उज्जैन के सती गेट क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण की जद में आए खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की कोशिश ने प्रशासन के सामने असाधारण तकनीकी चुनौती खड़ी कर दी है। मंदिर का ढांचा हटाए जाने के बाद प्रतिमा को स्थानांतरित करने के लिए क्रेन, जेसीबी और श्रमिकों की मदद ली गई, लेकिन कई प्रयासों के बावजूद प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली। करीब 10 दिनों तक चले प्रयासों के बाद प्रशासन ने फिलहाल जबरदस्ती की कार्रवाई से दूरी बना ली है। अब प्राथमिकता प्रतिमा को किसी भी तरह की क्षति से बचाते हुए वैज्ञानिक तरीके से यह समझना है कि वह जमीन में किस संरचना के कारण इतनी मजबूती से स्थिर है। इसी उद्देश्य से तकनीकी विशेषज्ञों की सहायता लेने का निर्णय सामने आया है।
IIT इंदौर के विशेषज्ञ करेंगे तकनीकी जांच
प्रतिमा को स्थानांतरित करने में लगातार आ रही मुश्किल के बाद अब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, इंदौर के विशेषज्ञों की मदद लेने की तैयारी की जा रही है। विशेषज्ञ यह अध्ययन कर सकते हैं कि प्रतिमा का आधार किस प्रकार का है, उसके नीचे जमीन की संरचना कैसी है और उसे उठाने के लिए किस तकनीकी प्रक्रिया का इस्तेमाल सुरक्षित रहेगा। भारी मशीनों के दबाव के बावजूद प्रतिमा का नहीं हिलना अपने आप में यह संकेत देता है कि उसके आधार और आसपास की मिट्टी या चट्टानी संरचना का विस्तृत परीक्षण जरूरी है। प्रशासन के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रतिमा को उठाने के दौरान उसके शरीर या आधार में किसी प्रकार की दरार अथवा संरचनात्मक क्षति न हो। इसलिए आगे की कार्रवाई विशेषज्ञों की तकनीकी राय के बाद ही किए जाने की संभावना है।
प्राचीन स्थापना तकनीक की भी जांच होगी
पुरातत्व विशेषज्ञों की ओर से यह संभावना जताई गई है कि प्रतिमा अपेक्षाकृत बहुत पुरानी हो सकती है और उसे जमीन में स्थापित करने के लिए किसी पारंपरिक तकनीक का इस्तेमाल हुआ हो। प्रारंभिक चर्चाओं में प्राचीन ‘इंटरलॉक’ जैसी स्थापना पद्धति की संभावना का उल्लेख किया जा रहा है, जिसमें पत्थर की संरचनाओं को इस तरह जोड़ा जाता था कि वे लंबे समय तक स्थिर बनी रहें। हालांकि प्रतिमा के जमीन के भीतर वास्तविक आधार और स्थापना तकनीक की पुष्टि वैज्ञानिक जांच के बाद ही हो सकेगी। यह भी संभव है कि प्रतिमा के नीचे या आसपास मजबूत चट्टानी परत मौजूद हो, जिसने उसे अत्यधिक स्थायित्व दिया हो। इसलिए फिलहाल इसे किसी चमत्कार या असाधारण घटना के रूप में निष्कर्षित करने के बजाय इसके पीछे मौजूद भौतिक और संरचनात्मक कारणों की जांच करना अधिक जरूरी है।
मालवा के मजबूत बेसाल्ट पत्थर की भी अहम भूमिका
प्रतिमा के निर्माण में इस्तेमाल पत्थर को लेकर भी विशेषज्ञों का ध्यान इसकी मजबूती और भारीपन पर है। मालवा क्षेत्र में व्यापक रूप से पाए जाने वाले बेसाल्ट पत्थर की संरचना काफी मजबूत होती है और इसका इस्तेमाल ऐतिहासिक निर्माणों में भी हुआ है। यदि प्रतिमा इसी प्रकार के भारी पत्थर से बनी है तो उसका कुल भार और जमीन के साथ उसका संपर्क स्थानांतरण की तकनीकी कठिनाई को बढ़ा सकता है। इसके अलावा लंबे समय तक एक ही स्थान पर स्थापित रहने से प्रतिमा का आधार आसपास की मिट्टी और संरचना के साथ मजबूती से जुड़ गया हो सकता है। यही कारण है कि केवल अधिक क्षमता वाली क्रेन का इस्तेमाल करना पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। प्रतिमा की वास्तविक संरचना और आधार का अध्ययन करके ही सुरक्षित उठाने की तकनीक निर्धारित की जा सकेगी।
