नई दिल्ली. गुजरात पुलिस ने ऐसे आपराधिक नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जो कथित तौर पर बड़ी संख्या में फर्जी जीमेल खाते बनाकर सरकारी कार्यालयों को बम धमकियों वाले ईमेल भेज रहा था। पुलिस के अनुसार, इस नेटवर्क से जुड़े लोगों ने 2022 से अब तक 5,13,847 जीमेल आईडी और उनके पासवर्ड का इस्तेमाल किया। मामले में 2 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और जांच को अब व्यापक साइबर अपराध के कोण से आगे बढ़ाया जा रहा है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि नेटवर्क की गतिविधियां केवल एक स्थान तक सीमित नहीं थीं, बल्कि अलग-अलग राज्यों को प्रभावित करने वाली अंतरराज्यीय धमकियों से जुड़ी थीं। इतनी बड़ी संख्या में खातों के सामने आने से जांच एजेंसियों का ध्यान इस बात पर भी गया है कि इन खातों को बनाने और संचालित करने के लिए गूगल की सुरक्षा व्यवस्था में किस तरह की कमियों का फायदा उठाया गया।
गूगल से सुरक्षा व्यवस्था पर होगी पूछताछ
गुजरात पुलिस अब गूगल से इस मामले में सुरक्षा उपायों और खाते बनाने की प्रक्रिया को लेकर जवाब मांगने की तैयारी कर रही है। वरिष्ठ साइबर अपराध अधिकारी विवेक भेड़ा ने बताया कि पुलिस गूगल को पत्र लिखकर ऐसी नीतिगत व्यवस्था में बदलाव की मांग करेगी, जिससे सुरक्षा उपायों को आसानी से दरकिनार न किया जा सके। पुलिस जल्द ही गूगल को औपचारिक रूप से जांच के दायरे में शामिल करने की प्रक्रिया भी शुरू कर सकती है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कंपनी के खिलाफ कोई कानूनी आरोप या दंडात्मक कार्रवाई बनती है या नहीं। जांच का तत्काल केंद्र यह पता लगाना है कि इतने बड़े पैमाने पर फर्जी खातों का निर्माण और इस्तेमाल किस तरीके से संभव हुआ और क्या किसी तकनीकी या नीतिगत कमजोरी का लगातार फायदा उठाया गया।
5,13,847 खातों का आंकड़ा जांच में बना बड़ा सुराग
जांच के दौरान सामने आया 5,13,847 जीमेल खातों का आंकड़ा इस मामले को असाधारण रूप से बड़ा बनाता है। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इस स्तर पर फर्जी खातों के इस्तेमाल का मामला उनके सामने पहले नहीं आया था। बड़ी संख्या में खाते और पासवर्ड मिलने से जांच एजेंसियों के सामने अब नेटवर्क की पूरी संरचना का पता लगाने की चुनौती है। उन्हें यह समझना होगा कि खाते किस उद्देश्य से बनाए गए, किन लोगों ने उनका इस्तेमाल किया और धमकी वाले संदेशों को अलग-अलग सरकारी संस्थानों तक पहुंचाने के लिए किन तकनीकी तरीकों का इस्तेमाल किया गया। इसके साथ ही यह भी पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि नेटवर्क के पीछे केवल गिरफ्तार किए गए 2 लोग थे या इसके पीछे अन्य संचालक, तकनीकी सहयोगी और वित्तीय हितधारक भी मौजूद थे।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से जुड़ी धमकी ने बढ़ाई गंभीरता
इस मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि जांच में सामने आई धमकी गतिविधियों का एक हिस्सा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समय से जुड़ा बताया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के ऐसे सम्मेलन में सुरक्षा एजेंसियां पहले से ही किसी भी संभावित खतरे को लेकर अत्यधिक सतर्क रहती हैं। फर्जी ईमेल खातों के जरिए बम धमकियां भेजना केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि इससे बड़े सार्वजनिक आयोजनों और सरकारी संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी दबाव पड़ सकता है। ऐसी धमकियों के पीछे वास्तविक विस्फोटक मौजूद न होने के बावजूद सुरक्षा बलों को व्यापक तलाशी, निकासी और जांच अभियान चलाने पड़ते हैं। इससे सरकारी संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है और वास्तविक सुरक्षा खतरों की पहचान की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
भारत में साइबर अपराध का बढ़ता दबाव
भारत में डिजिटल सेवाओं के तेजी से विस्तार के साथ साइबर अपराध भी कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। वित्तीय धोखाधड़ी से लेकर पहचान की चोरी, फर्जी खातों और ऑनलाइन धमकियों तक अपराधी लगातार डिजिटल मंचों का इस्तेमाल करने के नए तरीके तलाश रहे हैं। पुलिस और अन्य जांच एजेंसियां अब उन प्रौद्योगिकी कंपनियों और मंचों की भूमिका की भी जांच कर रही हैं, जिनकी सेवाओं का अपराधी अपने अभियानों में इस्तेमाल करते हैं। वित्तीय साइबर अपराधों से भारत में हर वर्ष 2 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान होने का अनुमान बताया गया है। ऐसे माहौल में बड़ी संख्या में फर्जी ईमेल खातों का इस्तेमाल कर सरकारी संस्थानों को धमकियां भेजने का मामला डिजिटल मंचों की निगरानी और सुरक्षा मानकों को लेकर नई बहस पैदा कर सकता है।
फायरबेस के दुरुपयोग के बाद गूगल पर एक और सवाल
गूगल पहले से ही भारत में अपने डिजिटल मंचों के कथित दुरुपयोग को लेकर जांच और नियामकीय निगरानी का सामना कर रहा है। अधिकारियों ने इससे पहले उसके वेब विकास मंच फायरबेस के इस्तेमाल से जुड़े ऐसे पैटर्न का पता लगाया था, जिनका कथित तौर पर वित्तीय साइबर धोखाधड़ी में उपयोग किया जा रहा था। अब फर्जी जीमेल खातों के बड़े नेटवर्क का सामने आना कंपनी की सुरक्षा नीतियों को लेकर अलग तरह का सवाल खड़ा करता है। दोनों मामलों की प्रकृति अलग हो सकती है, लेकिन जांच एजेंसियों के लिए साझा मुद्दा यह है कि अपराधी वैध डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल किस तरह बड़े पैमाने पर गैरकानूनी गतिविधियों के लिए कर पा रहे हैं। आने वाले दिनों में पुलिस की पूछताछ इस बात पर केंद्रित रह सकती है कि मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था में किन स्तरों पर सुधार की आवश्यकता है।
जांच का अगला चरण तय करेगा जिम्मेदारी
फिलहाल मामले में गूगल की संभावित कानूनी जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं है और पुलिस की जांच शुरुआती चरण में है। किसी डिजिटल मंच पर फर्जी खाते बनाए जाने मात्र से कंपनी की आपराधिक जिम्मेदारी स्वतः तय नहीं होती। इसके लिए जांच एजेंसियों को यह स्थापित करना होगा कि सुरक्षा उपायों को किस तरह दरकिनार किया गया, क्या किसी कमजोरी की जानकारी थी और संबंधित नीतियों के तहत कंपनी से किस स्तर की कार्रवाई अपेक्षित थी। पुलिस द्वारा गूगल को जांच का विषय बनाए जाने के बाद कंपनी से तकनीकी जानकारी और नीतिगत स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि 5 लाख से अधिक खातों वाला नेटवर्क इतने लंबे समय तक किस तरह सक्रिय रहा और उसे रोकने के लिए डिजिटल मंच की मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था कितनी प्रभावी थी।