नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन में हेल्पर पद पर महिला को सिर्फ लिंग के आधार पर नकारे जाने के मामले में सख्त टिप्पणी की है। चार दशक पुरानी लड़ाई में सुमित्रा को मुआवजा देते हुए अदालत ने कहा कि सुरक्षा के नाम पर महिलाओं को अवसरों से वंचित नहीं किया जा सकता।
सुमित्रा की चार दशक लंबी लड़ाई
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाले लैंगिक भेदभाव और सदियों पुरानी रूढ़िवादी सोच पर एक सख्त टिप्पणी की है। इससे भारत के सामाजिक और श्रम बाजार के ढांचे पर गंभीर बहस शुरू हो गई है। यह मामला सिर्फ चार दशक पुरानी एक कानूनी लड़ाई के पटाक्षेप भर का नहीं है बल्कि यह इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि हमारे समाज में सुरक्षा और संरक्षण के छद्म आवरण के पीछे महिलाओं को समान अवसरों से वंचित करने की मानसिकता कितनी गहरी रही है। सुप्रीम कोर्ट के सामने आया यह ऐतिहासिक मामला 1988 का है। हरियाणा की रहने वाली सुमित्रा ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के करनाल स्थित एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में हेल्पर पद के लिए आवेदन किया था। वे निर्धारित योग्यता पूरी करती थीं। चयन प्रक्रिया के अंतिम 49 उम्मीदवारों में उनका नाम शामिल था। इनमें से 43 पुरुष उम्मीदवारों को नियुक्ति दे दी गई लेकिन सुमित्रा को केवल इसलिए नकार दिया गया क्योंकि वे महिला थीं और उनके काम में भारी एलपीजी सिलेंडर उठाना शामिल था।
अदालत का करारा प्रहार
अदालत ने इस संकीर्ण सोच पर गहरा प्रहार करते हुए सवाल उठाया कि जब भारत के करोड़ों घरों में महिलाएं खुद भारी-भरकम गैस सिलेंडर उठाती हैं उसे बदलती हैं और रोजमर्रा के कठिन कार्य करती हैं तो किसी संगठित नौकरी में केवल महिला होने के आधार पर उन्हें अयोग्य कैसे माना जा सकता है। करीब चार दशक लंबी कानूनी जंग के कारण सुमित्रा की नौकरी की उम्र निकल चुकी थी इसलिए शीर्ष अदालत ने उन्हें 12 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया। अदालत का यह फैसला केवल आर्थिक राहत देने तक सीमित नहीं है बल्कि यह उस सामंती मानसिकता पर करारा आघात है जो किसी व्यक्ति की कार्यक्षमता का मूल्यांकन उसके कौशल प्रशिक्षण और योग्यता के बजाय उसके लिंग के आधार पर करती है। योग्यता को पैमाना बनाने पर जोर दिया गया है।
सुरक्षा बनाम अवसर की पतली रेखा
भारतीय समाज और नीतिगत ढांचे में महिलाओं को जोखिम से बचाने और जोखिम का हवाला देकर उन्हें अवसरों से वंचित करने के बीच हमेशा से एक पतली रेखा रही है। अक्सर सुरक्षा और संरक्षण के नाम पर महिलाओं को कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों से दखल से पहले ही बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। हालांकि इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि खतरनाक या जोखिम भरे कामों में सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों को नजरअंदाज किया जाए। लेकिन किसी भी काम के जोखिम को कम करने के लिए आधुनिक तकनीक उचित प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरण मुहैया कराना प्रबंधन और तंत्र की जिम्मेदारी है न कि इसके नाम पर महिला उम्मीदवारों के लिए रोजगार के दरवाजे ही बंद कर देना। यदि किसी काम के लिए आवश्यक योग्यता और शारीरिक क्षमता का मापदंड तय है तो उस पर खरा उतरने वाले हर नागरिक चाहे वह पुरुष हो या महिला को समान अवसर मिलना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय अध्ययन का संदर्भ
रिव्यू ऑफ इकोनामिक स्टडीज में प्रकाशित डेनमार्क के एक अध्ययन का संदर्भ भी इस चर्चा को बल देता है। अध्ययन में पाया गया कि जब कार्यस्थल पर सामाजिक और व्यक्तिगत अनुभवों में बदलाव आता है तो महिलाओं की सापेक्ष कमाई और रोजगार में सकारात्मक वृद्धि होती है। यद्यपि डेनमार्क और भारत की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में बड़ा अंतर है लेकिन यह शोध साबित करता है कि कार्यस्थल पर महिलाओं की क्षमता को लेकर बनी धारणाएं पत्थर की लकीर नहीं हैं। वे मजबूत नीतियों और सामाजिक बदलाव के साथ बदल सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इसी दिशा में मजबूत संकेत दिया है।
समान अवसर की दिशा में कदम
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लैंगिक समानता और योग्यता आधारित चयन की दिशा में महत्वपूर्ण मिसाल है। सुरक्षा के नाम पर भेदभाव को असंवैधानिक ठहराया गया है। प्रबंधन को आधुनिक सुरक्षा उपाय अपनाने और समान अवसर सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सुमित्रा जैसे मामलों में देरी के बावजूद मुआवजा देकर अदालत ने न्याय की मिसाल पेश की है। समाज और संस्थानों को अपनी मानसिकता बदलनी होगी ताकि योग्यता ही एकमात्र पैमाना बने। लिंग के आधार पर दरवाजे बंद करने की प्रथा अब स्वीकार नहीं की जा सकती। यह फैसला आने वाले समय में रोजगार नीतियों को प्रभावित करेगा।