नई दिल्ली. चीनी की कीमतों में हालिया तेजी ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। घरेलू बाजार में एक सप्ताह के भीतर चीनी की कीमतों में करीब 1.77 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, ऐसे में केंद्र सरकार ने बाजार में इसकी उपलब्धता बनाए रखने के लिए सितंबर के पहले पखवाड़े का बिक्री कोटा तय कर दिया है। 1 सितंबर 2026 से 15 सितंबर 2026 तक चीनी मिलों को कुल 13 लाख टन चीनी बाजार में बेचने की अनुमति दी गई है। सरकार की कोशिश है कि मांग के मुकाबले आपूर्ति पर्याप्त बनी रहे और त्योहारी मौसम में कीमतों पर अचानक दबाव न बढ़े। खास तौर पर घरेलू उपभोक्ताओं के साथ खाद्य उद्योग और मिठाई कारोबार के लिए भी चीनी की स्थिर कीमत महत्वपूर्ण है, क्योंकि त्योहारों के दौरान इसकी मांग सामान्य दिनों की तुलना में तेजी से बढ़ सकती है।
मिलों के लिए बदला रिलीज ऑर्डर का नियम
सरकार ने केवल बिक्री कोटा तय नहीं किया है, बल्कि चीनी मिलों को आवंटित मात्रा बाजार में उतारने की समयसीमा भी काफी कम कर दी है। नए प्रावधान के अनुसार रिलीज ऑर्डर जारी होने के बाद संबंधित चीनी मिल को अपने आवंटित कोटे की बिक्री 7 दिनों के भीतर करनी होगी। पहले मिलों को इसके लिए करीब 1 महीने तक का समय मिलता था, लेकिन अब सरकार ने इसे घटाकर सिर्फ 1 सप्ताह कर दिया है। इस बदलाव का सीधा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मिलों में बड़ी मात्रा में चीनी लंबे समय तक जमा न रहे और बाजार में उसकी उपलब्धता बनी रहे। सरकार को उम्मीद है कि तेजी से स्टॉक जारी होने से आपूर्ति में कृत्रिम कमी पैदा करने या कीमतों पर दबाव बढ़ाने की संभावना को सीमित किया जा सकेगा।
रिलीज ऑर्डर से नियंत्रित होती है बाजार में सप्लाई
चीनी के बाजार में सरकारी रिलीज ऑर्डर की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके जरिए यह नियंत्रित किया जाता है कि चीनी मिलें एक निश्चित अवधि में कितनी मात्रा बाजार में बेच सकती हैं। अगर सभी मिलों को बिना किसी नियंत्रण के एक साथ बड़ी मात्रा में चीनी बेचने की अनुमति मिल जाए तो बाजार में अचानक आपूर्ति बढ़ सकती है और कीमतों में तेज गिरावट आ सकती है। इसके उलट, अगर मिलों में बड़ी मात्रा में स्टॉक लंबे समय तक पड़ा रहे और बाजार में उपलब्धता कम हो जाए तो मांग और आपूर्ति का असंतुलन कीमतों को ऊपर ले जा सकता है। इसलिए सरकार कोटा और रिलीज ऑर्डर के माध्यम से बाजार में चीनी की उपलब्धता को संतुलित रखने की कोशिश करती है। मौजूदा बदलाव इसी संतुलन को अधिक तेजी से लागू करने की दिशा में उठाया गया कदम है।
जमाखोरी पर भी नजर, त्योहारी मांग से पहले तैयारी
चीनी की कीमत बढ़ने पर बाजार में जमाखोरी की आशंका भी बढ़ जाती है। कारोबारी या मिलें यदि कीमतों में आगे और तेजी की उम्मीद में स्टॉक को लंबे समय तक रोककर रखें, तो खुले बाजार में उपलब्धता कम हो सकती है। इससे मांग स्थिर रहने के बावजूद कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बढ़ सकता है। सरकार का 7 दिन में आवंटित कोटा बाजार में उतारने का फैसला इसी जोखिम को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। सितंबर के बाद देश में त्योहारी गतिविधियां तेज होने लगेंगी और मिठाई, बेकरी, पेय पदार्थ तथा अन्य खाद्य उत्पादों में चीनी की मांग बढ़ सकती है। ऐसे में सरकार पहले से यह सुनिश्चित करना चाहती है कि त्योहारी मांग बढ़ने के दौरान बाजार में पर्याप्त स्टॉक मौजूद रहे और उपभोक्ताओं पर कीमतों का अतिरिक्त बोझ न पड़े।
ब्राजील से आयात के जरिए भी बढ़ाई जा रही उपलब्धता
घरेलू आपूर्ति पर दबाव कम करने के लिए सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बाजार से चीनी की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाए हैं। ब्राजील से चीनी की खरीद इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। वैश्विक बाजार से अतिरिक्त आपूर्ति मिलने पर घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ सकती है और स्थानीय कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि आयात का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय कीमतों, शिपमेंट की समयसीमा और घरेलू मांग जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगा। इसलिए केवल आयात के बजाय घरेलू मिलों के स्टॉक और बाजार में उनकी बिक्री की गति पर भी सरकार की नजर बनी हुई है। दोनों स्तरों पर आपूर्ति को संतुलित रखने की कोशिश का उद्देश्य यही है कि आने वाले महीनों में चीनी की कीमतों में असामान्य तेजी को रोका जा सके।
क्या उपभोक्ताओं को मिलेगी सस्ती चीनी?
सरकार के नए कोटा और बिक्री समयसीमा का अंतिम असर बाजार में वास्तविक आपूर्ति और मांग के संतुलन पर निर्भर करेगा। यदि 13 लाख टन का निर्धारित कोटा तय समय के भीतर बाजार में पहुंचता है और आयातित चीनी की अतिरिक्त आपूर्ति भी समय पर उपलब्ध होती है, तो बाजार में स्टॉक की स्थिति बेहतर हो सकती है। इससे कीमतों में तेजी पर रोक लगने और त्योहारी सीजन में अचानक महंगाई बढ़ने की आशंका कम हो सकती है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि नए नियम लागू होते ही खुदरा कीमतों में तत्काल बड़ी गिरावट देखने को मिले, क्योंकि बाजार भाव पर उत्पादन, मांग, अंतरराष्ट्रीय कीमत और व्यापारिक मार्जिन जैसे कई कारकों का असर पड़ता है। फिलहाल सरकार का जोर कीमतों को तेजी से बढ़ने से रोकने और बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने पर है।