श्योपुर. कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीता पुनर्वास परियोजना के शुरुआती दौर में शावकों की मृत्यु ने वन्यजीव प्रबंधन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की थी। परियोजना के निदेशक उत्तम कुमार शर्मा के अनुसार, कूनो में जन्मे शुरुआती 4 शावकों में से 3 की मौत गर्मी के कारण हो गई थी। इस घटना ने स्पष्ट किया कि वयस्क चीतों की निगरानी के साथ-साथ नवजात शावकों की सुरक्षा के लिए अलग और अधिक संवेदनशील व्यवस्था की आवश्यकता है। इसके बाद कूनो प्रबंधन ने ऐसी निगरानी प्रणाली विकसित करने पर काम शुरू किया, जिसमें मानवीय हस्तक्षेप को न्यूनतम रखते हुए शावकों के स्वास्थ्य और गतिविधियों की जानकारी हासिल की जा सके। यही प्रयास आगे चलकर कूनो के संरक्षण मॉडल की महत्वपूर्ण विशेषता बन गया।
मां को परेशान किए बिना शावकों पर नजर
नए निगरानी मॉडल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें मादा चीता और उसके शावकों के प्राकृतिक व्यवहार में सीधे हस्तक्षेप से बचा जाता है। मादा की गतिविधियों पर उपग्रह कॉलर के जरिए नजर रखी जाती है, जबकि शावकों के ठिकाने के आसपास 24 घंटे कैमरों की निगरानी व्यवस्था रखी जाती है। इसके अलावा आवश्यकता के अनुसार मूक ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल भी किया जाता है, ताकि दूर से शावकों की स्थिति का आकलन किया जा सके। इस व्यवस्था का उद्देश्य मां और बच्चों के बीच प्राकृतिक संबंध को प्रभावित किए बिना उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना है। वन्यजीव संरक्षण में ऐसी दूरी बनाए रखना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अत्यधिक मानवीय हस्तक्षेप मादा को तनाव में डाल सकता है और शावकों के लिए जोखिम बढ़ा सकता है।
तकनीक और जंगल के प्राकृतिक व्यवहार का संतुलन
कूनो का यह मॉडल आधुनिक तकनीक और वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। सामान्य परिस्थितियों में शावकों की मांद के आसपास सीधे जाकर निगरानी करने से मादा चीता के व्यवहार में बदलाव आने का खतरा रहता है। इसके बजाय दूरस्थ निगरानी उपकरणों के इस्तेमाल से प्रबंधन को शावकों की गतिविधि, मांद के आसपास की स्थिति और मादा की आवाजाही से जुड़ी जानकारी लगातार मिलती रहती है। इससे किसी असामान्य स्थिति का पता लगने पर समय रहते आवश्यक कदम उठाने की संभावना बढ़ जाती है। खास तौर पर अत्यधिक गर्मी जैसी परिस्थितियों में यह व्यवस्था शावकों के लिए संभावित खतरे को समझने और संरक्षण दल को उचित निर्णय लेने में मदद कर सकती है।
अफ्रीकी अनुभव से अलग तैयार हुआ भारतीय तरीका
चीता संरक्षण के लिए अफ्रीकी देशों में लंबे समय से अलग-अलग निगरानी और प्रबंधन पद्धतियां इस्तेमाल की जाती रही हैं। कूनो में विकसित व्यवस्था की खासियत यह है कि इसे भारतीय परिस्थितियों और यहां के संरक्षण तंत्र की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यहां तापमान, वन क्षेत्र, शिकार की उपलब्धता और चीतों के व्यवहार जैसे स्थानीय कारकों को ध्यान में रखते हुए निगरानी की व्यवस्था विकसित की गई है। इस मॉडल में तकनीक का इस्तेमाल सीधे वन्यजीवों के करीब जाने के बजाय दूरी बनाए रखते हुए जानकारी हासिल करने के लिए किया जाता है। इससे भारत में चीता संरक्षण के लिए एक ऐसा व्यावहारिक तरीका सामने आया है, जिसे आगे अन्य संरक्षित क्षेत्रों की परिस्थितियों के अनुरूप भी अपनाया जा सकता है।
शावकों के जीवित रहने की दर में दिखा सुधार
कूनो में निगरानी व्यवस्था मजबूत किए जाने के बाद चीता शावकों के संरक्षण में सकारात्मक परिणाम सामने आने की बात कही जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, शावकों के जीवित रहने की दर बढ़कर करीब 61% तक पहुंची है। शुरुआती दौर में हुई शावकों की मौत के बाद यह सुधार कूनो के संरक्षण कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। हालांकि शावकों का जीवित रहना केवल निगरानी तकनीक पर निर्भर नहीं करता, बल्कि मौसम, मां की स्थिति, भोजन की उपलब्धता, संक्रमण, शिकारियों और प्राकृतिक परिस्थितियों जैसे कई कारक भी इसमें भूमिका निभाते हैं। फिर भी दूर से लगातार निगरानी की व्यवस्था ने संभावित जोखिमों की पहचान और संरक्षण प्रबंधन को अधिक व्यवस्थित बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
सफल प्रयोग का मैनुअल भी होगा तैयार
कूनो प्रबंधन इस निगरानी व्यवस्था के अनुभव को औपचारिक रूप देने की तैयारी में है। इसके लिए एक आधिकारिक मैनुअल तैयार किए जाने की योजना है, ताकि कूनो में विकसित और परखे गए तौर-तरीकों को देश के दूसरे राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों और संरक्षण क्षेत्रों में भी जरूरत के अनुसार लागू किया जा सके। यदि यह मॉडल अलग-अलग भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों में सफल रहता है, तो नवजात वन्यजीवों की निगरानी के लिए इसका व्यापक इस्तेमाल संभव हो सकता है। खासकर उन प्रजातियों के संरक्षण में इससे मदद मिल सकती है जिनके बच्चों को शुरुआती जीवन में मौसम, बीमारी या अन्य प्राकृतिक जोखिमों का सामना करना पड़ता है। इस तरह कूनो का अनुभव केवल चीता संरक्षण तक सीमित न रहकर भारत की व्यापक वन्यजीव संरक्षण नीति के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
कूनो की कहानी में जुड़ा संरक्षण का नया अध्याय
भारत में चीतों की वापसी केवल वयस्क चीतों को सुरक्षित रखने की परियोजना नहीं है, बल्कि जंगल में उनकी आने वाली पीढ़ियों को टिकाऊ आबादी में बदलना भी उतना ही महत्वपूर्ण लक्ष्य है। इस दृष्टि से कूनो में शावकों की निगरानी और सुरक्षा के लिए विकसित व्यवस्था परियोजना के अगले चरण की अहम जरूरत को पूरा करती है। तकनीक के सीमित और विवेकपूर्ण इस्तेमाल से वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार को बनाए रखते हुए संरक्षण कार्य को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। कूनो में सामने आए परिणाम इस दिशा में उत्साहजनक संकेत देते हैं। आने वाले वर्षों में इस मॉडल की सफलता इस बात से तय होगी कि यह अलग-अलग मौसमों और परिस्थितियों में शावकों के दीर्घकालिक जीवित रहने तथा चीता आबादी के स्थायी विस्तार में कितना योगदान देता है।