नई दिल्ली। भाजपा में संगठनात्मक स्तर पर हुए बदलावों के बाद अब राजनीतिक गलियारों में मोदी कैबिनेट के संभावित फेरबदल को लेकर चर्चा तेज हो गई है। पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम के गठन के बाद माना जा रहा है कि केंद्र सरकार में भी जिम्मेदारियों का नए सिरे से बंटवारा किया जा सकता है। हालांकि, किस मंत्री को हटाया जाएगा या किसे नई जिम्मेदारी मिलेगी, इस पर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। आगामी विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बनाने की रणनीति पर भी नजर है। ऐसे में संभावित कैबिनेट फेरबदल में नए चेहरों को जगह देने के साथ-साथ कुछ मंत्रियों के विभाग बदलने या उनकी जिम्मेदारियां कम करने की संभावना जताई जा रही है। मौजूदा समय में मोदी सरकार में कुल 69 मंत्री हैं, जबकि संवैधानिक व्यवस्था के तहत केंद्र में अधिकतम 81 मंत्री हो सकते हैं। यानी फिलहाल करीब 12 पदों की गुंजाइश मौजूद है। हालांकि, सभी रिक्त पदों को एक साथ भरने की संभावना कम मानी जा रही है।
संगठन में बदलाव के बाद कैबिनेट पर नजर
भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की नई राष्ट्रीय टीम में 65 सदस्यों को जिम्मेदारियां दिए जाने के बाद कैबिनेट फेरबदल की अटकलों को और हवा मिली है। राजनीतिक विश्लेषण में एक महत्वपूर्ण पहलू भाजपा का 'एक व्यक्ति, एक पद' का सिद्धांत भी माना जा रहा है। यदि इस सिद्धांत को व्यापक रूप से लागू किया जाता है, तो ऐसे कुछ नेताओं की भूमिका पर सवाल उठ सकते हैं, जो सरकार में मंत्री होने के साथ-साथ संगठन में भी महत्वपूर्ण पद संभाल रहे हैं। हालांकि, चुनावी परिस्थितियों और राजनीतिक जरूरतों को देखते हुए पार्टी कुछ मामलों में इस सिद्धांत से अलग रणनीति भी अपना सकती है।
6-7 नए चेहरों को मिल सकता है मौका
संभावित फेरबदल को लेकर माना जा रहा है कि मोदी सरकार में करीब 6 से 7 नए चेहरे शामिल किए जा सकते हैं। इनमें युवा नेताओं के साथ-साथ ऐसे नेताओं को भी जगह मिलने की संभावना जताई जा रही है, जिनका संबंधित राज्यों में राजनीतिक प्रभाव है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ युवा नेता अनुराग ठाकुर का नाम भी संभावित दावेदारों में चर्चा में है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों को कैबिनेट में बेहतर प्रतिनिधित्व देने की रणनीति अपनाई जा सकती है। खासकर उन राज्यों को प्राथमिकता मिल सकती है जहां आगामी चुनाव या 2029 के लोकसभा चुनाव के लिहाज से पार्टी संगठन को मजबूत करना चाहती है।
पीयूष गोयल के भविष्य पर भी चर्चा
संभावित कैबिनेट फेरबदल में सबसे अधिक चर्चा उन नेताओं को लेकर है जिन्हें भाजपा संगठन में भी अहम जिम्मेदारी दी गई है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल को भाजपा का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। ऐसे में 'एक व्यक्ति, एक पद' की नीति के आधार पर उनके मंत्री पद को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि, अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि गोयल को मंत्रिमंडल से हटाया जा रहा है। उनका अनुभव और केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालने की भूमिका भी इस पूरे समीकरण में अहम मानी जाती है। यही वजह है कि उनके मामले में अंतिम तस्वीर पार्टी के फैसले के बाद ही साफ होगी।
हर्ष मल्होत्रा भी संगठन और सरकार दोनों में जिम्मेदारी संभाल रहे
दिल्ली भाजपा में संगठनात्मक बदलाव के तहत हर्ष मल्होत्रा को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। वह केंद्र में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग और कॉरपोरेट मामलों से जुड़े राज्य मंत्री भी हैं। ऐसे में उनके सामने भी संगठन और सरकार की दोहरी जिम्मेदारी का सवाल खड़ा होता है। अगर भाजपा संगठन और सरकार में अलग-अलग नेताओं को जिम्मेदारी देने की रणनीति अपनाती है, तो मंत्रिमंडल में बदलाव संभव है। हालांकि, दिल्ली की राजनीति और केंद्र में उनके मौजूदा दायित्वों को देखते हुए अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व की रणनीति पर निर्भर करेगा।
पंकज चौधरी के मामले में चुनावी समीकरण महत्वपूर्ण
केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी भी संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा की कमान दी गई है। इस लिहाज से उनके सामने भी 'एक व्यक्ति, एक पद' का सवाल उठ सकता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव इस पूरे समीकरण को बदल सकते हैं। राजनीतिक चर्चाओं के मुताबिक, चुनावी जरूरत को देखते हुए भाजपा उन्हें फिलहाल केंद्र सरकार में बनाए रखने का फैसला कर सकती है, ताकि संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल का लाभ पार्टी को मिल सके।
हरदीप पुरी की स्थिति पर भी नजर
केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी को लेकर संभावित बदलाव की चर्चा की वजह संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उनका राज्यसभा कार्यकाल बताया जा रहा है। उनका मौजूदा राज्यसभा कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त होने वाला है। अभी तक उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजे जाने को लेकर कोई स्पष्ट संकेत सामने नहीं आया है। ऐसे में अगर उनकी संसद सदस्यता आगे नहीं बढ़ती है, तो पेट्रोलियम मंत्रालय के नेतृत्व को लेकर बदलाव की संभावना बन सकती है। पुरी के कार्यकाल के दौरान पेट्रोलियम क्षेत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले हुए हैं। हालांकि, ईंधन में एथेनॉल मिश्रण को लेकर सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहस में सरकार की नीतियों पर सवाल उठते रहे हैं। इसी वजह से संभावित फेरबदल में पेट्रोलियम मंत्रालय को लेकर भी खास नजर बनी हुई है।
क्या नितिन गडकरी का विभाग बदलेगा?
