नई दिल्ली - भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक है, फिर भी घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में अचानक तेजी देखने को मिल रही है। पिछले दो महीनों में घरेलू चीनी कीमतों में करीब 40 फीसदी तक उछाल आया है। सरकार ने अब कीमतों पर काबू पाने के लिए 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह करीब एक दशक में भारत का पहला बड़ा चीनी आयात कदम है।
आखिर चीनी महंगी क्यों हुई?
सरकार के मुताबिक चीनी की कीमत बढ़ने की वजह सिर्फ इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने या चीनी का इस्तेमाल नहीं है। इस बार घरेलू चीनी उत्पादन अनुमान से कम रहने, मौसम की वजह से फसल को नुकसान, त्योहारों से पहले मांग बढ़ने, वैश्विक सप्लाई में कमी और कुछ कारोबारियों की जमाखोरी व सट्टेबाजी ने कीमतों पर दबाव बढ़ाया है। सरकार ने मौजूदा सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान करीब 306 लाख टन बताया है, जो राज्यों के शुरुआती 343 लाख टन के अनुमान से लगभग 11 फीसदी कम है।
भारत कितनी चीनी पैदा करता है?
भारत में चीनी का उत्पादन साल-दर-साल बदलता रहता है। 2025-26 सीजन के लिए उद्योग संगठन ISMA के शुरुआती अनुमान में सकल उत्पादन करीब 3.44 करोड़ टन रहने का अनुमान था। हालांकि, मौजूदा सरकारी आकलन उत्पादन को करीब 3.06 करोड़ टन तक मान रहा है। यही गिरावट घरेलू बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ाने वाली प्रमुख वजह है।
देश में कितनी चीनी खपत होती है?
भारत में चीनी की घरेलू खपत करीब 2.8-2.9 करोड़ टन सालाना के आसपास रहती है। ISMA के 2025-26 के अनुमान में घरेलू खपत करीब 2.85 करोड़ टन बताई गई थी। यानी उत्पादन और खपत के बीच अंतर बहुत बड़ा नहीं है। उत्पादन में थोड़ी भी कमी आने पर बाजार में कीमतों पर दबाव तेजी से बढ़ सकता है।
क्या इथेनॉल की वजह से चीनी महंगी हुई?
सरकार ने इससे साफ इनकार किया है। खाद्य मंत्रालय के मुताबिक इथेनॉल के लिए डायवर्ट होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 फीसदी था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9 फीसदी रह गया है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि अब देश में बनने वाले इथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अनाज, खासकर मक्का, से आता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2022-23 में इथेनॉल के लिए करीब 43 लाख टन, 2023-24 में 24 लाख टन और 2024-25 में करीब 34 लाख टन चीनी डायवर्ट की गई थी।
सरकार ने क्या कदम उठाया?
बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। आयात की अनुमति 31 अक्टूबर तक रहेगी। सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में अतिरिक्त सप्लाई पहुंचाकर कीमतों का दबाव कम करना है। इसके अलावा सरकार ने चीनी कारोबारियों पर 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक स्टॉक होल्डिंग लिमिट भी लागू की है, ताकि जमाखोरी और कृत्रिम कमी पैदा करने की कोशिशों पर रोक लगाई जा सके।
इसलिए चीनी की मौजूदा महंगाई को सिर्फ ‘इथेनॉल के लिए चीनी इस्तेमाल होने’ से जोड़ना सही तस्वीर नहीं देता। इस समय कम उत्पादन + त्योहारों से पहले बढ़ती मांग + मौसम का असर + सप्लाई पर दबाव + जमाखोरी/सट्टेबाजी का संयुक्त असर कीमतों को ऊपर ले जा रहा है। सरकार के शुल्क-मुक्त आयात और स्टॉक नियंत्रण जैसे कदमों से आने वाले समय में कीमतों पर दबाव कम होने की उम्मीद है।