भारत में कृषि उत्पादन का विशाल आधार देश की खाद्य सुरक्षा की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है, लेकिन खेत से बाजार तक पहुंचने की प्रक्रिया में उपज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अपना आर्थिक और पोषण संबंधी मूल्य खो देता है। खासकर फल और सब्जियों जैसी जल्दी खराब होने वाली फसलों के मामले में कटाई के बाद होने वाला नुकसान किसानों और पूरी खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। राष्ट्रीय आकलनों के अनुसार अलग-अलग फसलों और क्षेत्रों में नुकसान का स्तर अलग हो सकता है, लेकिन फल और सब्जियों में यह लगभग 5 से 16 प्रतिशत तक पहुंचता है। सालाना होने वाले इस नुकसान का अनुमान 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक लगाया गया है। इसका अर्थ यह है कि खेत में पैदा होने वाली संपदा का एक बड़ा हिस्सा किसान की आय बनने से पहले ही नष्ट हो जाता है और उत्पादन बढ़ाने की उपलब्धि का पूरा आर्थिक लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाता।
फल-सब्जियों में सबसे बड़ा संकट, क्योंकि समय ही सबसे महंगा है
नाशवान फसलों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसान के पास बिक्री के लिए बहुत सीमित समय होता है। यदि किसी गांव या उत्पादन क्षेत्र के आसपास कोल्ड स्टोरेज, ग्रेडिंग, पैकेजिंग या प्रसंस्करण की सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो किसान अपनी फसल को लंबे समय तक रोक नहीं सकता। ऐसे में उसे स्थानीय मंडी में उपलब्ध कीमत पर तत्काल बिक्री करनी पड़ती है, भले ही वह कीमत उसकी उत्पादन लागत और अपेक्षित लाभ के अनुरूप न हो। दूसरी ओर, अगर उसी उपज को साफ करके, छांटकर, पैक करके या जैम, प्यूरी, जूस, सूखी सब्जी और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों में बदला जा सके, तो उसकी बाजार कीमत और उपयोग की अवधि दोनों बढ़ सकती हैं। इसलिए कृषि की अगली चुनौती केवल अधिक उत्पादन हासिल करना नहीं, बल्कि खेत से निकलने वाली उपज को लंबे समय तक सुरक्षित रखते हुए उसका अधिकतम आर्थिक मूल्य पैदा करना है।
उत्पादन करीब 29 करोड़ टन, लेकिन प्रोसेसिंग अभी बहुत पीछे
भारत हर वर्ष लगभग 29 करोड़ मीट्रिक टन फल और सब्जियों का उत्पादन करता है, लेकिन इस विशाल उत्पादन का केवल एक छोटा हिस्सा ही प्रसंस्करण की औपचारिक व्यवस्था तक पहुंच पाता है। समग्र खाद्य प्रसंस्करण की पैठ भारत में लगभग 10 प्रतिशत के आसपास बताई जाती है, जबकि कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह स्तर 40 से 60 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। फल और सब्जियों के मामले में भारत की प्रसंस्करण दर करीब 4 प्रतिशत होने की बात सामने आती है, जो इस क्षेत्र में मौजूद विशाल अंतर को दिखाती है। यही अंतर भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक अवसर भी है, क्योंकि मौजूदा उत्पादन को ही बेहतर ढंग से संभालकर किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और खाद्य उद्योग का आकार बढ़ाया जा सकता है। उत्पादन बढ़ाने के साथ प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने पर जोर देने से एक ही फसल से कहीं अधिक मूल्य पैदा किया जा सकता है।
खेत के पास छोटी इकाइयां बदल सकती हैं ग्रामीण अर्थव्यवस्था
