भारत में इस वर्ष मानसूनी गतिविधियां अब ऐसे समय कमजोर पड़ रही हैं, जब मौसम चक्र के लिहाज से बारिश का प्रभाव मजबूत रहना चाहिए। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के विस्तारित अवधि के पूर्वानुमान के अनुसार अगले कम से कम 2 सप्ताह तक देश में सामान्य से कम वर्षा की स्थिति बनी रह सकती है। 20 अगस्त को जारी पूर्वानुमान में 2 सितंबर तक बारिश की गतिविधियों के कमजोर रहने का संकेत दिया गया है। शनिवार तक देश में संचयी वर्षा सामान्य दीर्घकालिक औसत से 14% कम थी और आने वाले दिनों में इस कमी के और बढ़ने की आशंका जताई गई है। इससे कृषि क्षेत्र, जल भंडारण और आगामी फसल चक्र को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
हिमालय की ओर अटका मानसूनी ट्रफ बना बड़ी वजह
मौसम विभाग के अनुसार मानसून ट्रफ का लगातार हिमालय की तलहटी के करीब बने रहना मौजूदा स्थिति की प्रमुख वजहों में शामिल है। सामान्य परिस्थितियों में मानसून ट्रफ का दक्षिण की ओर खिसकना मध्य भारत और देश के अन्य हिस्सों में वर्षा गतिविधियों को बढ़ावा देता है। लेकिन इस समय इसके हिमालयी क्षेत्र के आसपास टिके रहने से मध्य भारत के बड़े हिस्से में अपेक्षित वर्षा गतिविधियां नहीं बन पा रही हैं। इसका असर देश के कुल वर्षा आंकड़ों पर भी दिखाई दे रहा है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो वर्षा घाटे की भरपाई के लिए उपलब्ध समय तेजी से कम हो सकता है।
अगले 2 सप्ताह देशभर में सामान्य से कम बारिश का अनुमान
मौसम विभाग ने पूर्वानुमान की दोनों सप्ताह की अवधि में देश के स्तर पर सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में मौसम का व्यवहार एक जैसा नहीं रहेगा और कुछ इलाकों में भारी से बहुत भारी बारिश भी हो सकती है। हिमालयी पट्टी तथा पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में तेज वर्षा की गतिविधियां जारी रहने की संभावना है। इसके विपरीत प्रायद्वीपीय भारत में अगले सप्ताह मानसूनी गतिविधियां अपेक्षाकृत कमजोर रह सकती हैं। इस तरह देश के कुल वर्षा आंकड़े में कमी बनी रहने के बावजूद कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और दूसरे क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात एक साथ दिखाई दे सकते हैं।
बंगाल की खाड़ी में बन सकता है निम्न दबाव का क्षेत्र
मौसम विभाग के मुताबिक उत्तर बंगाल की खाड़ी में पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के तटों के पास अगले 24 घंटे में निम्न दबाव का क्षेत्र बनने की संभावना है। इस मौसम प्रणाली के प्रभाव से ओडिशा और छत्तीसगढ़ में 26 अगस्त तक भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है। इससे इन राज्यों में कुछ समय के लिए मानसूनी गतिविधियां मजबूत होने की उम्मीद है। हालांकि किसी एक मौसम प्रणाली से देशभर में मौजूद वर्षा घाटे की भरपाई होना आसान नहीं होगा। इसके लिए मानसून की व्यापक और लगातार सक्रियता जरूरी होगी, खासकर मध्य और पश्चिमी भारत के उन हिस्सों में जहां बारिश की कमी कृषि गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है।
सर्दियों की फसल को लेकर बढ़ी चिंता
मानसून की मौजूदा कमजोरी का असर केवल खरीफ फसलों तक सीमित नहीं है। देश में आगामी रबी मौसम की तैयारी और हाल की कृषि गतिविधियों को देखते हुए पर्याप्त वर्षा का महत्व और बढ़ जाता है। मिट्टी में नमी की उपलब्धता, जलाशयों में पानी का स्तर और सिंचाई संसाधनों की स्थिति आने वाले फसल चक्र पर असर डाल सकती है। यदि मानसून की कमी आगे भी बनी रहती है तो किसानों को सिंचाई पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है। इससे उन क्षेत्रों में जोखिम बढ़ेगा जहां खेती मुख्य रूप से वर्षा आधारित है और वैकल्पिक जल संसाधन सीमित हैं।
वर्षा घाटा 14% से आगे बढ़ने का खतरा
शनिवार तक देश में वर्षा का संचयी घाटा दीर्घकालिक औसत की तुलना में 14% दर्ज किया गया था। मानसून के अगले 2 सप्ताह तक कमजोर रहने की संभावना इस घाटे को और बढ़ा सकती है। हालांकि मानसून के अंतिम चरण में कुछ मजबूत मौसम प्रणालियां बनने पर स्थिति में सुधार संभव है, लेकिन फिलहाल मौसम विभाग का पूर्वानुमान राहत देने वाला नहीं है। वर्षा के आंकड़ों का राष्ट्रीय औसत कई बार क्षेत्रीय वास्तविकता को पूरी तरह नहीं दर्शाता, क्योंकि एक राज्य में अत्यधिक बारिश और दूसरे राज्य में गंभीर कमी एक साथ मौजूद हो सकती है। इसलिए आगे के दिनों में क्षेत्रवार वर्षा गतिविधि पर विशेष नजर रखना जरूरी होगा।
पहाड़ों में तेज बारिश, मैदानी इलाकों में अलग तस्वीर
जहां मध्य और प्रायद्वीपीय भारत में मानसून की सुस्ती चिंता बढ़ा रही है, वहीं हिमालयी क्षेत्रों में भारी वर्षा की संभावना बनी हुई है। हिमालयी पट्टी में लगातार तेज बारिश से नदियों का जलस्तर बढ़ने, भूस्खलन और स्थानीय बाढ़ जैसी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है। पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में भी भारी से बहुत भारी वर्षा की संभावना है। इस तरह मौजूदा मानसूनी स्थिति एक असमान वर्षा वितरण की तस्वीर पेश कर रही है, जिसमें कुछ इलाकों को अतिरिक्त बारिश का सामना करना पड़ सकता है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में किसान पर्याप्त पानी का इंतजार करते रह सकते हैं।
आगे की बारिश तय करेगी मानसून की अंतिम तस्वीर
फिलहाल मानसून का कमजोर पड़ना चिंता का विषय जरूर है, लेकिन पूरे मौसम की अंतिम तस्वीर अभी तय नहीं हुई है। आने वाले सप्ताहों में बनने वाली मौसम प्रणालियां, बंगाल की खाड़ी की गतिविधियां और मानसून ट्रफ की स्थिति वर्षा के वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। यदि ट्रफ मध्य भारत की ओर सक्रिय रूप से खिसकता है और लगातार निम्न दबाव वाले क्षेत्र बनते हैं, तो कुछ हद तक वर्षा घाटे की भरपाई संभव हो सकती है। लेकिन यदि मौजूदा सुस्ती लंबी खिंचती है, तो कृषि, जल संसाधन और आगामी रबी मौसम पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में अगले 2 सप्ताह भारत के मानसून और खेती दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।