भक्तों के लिए ‘डॉक्टर हनुमान’ हैं विशेष आस्था का केंद्र
तकनीकी चुनौती के समानांतर यह पूरा घटनाक्रम धार्मिक आस्था का विषय भी बन गया है। स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच खड़े हनुमान जी को लेकर गहरी मान्यता है और उन्हें कई भक्त ‘डॉक्टर हनुमान’ के नाम से भी पुकारते हैं। स्थानीय विश्वास के अनुसार, यहां बच्चों और बीमार लोगों की मन्नतें पूरी होने की मान्यता लंबे समय से चली आ रही है। ऐसे में प्रतिमा के अपनी जगह से नहीं हिलने की घटना को कई श्रद्धालु दैवी संकेत के रूप में देख रहे हैं। मंदिर से जुड़ी आस्था को देखते हुए प्रशासन के सामने तकनीकी प्रक्रिया के साथ भावनात्मक संवेदनशीलता बनाए रखने की भी चुनौती है। यही वजह है कि प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने वाला कोई भी जोखिम लेने के बजाय विशेषज्ञों की राय को प्राथमिकता देने पर जोर दिया जा रहा है।
हनुमान चालीसा के पाठ से लेकर विरोध तक
प्रतिमा को हटाने की कोशिशों के बीच श्रद्धालुओं और हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। कई लोगों ने प्रतिमा को स्थानांतरित किए जाने का विरोध करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ किया और धार्मिक स्थल को यथास्थान बनाए रखने की मांग उठाई। श्रद्धालुओं का तर्क है कि विकास कार्य आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन प्राचीन धार्मिक धरोहर से जुड़े फैसले अत्यंत सावधानी और सहमति के साथ लिए जाने चाहिए। प्रशासन की ओर से भी प्रतिमा की सुरक्षा को प्राथमिकता दिए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में आगे की कार्रवाई केवल सड़क चौड़ीकरण की जरूरत से तय नहीं होगी, बल्कि प्रतिमा की संरचनात्मक सुरक्षा, विशेषज्ञों की सलाह और स्थानीय धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन बनाना भी महत्वपूर्ण होगा।
अब वैज्ञानिक जांच से खुलेगा ‘न हिलने’ का राज
खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा के स्थानांतरण का मामला अब धार्मिक चर्चा से आगे बढ़कर तकनीकी जांच का विषय बन गया है। IIT इंदौर के विशेषज्ञों की जांच से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि प्रतिमा के न हिलने के पीछे उसका वजन, आधार की गहराई, जमीन की चट्टानी संरचना, स्थापना की पुरानी तकनीक या इन सभी का संयुक्त प्रभाव है। यदि विशेषज्ञ सुरक्षित स्थानांतरण की तकनीक विकसित कर पाते हैं तो प्रशासन के लिए सड़क चौड़ीकरण की योजना को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल सकता है। दूसरी ओर, यदि जांच में प्रतिमा को उठाने में गंभीर संरचनात्मक जोखिम सामने आता है तो वैकल्पिक योजना पर विचार करना पड़ सकता है। फिलहाल उज्जैन में श्रद्धालुओं और अधिकारियों की नजर इस तकनीकी जांच पर टिकी है, जो तय करेगी कि बजरंग बली की प्रतिमा को सुरक्षित रूप से स्थानांतरित किया जा सकता है या उसके संरक्षण के लिए कोई दूसरा रास्ता तलाशना होगा।