मणिपुर में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी को जनगणना से पहले लागू करने की मांग को लेकर राजनीतिक और सामाजिक तनाव बढ़ गया है। विभिन्न समुदायों और नागरिक संगठनों से जुड़े समूहों का तर्क है कि राज्य में जनसांख्यिकीय स्थिति और नागरिकता से संबंधित मुद्दों पर पहले स्पष्टता आवश्यक है। इसी मांग के साथ वर्ष 1951 को आधार वर्ष मानते हुए एनआरसी तैयार करने की मांग जोर पकड़ रही है।
इस मुद्दे ने ऐसे समय में राज्य की चिंता बढ़ाई है, जब मणिपुर पहले से ही लंबे समय से जातीय हिंसा और सामाजिक तनाव के प्रभाव से उबरने की कोशिश कर रहा है। जनगणना जैसी व्यापक प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू होने से पहले एनआरसी की मांग ने सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों के बीच नए टकराव की स्थिति पैदा कर दी है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जनगणना और परिसीमन जैसे विषयों का राज्य की जनसांख्यिकीय संरचना से सीधा संबंध है, इसलिए उनकी मांगों पर पहले विचार किया जाना चाहिए।
तीन दिनों के लिए शिक्षण संस्थान बंद करने का आदेश
बढ़ते तनाव और विरोध प्रदर्शनों के बीच मणिपुर सरकार ने स्कूलों और महाविद्यालयों सहित शिक्षण संस्थानों को तीन दिनों के लिए बंद रखने का आदेश दिया है। यह फैसला उस समय लिया गया, जब राजधानी इम्फाल सहित विभिन्न क्षेत्रों में छात्र और अन्य समूह एनआरसी की मांग को लेकर सक्रिय हो गए। सरकार का यह कदम कानून-व्यवस्था की स्थिति और विद्यार्थियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया माना जा रहा है।
शिक्षण संस्थानों को बंद करने का निर्णय यह भी दर्शाता है कि जनगणना से जुड़ा विवाद केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है। जब किसी सामाजिक या राजनीतिक मांग का असर बच्चों और युवाओं की पढ़ाई तक पहुंचने लगे, तो उसका प्रभाव व्यापक हो जाता है। मणिपुर में पहले से मौजूद अस्थिरता के बीच शिक्षा व्यवस्था में एक बार फिर व्यवधान की आशंका ने अभिभावकों और विद्यार्थियों की चिंताओं को बढ़ा दिया है।
इम्फाल में छात्रों का प्रदर्शन, एनआरसी की मांग पर जोर
राजधानी इम्फाल में बड़ी संख्या में छात्र जनगणना से पहले एनआरसी लागू करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलन में शामिल लोगों का कहना है कि राज्य में होने वाली आगामी जनगणना से पहले नागरिकों की पहचान और जनसंख्या से जुड़े सवालों पर स्पष्ट प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। प्रदर्शनकारियों ने वर्ष 1951 को एनआरसी के लिए आधार वर्ष बनाए जाने की मांग रखी है।
छात्रों की सक्रिय भागीदारी ने आंदोलन को विशेष महत्व दिया है। नई पीढ़ी का किसी संवेदनशील जनसांख्यिकीय और प्रशासनिक मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से सामने आना बताता है कि यह बहस अब केवल राजनीतिक संगठनों तक सीमित नहीं है। हालांकि एनआरसी और जनगणना जैसे विषय संवैधानिक, कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़े हैं, इसलिए इनके समाधान के लिए भावनात्मक बहस के बजाय व्यापक संवाद और स्पष्ट सरकारी नीति की आवश्यकता होगी।
पहली सितंबर से प्रस्तावित है जनगणना का पहला चरण
मणिपुर में जनगणना 2027 के पहले चरण के तहत मकानों की सूची तैयार करने की प्रक्रिया पहली सितंबर से तीस सितंबर तक प्रस्तावित है। इसी प्रशासनिक गतिविधि के विरोध में विभिन्न संगठनों की सक्रियता बढ़ी है। जनगणना से संबंधित कार्य शुरू होने से पहले ही राज्य के कुछ हिस्सों में विरोध सामने आ चुका है, जिससे प्रक्रिया के सुचारु संचालन को लेकर प्रशासन के सामने चुनौती खड़ी हो सकती है।
जनगणना किसी भी राज्य और देश के लिए महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है क्योंकि इससे जनसंख्या, आवास और सामाजिक संरचना से संबंधित व्यापक आंकड़े तैयार किए जाते हैं। इन आंकड़ों का उपयोग भविष्य की नीतियों और विकास योजनाओं के निर्माण में किया जाता है। मणिपुर में एनआरसी की मांग के साथ जनगणना का विरोध इसलिए अधिक संवेदनशील बन गया है क्योंकि इसके साथ भविष्य में होने वाले परिसीमन का मुद्दा भी जोड़ा जा रहा है।
बंद और सरकारी संस्थानों के बहिष्कार का आह्वान
