नई दिल्ली. भारत की नई आतंकवाद-रोधी रणनीति ‘प्रहार’ का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका सक्रिय और खुफिया जानकारी आधारित दृष्टिकोण है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद को बताया है कि सरकार इसे एक साथ लागू करने के बजाय क्रमिक और चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाएगी। फरवरी 2026 में जारी की गई यह नीति देश की पहली सार्वजनिक रूप से घोषित व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति एवं रणनीति है, जिसका उद्देश्य आतंकवादी हमलों को रोकने से लेकर हमले के बाद समाज की पुनर्बहाली तक एक समग्र ढांचा तैयार करना है।
‘प्रहार’ का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत लंबे समय से सीमापार आतंकवाद, कट्टरपंथ, आतंकवादी नेटवर्क के बदलते तौर-तरीकों और तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल जैसी चुनौतियों का सामना करता रहा है। नई रणनीति इन अलग-अलग चुनौतियों को एक साझा राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे में जोड़ने का प्रयास करती है। इसका मूल विचार यह है कि आतंकवाद से मुकाबला केवल किसी घटना के बाद सुरक्षा बलों की कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि खुफिया सूचना, रोकथाम, कानून, वित्तीय निगरानी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सामाजिक भागीदारी को एक साथ जोड़ा जाए।
सात स्तंभों पर खड़ी है ‘प्रहार’ की पूरी रणनीति
‘प्रहार’ को सात प्रमुख स्तंभों के आधार पर तैयार किया गया है। इनमें आतंकवादी हमलों की रोकथाम, खतरे के अनुरूप तेज और संतुलित प्रतिक्रिया, सरकारी तंत्र की आंतरिक क्षमताओं को एकजुट करना, मानवाधिकार एवं कानून के शासन पर आधारित कार्रवाई, आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियों और कट्टरपंथ को कम करना, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी प्रयासों के साथ तालमेल तथा पूरे समाज की भागीदारी से पुनर्बहाली और मजबूती शामिल है।
इन सात स्तंभों को केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा गया है। नीति में आतंकवाद के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को कमजोर करने की सोच दिखाई देती है। यानी आतंकवादी संगठन, उनके वित्तीय स्रोत, हथियारों और सुरक्षित ठिकानों के नेटवर्क, कट्टरपंथ फैलाने वाली गतिविधियां तथा अंतरराष्ट्रीय संपर्क—इन सभी पर एक साथ काम करने का लक्ष्य रखा गया है। यही व्यापक दृष्टिकोण ‘प्रहार’ को पहले से मौजूद विभिन्न कानूनों और सुरक्षा व्यवस्थाओं को एक साझा राष्ट्रीय नीति के रूप में जोड़ने वाला दस्तावेज बनाता है।
खुफिया सूचना से लेकर कमांड व्यवस्था तक होगा तेज तालमेल
रणनीति के तहत विभिन्न सरकारी और सुरक्षा एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान को और अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया है। बहु-एजेंसी केंद्र यानी एमएसी के माध्यम से खुफिया सूचनाओं को साझा करने की व्यवस्था को मजबूत करने की बात कही गई है। इसके साथ ही महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और राज्य पुलिस तथा केंद्रीय विशेष बलों के बीच तेज एवं समन्वित कार्रवाई की व्यवस्था को भी रणनीति में प्रमुख स्थान दिया गया है।
इस व्यवस्था में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड जैसी विशेषीकृत केंद्रीय इकाइयों और राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल महत्वपूर्ण होगा। आतंकवादी घटनाएं अक्सर एक राज्य या एक एजेंसी की सीमा तक सीमित नहीं रहतीं। ऐसे में यदि किसी खतरे की सूचना एक स्थान पर मिलती है तो उसका विश्लेषण, सत्यापन और आवश्यक कार्रवाई अलग-अलग स्तरों पर तेजी से हो सके, यही ‘प्रहार’ के सक्रिय सुरक्षा ढांचे की मूल आवश्यकता है।
आतंक के पैसे पर चोट, क्रिप्टो और डार्क वेब भी निगरानी में
आधुनिक आतंकवाद का एक महत्वपूर्ण आधार उसका वित्तीय नेटवर्क है। इसलिए ‘प्रहार’ में आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने को भी केंद्रीय स्थान दिया गया है। सरकार के अनुसार रणनीति के तहत क्रिप्टो वॉलेट की निगरानी, डार्क वेब के माध्यम से धन जुटाने वाले नेटवर्क पर कार्रवाई और केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से संदिग्ध संपत्तियों को जब्त करने जैसे उपायों पर जोर दिया जाएगा।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल तकनीक ने आतंकवादी नेटवर्क को धन जुटाने और उसे अलग-अलग माध्यमों से स्थानांतरित करने के नए रास्ते उपलब्ध कराए हैं। पारंपरिक बैंकिंग प्रणाली के बाहर होने वाले लेनदेन और डिजिटल माध्यमों के दुरुपयोग की पहचान करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती है। ‘प्रहार’ इस चुनौती का मुकाबला वित्तीय निगरानी को व्यापक आतंकवाद-रोधी व्यवस्था का हिस्सा बनाकर करने की कोशिश करता है। रणनीति को वित्तीय कार्रवाई कार्यबल यानी एफएटीएफ के वैश्विक मानकों के अनुरूप रखने की बात भी कही गई है।
