नई दिल्ली. भारत की अध्यक्षता में 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। ब्रिक्स में इस समय 11 देश शामिल हैं और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार ये देश दुनिया की करीब 49.5% आबादी, 40% वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद और 26% वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत ने इस वर्ष चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली है।
सम्मेलन में सदस्य देशों के अलावा विभिन्न स्तरों पर दूसरे देशों की भागीदारी भी भारत की कूटनीतिक सक्रियता को रेखांकित कर रही है। ऐसे समय में कांग्रेस के भीतर ही सम्मेलन के महत्व और उससे भारत को होने वाले लाभ को लेकर अलग-अलग राय सामने आई है। इसी ने राजनीतिक बहस को और दिलचस्प बना दिया है।
चिदंबरम ने उठाया सीधा सवाल, आखिर भारत को मिला क्या?
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने हाल में ब्रिक्स सहित कई बहुपक्षीय मंचों से भारत को मिलने वाले ठोस लाभ पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि पिछले 2-3 ब्रिक्स सम्मेलनों से उन्हें भारत के लिए कोई स्पष्ट और ठोस परिणाम दिखाई नहीं दिया। उन्होंने ब्रिक्स के साथ-साथ एससीओ, जी20 और क्वाड जैसे मंचों की उपयोगिता पर भी सवाल खड़े किए।
चिदंबरम का तर्क मुख्य रूप से परिणाम आधारित है। उनके अनुसार किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कितने राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री आते हैं, यह अपने आप में पर्याप्त नहीं है; महत्वपूर्ण यह है कि उससे भारत को व्यावसायिक, रणनीतिक या अन्य ठोस लाभ क्या हासिल होते हैं। उनके इस बयान ने सम्मेलन शुरू होने से पहले ही घरेलू राजनीतिक बहस को तेज कर दिया।
थरूर ने बताया भारत के लिए बड़ा कूटनीतिक अवसर
दूसरी ओर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ब्रिक्स की भूमिका को सकारात्मक नजरिए से देखा है। उन्होंने कहा कि वैश्विक दक्षिण में 100 से अधिक देश हैं, लेकिन ब्रिक्स के 11 सदस्य इस विविध समूह के महत्वपूर्ण देशों का सामूहिक प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके मुताबिक भारत को इन देशों की मेजबानी और अध्यक्षता का अवसर मिलना अपने आप में महत्वपूर्ण है।
थरूर ने इस आयोजन को केवल एक सम्मेलन के रूप में देखने के बजाय भारत की वैश्विक भूमिका से जोड़कर देखा। उनका मानना है कि इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच की मेजबानी से भारत की कूटनीतिक क्षमता, संवाद की भूमिका और वैश्विक दक्षिण के साथ उसकी सक्रिय भागीदारी सामने आती है।
‘इतने बड़े नेताओं का आना सम्मान की बात’
थरूर ने यह भी रेखांकित किया कि ब्रिक्स सम्मेलन में सदस्य देशों के अलावा अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष भी शामिल हो रहे हैं। उनके अनुसार इतने बड़े स्तर पर वैश्विक नेताओं का भारत आना देश के लिए प्रतिष्ठा की बात है।
यही वह बिंदु है जहां थरूर और चिदंबरम के नजरिए में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। चिदंबरम जहां सम्मेलन से निकलने वाले ठोस परिणामों को कसौटी मान रहे हैं, वहीं थरूर इसके कूटनीतिक और वैश्विक महत्व को भी उपलब्धि के रूप में देख रहे हैं। दोनों नेताओं के बयान कांग्रेस के भीतर विदेश नीति और बहुपक्षीय मंचों को लेकर अलग-अलग सोच की ओर संकेत करते हैं।
ब्रिक्स में भारत की भूमिका क्यों अहम है?
ब्रिक्स अब केवल शुरुआती 5 देशों तक सीमित समूह नहीं रह गया है। विस्तार के बाद इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी शामिल हैं। इससे मंच का भौगोलिक और आर्थिक प्रभाव काफी बढ़ा है। भारत के लिए यह चीन और रूस जैसे प्रमुख देशों के साथ संवाद बनाए रखने के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच अपनी स्वतंत्र कूटनीतिक भूमिका मजबूत करने का अवसर भी है।
भारत की अध्यक्षता में इस वर्ष लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा सीमा पार भुगतान को आसान बनाने के लिए ब्रिक्स देशों की केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं के बीच संपर्क की भारतीय पहल भी चर्चा में है, हालांकि इसके सामने राजनीतिक और तकनीकी चुनौतियां मौजूद हैं।
कांग्रेस के भीतर मतभेद या अलग-अलग नजरिया?
चिदंबरम और थरूर के बयानों के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ब्रिक्स के मुद्दे पर कांग्रेस में मतभेद गहरा रहे हैं। हालांकि दोनों नेताओं के बयानों को पार्टी के आधिकारिक टकराव के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। इसे एक ही अंतरराष्ट्रीय मंच को देखने के दो अलग-अलग नजरियों के रूप में भी समझा जा सकता है।
एक पक्ष सम्मेलन से प्रत्यक्ष और मापे जा सकने वाले परिणाम चाहता है, जबकि दूसरा पक्ष अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा, कूटनीतिक पहुंच और वैश्विक दक्षिण में प्रभाव को भी महत्वपूर्ण उपलब्धि मानता है। ऐसे में 18वें ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान सामने आने वाले ठोस निर्णय यह तय करने में अहम होंगे कि भारत की मेजबानी कितनी प्रभावी साबित होती है।
अब नजर सम्मेलन के नतीजों पर
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के पहले कांग्रेस नेताओं के इन अलग-अलग बयानों ने राजनीतिक चर्चा जरूर बढ़ा दी है, लेकिन अंतिम मूल्यांकन सम्मेलन के परिणामों से ही होगा। यदि व्यापार, निवेश, डिजिटल भुगतान, विकास सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर ठोस प्रगति होती है, तो भारत अपनी अध्यक्षता को उपलब्धियों के साथ जोड़ सकेगा।
दूसरी ओर यदि बड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति सीमित रहती है, तो चिदंबरम जैसे नेताओं का परिणाम आधारित सवाल भी मजबूत होंगे। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि भारत के लिए यह सम्मेलन केवल मेजबानी का अवसर नहीं, बल्कि अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं को वैश्विक मंच पर आगे बढ़ाने की बड़ी परीक्षा भी है।