स्थानीय संगठन ‘कैंपेन फॉर जस्ट एंड फेयर डिलिमिटेशन’ ने एनआरसी की मांग के समर्थन में दो दिवसीय बंद का आह्वान किया था। संगठन ने इसके बाद केंद्रीय और राज्य सरकार के संस्थानों के बहिष्कार की भी घोषणा की। आंदोलनकारियों का उद्देश्य जनगणना से पहले एनआरसी लागू करने की मांग को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों पर दबाव बनाना है।
बंद और बहिष्कार जैसी गतिविधियों का सीधा प्रभाव आम जनजीवन और सरकारी कामकाज पर पड़ सकता है। मणिपुर जैसे संवेदनशील राज्य में लंबे समय तक किसी भी प्रकार का प्रशासनिक अवरोध सामान्य नागरिकों के लिए अतिरिक्त कठिनाइयां पैदा कर सकता है। इसलिए सरकार के सामने एक ओर जनगणना जैसी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की चुनौती है, तो दूसरी ओर स्थानीय समुदायों और संगठनों की आशंकाओं को संवाद के माध्यम से संबोधित करने की जिम्मेदारी भी है।
जनगणना कर्मियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में भी पड़ा था व्यवधान
जनगणना संबंधी गतिविधियों का विरोध पहले भी सामने आ चुका है। बिष्णुपुर जिले में चौदह अगस्त को जनगणना कर्मियों के लिए आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में व्यवधान की सूचना सामने आई थी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि विरोध केवल सार्वजनिक प्रदर्शनों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर जनगणना की प्रारंभिक प्रशासनिक तैयारियों पर भी पड़ रहा है।
ऐसी स्थिति में प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि जनगणना प्रक्रिया से जुड़े कर्मचारियों और अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए कार्यक्रमों को सुचारु रूप से संचालित किया जाए। साथ ही, केवल प्रशासनिक कार्रवाई के सहारे आंदोलन को नियंत्रित करने के बजाय प्रदर्शनकारियों और संबंधित समुदायों के साथ संवाद स्थापित करना भी आवश्यक होगा। मणिपुर की जटिल सामाजिक संरचना को देखते हुए किसी भी निर्णय का प्रभाव विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास और संबंधों पर पड़ सकता है।
विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधिमंडल दिल्ली पहुंचा
मणिपुर के विभिन्न समुदायों और नागरिक संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाला दस सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल अपनी मांग केंद्र सरकार तक पहुंचाने के लिए दिल्ली रवाना हुआ है। प्रतिनिधिमंडल ने संकेत दिया है कि वह केंद्रीय मंत्रियों, भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और अन्य संबंधित अधिकारियों के समक्ष एनआरसी को जनगणना से पहले लागू करने की मांग रखेगा।
प्रतिनिधिमंडल की दिल्ली यात्रा यह दर्शाती है कि आंदोलनकारी इस मुद्दे का समाधान केवल राज्य स्तर पर नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के माध्यम से चाहते हैं। एनआरसी, जनगणना और परिसीमन तीनों ऐसे विषय हैं जिनका प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभाव व्यापक हो सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया और मणिपुर में जनगणना संबंधी तैयारियों पर उसका असर महत्वपूर्ण रहेगा।
जनगणना, एनआरसी और परिसीमन की बहस में क्या है आगे की चुनौती?
मणिपुर में उभरा यह विवाद एक जटिल प्रशासनिक और सामाजिक प्रश्न की ओर इशारा करता है। जनगणना जनसंख्या से संबंधित आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया है, जबकि एनआरसी नागरिकों की पहचान से जुड़ी एक अलग प्रशासनिक व्यवस्था है। दूसरी ओर परिसीमन का संबंध निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व से होता है। आंदोलनकारी इन तीनों विषयों को एक-दूसरे से जोड़कर देख रहे हैं और चाहते हैं कि भविष्य की जनगणना तथा परिसीमन से पहले नागरिकता से जुड़े प्रश्नों का समाधान किया जाए।
मणिपुर की वर्तमान परिस्थितियों में सबसे बड़ी आवश्यकता विश्वास बहाली की है। राज्य पहले ही हिंसा और सामाजिक विभाजन की गंभीर चुनौतियों से गुजर चुका है। ऐसे में जनगणना और एनआरसी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पारदर्शी संवाद, कानूनी स्पष्टता और सभी समुदायों की आशंकाओं को सुनने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करने की चुनौती भी है कि कोई भी प्रशासनिक निर्णय राज्य में पहले से मौजूद सामाजिक तनाव को और गहरा न करे।