कट्टरपंथ रोकने में समाज की भागीदारी पर भी जोर
‘प्रहार’ का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि आतंकवाद को केवल सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं देखा गया है। रणनीति में उन परिस्थितियों को कम करने पर जोर दिया गया है जो कट्टरपंथ और आतंकवाद को बढ़ावा दे सकती हैं। इसके लिए समुदाय की भागीदारी वाले मॉड्यूल और सामाजिक स्तर पर सहयोग की व्यवस्था विकसित करने की बात सामने आई है।
यह दृष्टिकोण आतंकवाद के खिलाफ दीर्घकालिक लड़ाई में महत्वपूर्ण माना जा सकता है, क्योंकि किसी भी आतंकी नेटवर्क को केवल उसके सक्रिय सदस्यों की गिरफ्तारी या उसके ठिकानों पर कार्रवाई से पूरी तरह समाप्त करना कठिन होता है। भर्ती, कट्टरपंथी विचारों का प्रसार और सामाजिक स्तर पर समर्थन की संभावनाओं को रोकना भी उतना ही आवश्यक है। इसी कारण रणनीति के अंतिम स्तंभ में पूरे समाज की भागीदारी के माध्यम से पुनर्बहाली और सामाजिक मजबूती को स्थान दिया गया है।
मानवाधिकार और कानून का शासन भी रणनीति का हिस्सा
आतंकवाद के खिलाफ कठोर कार्रवाई के साथ ‘प्रहार’ मानवाधिकार और कानून के शासन को भी अपने प्रमुख सिद्धांतों में शामिल करती है। आधिकारिक नीति में स्पष्ट किया गया है कि भारत आतंकवाद को किसी विशेष धर्म, जातीयता, राष्ट्रीयता या सभ्यता से नहीं जोड़ता और हिंसा को किसी भी उद्देश्य के लिए उचित नहीं मानता। इसी आधार पर आतंकवाद के प्रति शून्य-सहिष्णुता की नीति को आगे बढ़ाने की बात कही गई है।
यह संतुलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आतंकवाद-रोधी कार्रवाई में सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक शासन की एक महत्वपूर्ण कसौटी है। ‘प्रहार’ में कानून आधारित प्रक्रियाओं का उल्लेख इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। इससे रणनीति का उद्देश्य केवल कठोर सुरक्षा कार्रवाई तक सीमित न रहकर संस्थागत और कानूनी ढांचे के भीतर आतंकवाद से मुकाबला करना दिखाई देता है।
चरणबद्ध क्रियान्वयन से होगी रणनीति की असली परीक्षा
सरकार ने स्पष्ट किया है कि ‘प्रहार’ को एक साथ पूरी तरह लागू करने के बजाय प्रगतिशील और चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा। शुरुआती चरण में संस्थागत ढांचे और विभिन्न प्रणालियों के एकीकरण को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके बाद परिणामों का आकलन बहुस्तरीय निगरानी व्यवस्था के माध्यम से किया जाएगा। सरकार के अनुसार नियमित समीक्षा और मूल्यांकन के अलावा राष्ट्रीय जांच एजेंसी के तत्वावधान में आयोजित होने वाला वार्षिक आतंकवाद-रोधी सम्मेलन भी रणनीति की समीक्षा और उसे मजबूत करने का महत्वपूर्ण मंच होगा।
विशेषज्ञों के बीच ‘प्रहार’ को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल इसके दस्तावेज से जमीन पर क्रियान्वयन तक पहुंचने का है। विश्लेषणों में यह भी रेखांकित किया गया है कि रणनीति में शामिल कई व्यवस्थाएं और कानून पहले से अलग-अलग रूपों में मौजूद हैं; नई बात यह है कि उन्हें एक सार्वजनिक राष्ट्रीय नीति एवं रणनीति के भीतर व्यवस्थित रूप से जोड़ा गया है। इसलिए आने वाले समय में इसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल, खुफिया साझेदारी, तकनीकी क्षमता, वित्तीय निगरानी और स्थानीय स्तर पर कट्टरपंथ-रोधी प्रयास कितनी प्रभावी तरह से जमीन पर उतरते हैं।
क्या बदलेगी आतंकवाद से लड़ाई की दिशा?
‘प्रहार’ को भारत की आतंकवाद-रोधी व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण संस्थागत बदलाव के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसकी सफलता केवल नीति के सात स्तंभों या दस्तावेज की व्यापकता से तय नहीं होगी। असली चुनौती इन सिद्धांतों को राज्यों, केंद्रीय एजेंसियों, पुलिस बलों, खुफिया तंत्र और प्रशासनिक संस्थाओं के रोजमर्रा के कामकाज में प्रभावी ढंग से लागू करने की होगी।
यदि वास्तविक समय की खुफिया साझेदारी, तेज प्रतिक्रिया व्यवस्था, आतंक वित्तपोषण पर प्रभावी प्रहार, तकनीकी निगरानी, कट्टरपंथ की रोकथाम और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को एक साझा ढांचे में सफलतापूर्वक जोड़ा जाता है, तो भारत की आतंकवाद-रोधी नीति अधिक सक्रिय और पूर्व-रोकथाम आधारित हो सकती है। फिलहाल सरकार का चरणबद्ध क्रियान्वयन का फैसला इस बात का संकेत है कि ‘प्रहार’ को केवल एक नीति दस्तावेज नहीं, बल्कि समय के साथ विकसित होने वाली राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के रूप में लागू करने की तैयारी है।