सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश लोकायुक्त संगठन को सूचना के अधिकार (RTI) कानून से मिली छूट पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा है कि आखिर किस आधार पर लोकायुक्त संगठन को आरटीआई के दायरे से बाहर रखा गया है। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या लोकायुक्त कोई खुफिया या सुरक्षा एजेंसी है, जिसे कानून के तहत छूट दी जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
मामले की सुनवाई जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान मध्यप्रदेश सरकार ऐसा कोई ठोस दस्तावेज या तथ्य पेश नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो सके कि लोकायुक्त संगठन खुफिया एजेंसी की तरह काम करता है।
2011 की अधिसूचना पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2011 में जारी वह अधिसूचना, जिसके जरिए लोकायुक्त संगठन को RTI कानून से छूट दी गई थी, पहली नजर में कानून की भावना के खिलाफ दिखाई देती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि RTI कानून का उद्देश्य सरकारी संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
मुख्य सचिव और महाधिवक्ता को तलब
कोर्ट ने मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन और महाधिवक्ता प्रशांत सिंह को 20 मई को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो 2011 की अधिसूचना रद्द की जा सकती है।
सरकारी वकीलों की कार्यप्रणाली पर भी नाराजगी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के वकीलों की कार्यप्रणाली पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि कई मामलों में सरकारी वकील प्रभावी तरीके से पक्ष नहीं रख पा रहे हैं। कोर्ट ने सरकारी वकीलों के पैनल की समीक्षा के संकेत भी दिए। इससे पहले Madhya Pradesh High Court भी लोकायुक्त संगठन को RTI के तहत जानकारी देने और 5 हजार रुपये जुर्माना भरने का आदेश दे चुका है।