेस मुख्यालय में जीत का जश्न
दतिया से जीत की आधिकारिक घोषणा होते ही भोपाल स्थित कांग्रेस मुख्यालय में उत्सव का माहौल बन गया। कार्यकर्ताओं ने आतिशबाजी कर एक-दूसरे को मिठाई खिलाई और ढोल-नगाड़ों के साथ जीत का जश्न मनाया।कांग्रेस नेताओं ने इसे जनता के विश्वास की जीत बताते हुए दावा किया कि यह परिणाम आगामी विधानसभा चुनावों के लिए सकारात्मक संकेत है। पार्टी नेताओं ने कहा कि प्रदेश में कांग्रेस के प्रति जनसमर्थन लगातार बढ़ रहा है।
भाजपा के लिए आत्ममंथन का अवसर
दतिया उपचुनाव भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का मुकाबला माना जा रहा था। पार्टी ने नए चेहरे के रूप में आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा था, लेकिन वह जीत दर्ज नहीं कर सके।इस परिणाम के बाद भाजपा को स्थानीय संगठन, चुनावी रणनीति और मतदाताओं के रुझान पर गंभीरता से समीक्षा करनी पड़ सकती है।