कैबिनेट फेरबदल की चर्चा में नितिन गडकरी का नाम भी सामने आ रहा है, लेकिन उनका मामला दूसरे नेताओं से काफी अलग है। पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को लेकर पिछले कुछ समय से सार्वजनिक स्तर पर बहस चल रही है। इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर भी काफी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का नाम इस बहस में इसलिए आता रहा है क्योंकि वह सड़क परिवहन और ऑटोमोबाइल से जुड़े मामलों पर लगातार मुखर रहे हैं। हालांकि, एथेनॉल नीति सीधे तौर पर केवल सड़क परिवहन मंत्रालय का विषय नहीं है। इसके बावजूद इस मुद्दे से जुड़ी सार्वजनिक नाराजगी का राजनीतिक असर अलग-अलग स्तर पर दिखाई देता रहा है। यही कारण है कि सवाल उठ रहा है कि क्या संभावित फेरबदल में गडकरी का विभाग बदला जा सकता है?
गडकरी को लेकर बदलाव की संभावना क्यों कम मानी जा रही?
राजनीतिक जानकारों के एक वर्ग का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में नितिन गडकरी को कैबिनेट से हटाना या उनका मंत्रालय बदलना भाजपा के लिए जरूरी नहीं होगा। गडकरी सरकार के सबसे अनुभवी और प्रभावशाली मंत्रियों में शामिल हैं। सड़क और राजमार्ग क्षेत्र में उनकी सक्रियता के अलावा भाजपा और संघ परिवार के भीतर भी उनकी अलग राजनीतिक पहचान है। ऐसे में उनके विभाग में अचानक बदलाव को राजनीतिक तौर पर अलग संदेश के रूप में देखा जा सकता है। इसलिए संभावित फेरबदल में गडकरी को यथास्थिति में रखने की संभावना को भी मजबूत माना जा रहा है।
महाराष्ट्र से श्रीकांत शिंदे का नाम चर्चा में
संभावित कैबिनेट विस्तार में महाराष्ट्र से श्रीकांत शिंदे का नाम भी चर्चा में है। श्रीकांत शिंदे, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे के बेटे हैं और लोकसभा सांसद रह चुके हैं। भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना महाराष्ट्र में सहयोगी हैं। ऐसे में श्रीकांत शिंदे को केंद्र सरकार में जिम्मेदारी देने को दोनों दलों के बीच राजनीतिक समन्वय मजबूत करने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। महाराष्ट्र में पिछले विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा और शिवसेना के बीच समीकरणों पर काफी चर्चा हुई थी। एकनाथ शिंदे की जगह देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री बनने और शिंदे के उपमुख्यमंत्री पद संभालने के बाद भी दोनों दलों के बीच राजनीतिक संबंधों को लेकर समय-समय पर अलग-अलग अटकलें सामने आती रही हैं। ऐसे में कैबिनेट विस्तार भाजपा के लिए सहयोगी दल के साथ संबंधों को और मजबूत करने का एक अवसर हो सकता है।
चुनावी राज्यों को मिल सकता है ज्यादा प्रतिनिधित्व
कैबिनेट फेरबदल केवल मंत्रियों को हटाने या नए नाम शामिल करने तक सीमित नहीं रह सकता। इसके पीछे क्षेत्रीय और चुनावी समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों से मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की संभावना की चर्चा है। खासकर उत्तर प्रदेश पर पार्टी का विशेष फोकस रहने की संभावना है, क्योंकि राज्य का लोकसभा चुनावों में बड़ा महत्व है। इसके अलावा युवा नेताओं को केंद्र में जगह देकर पार्टी भविष्य की राजनीतिक टीम तैयार करने की दिशा में भी आगे बढ़ सकती है।
मंत्रियों के विभागों में भी हो सकता है बदलाव
कैबिनेट में बदलाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मंत्रालयों के पुनर्वितरण से जुड़ा हो सकता है। मौजूदा सरकार में कुछ मंत्रियों के पास एक से अधिक मंत्रालयों की जिम्मेदारी है। ऐसे में नए मंत्रियों के आने पर मंत्रालयों का बोझ अलग-अलग नेताओं के बीच बांटा जा सकता है। इससे न सिर्फ नए चेहरों को जिम्मेदारी देने का रास्ता खुलेगा, बल्कि बड़े मंत्रालयों के कामकाज पर भी ज्यादा फोकस किया जा सकेगा।
अभी अंतिम फैसला नहीं, अटकलों का दौर जारी
हालांकि कैबिनेट फेरबदल को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज है, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि किस मंत्री को हटाया जाएगा, किसे बरकरार रखा जाएगा या किसे कौन-सा मंत्रालय मिलेगा, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। फिलहाल सामने आ रही जानकारियां राजनीतिक सूत्रों, संगठनात्मक बदलावों और संभावित चुनावी रणनीति पर आधारित अटकलों से जुड़ी हैं। अंतिम तस्वीर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेतृत्व के फैसले के बाद ही साफ होगी।