बड़े कारखानों के साथ-साथ खेत और किसान उत्पादक क्षेत्रों के नजदीक छोटी तथा विकेंद्रित प्रसंस्करण इकाइयों का नेटवर्क इस समस्या का व्यावहारिक समाधान बन सकता है। यदि किसी फल या सब्जी उत्पादक क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर सफाई, छंटाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, कोल्ड स्टोरेज और प्राथमिक प्रसंस्करण की सुविधाएं उपलब्ध हों, तो किसान को अपनी पूरी उपज उसी दिन कम कीमत पर बेचने की मजबूरी घट सकती है। ऐसी इकाइयां स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और उद्यमिता के अवसर भी पैदा कर सकती हैं तथा परिवहन के दौरान होने वाले नुकसान को कम कर सकती हैं। किसान उत्पादक संगठन, सहकारी संस्थाएं और निजी उद्यम इस मॉडल को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इससे कृषि केवल कच्ची उपज बेचने वाली गतिविधि न रहकर स्थानीय स्तर पर मूल्यवर्धन और ग्रामीण उद्योग का आधार बन सकती है।
खाद्य सुरक्षा का अगला चरण सिर्फ उत्पादन नहीं, मूल्यवर्धन है
भारत ने खाद्य उपलब्धता के मोर्चे पर पिछले वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति की है और कुपोषण से जुड़े संकेतकों में भी सुधार देखने को मिला है। लेकिन खाद्य सुरक्षा को केवल इस आधार पर नहीं मापा जा सकता कि खेतों में कितनी फसल पैदा हुई। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उत्पादित भोजन का कितना हिस्सा सुरक्षित तरीके से उपभोक्ता तक पहुंचता है, कितना खराब हो जाता है और कितना उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदला जाता है। उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण और वितरण तक पूरी श्रृंखला को मजबूत किए बिना कृषि क्षेत्र की वास्तविक क्षमता सामने नहीं आ सकती। यही कारण है कि आने वाले समय में कृषि नीति का फोकस केवल पैदावार बढ़ाने से आगे बढ़कर भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन, पैकेजिंग और बाजार से बेहतर जुड़ाव पर होना जरूरी है।
किसान की आय बढ़ाने का रास्ता मंडी से आगे निकलता है
किसान की आय में बड़ा बदलाव तब आएगा जब वह केवल कच्ची उपज का विक्रेता न रहकर मूल्यवर्धित खाद्य श्रृंखला का भागीदार बनेगा। उदाहरण के लिए, एक ही फल को ताजा अवस्था में बेचने के बजाय उसका पल्प, जूस, प्यूरी, सूखा उत्पाद या अन्य प्रसंस्कृत खाद्य सामग्री तैयार की जा सकती है। इससे उत्पाद की शेल्फ लाइफ बढ़ती है और बाजार तक पहुंचने के लिए किसान को केवल तत्काल बिक्री पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। हालांकि इसके लिए तकनीक, पूंजी, गुणवत्ता मानक, बिजली, पानी, पैकेजिंग और बाजार संपर्क जैसी सुविधाओं की जरूरत होगी। यदि इन बाधाओं को स्थानीय स्तर पर दूर किया जाए तो कृषि उत्पादन का बड़ा हिस्सा बर्बादी में जाने के बजाय आय, रोजगार और ग्रामीण औद्योगिकीकरण में बदल सकता है।
भारत के लिए अगली छलांग खेत से कारखाने तक की होगी
भारतीय कृषि की अगली बड़ी क्रांति शायद खेत में और अधिक उत्पादन करने से ज्यादा उस उत्पादन को बेहतर ढंग से संभालने और उसका मूल्य बढ़ाने से आएगी। देश के पास विशाल कृषि आधार, विविध जलवायु और बड़ा घरेलू बाजार मौजूद है, लेकिन इन ताकतों का पूरा लाभ तभी मिलेगा जब कटाई के बाद की पूरी व्यवस्था आधुनिक और किसान-केंद्रित बने। खेत के करीब प्रसंस्करण इकाइयां, मजबूत कोल्ड चेन, बेहतर लॉजिस्टिक्स और डिजिटल बाजार संपर्क मिलकर कृषि को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बना सकते हैं। इससे एक तरफ उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद मिलेंगे, वहीं दूसरी तरफ किसानों को कीमतों के उतार-चढ़ाव से कुछ हद तक सुरक्षा और अपनी उपज पर अधिक मूल्य हासिल करने का अवसर मिलेगा। इसलिए भारत की अगली कृषि क्रांति का असली लक्ष्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि खेत से कितनी फसल निकली, बल्कि यह होना चाहिए कि उस फसल से किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए कितना वास्तविक मूल्य पैदा हुआ।