नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए कार्यशील शौचालय और स्वच्छता सुविधाओं की कथित कमी से जुड़ी जनहित याचिका को पहले से इसी विषय पर महत्वपूर्ण फैसला दे चुकी पीठ के सामने रखने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता रीपक कंसल की ओर से रखी गई दलीलों पर सुनवाई की। याचिका में केंद्र सरकार के साथ विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी पक्षकार बनाया गया है। पीठ ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे महत्वपूर्ण हैं और इससे जुड़े कई पहलुओं पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही विस्तृत निर्देश जारी कर चुका है।
पहले के फैसले में मासिक धर्म स्वास्थ्य को मिला संवैधानिक अधिकार का आधार
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने संकेत दिया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इसी तरह के मुद्दों पर व्यापक फैसला सुना चुका है। इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील से उस फैसले और उसमें दिए गए निर्देशों का अध्ययन करने को कहा गया। वकील ने नीति आयोग की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि देश में अब भी 98 हजार से अधिक स्कूलों में छात्राओं के लिए कार्यशील शौचालय उपलब्ध नहीं हैं। इसके बाद पीठ ने कहा कि 30 जनवरी को न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने विस्तृत फैसला दिया था, इसलिए वर्तमान याचिका को उसी पीठ के समक्ष रखना उचित होगा।
30 जनवरी के फैसले में क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने?
30 जनवरी 2026 को दिए गए ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गरिमापूर्ण मासिक धर्म स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा माना था। अदालत ने यह भी रेखांकित किया था कि मासिक धर्म से जुड़ी स्वच्छता सुविधाओं का अभाव लड़कियों की शिक्षा और स्कूल में समान भागीदारी के अधिकार में बाधा बन सकता है। फैसले में शिक्षा के अधिकार, लैंगिक समानता और गरिमापूर्ण जीवन के बीच संबंध को विस्तार से समझाया गया था। अदालत ने माना कि केवल स्कूल में दाखिले का अधिकार पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसा सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण भी जरूरी है जिसमें छात्राएं बिना भेदभाव के अपनी शिक्षा जारी रख सकें।
हर स्कूल में अलग और कार्यशील शौचालय का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने जनवरी के फैसले में केंद्र के साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्कूलों में बुनियादी स्वच्छता सुविधाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा था कि सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी, सभी प्रकार के स्कूलों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग और कार्यशील शौचालय होने चाहिए। इन शौचालयों में उपयोग योग्य पानी की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जानी है। इसका उद्देश्य केवल बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराना भी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के स्कूलों को इन व्यवस्थाओं के दायरे में रखा गया था।
सैनिटरी नैपकिन और स्वच्छता प्रबंधन पर भी जोर
अदालत ने छात्राओं के मासिक धर्म स्वास्थ्य को लेकर केवल शौचालय निर्माण तक सीमित निर्देश नहीं दिए थे। फैसले में स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने और मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन के लिए आवश्यक सुविधाओं से लैस केंद्र स्थापित करने की बात कही गई थी। इसके साथ ही सैनिटरी सामग्री के सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल निस्तारण की व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया गया। प्रत्येक शौचालय इकाई में इस्तेमाल की गई सैनिटरी सामग्री के संग्रह के लिए ढके हुए कूड़ेदान और उनकी नियमित सफाई एवं रखरखाव पर भी जोर दिया गया।
सिर्फ सुविधा नहीं, लड़कियों की शिक्षा से जुड़ा सवाल
इस मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि स्कूलों में शौचालय और मासिक धर्म संबंधी सुविधाओं की कमी सीधे छात्राओं की शिक्षा को प्रभावित कर सकती है। किशोरियों के लिए सुरक्षित शौचालय, पानी, स्वच्छता और मासिक धर्म प्रबंधन की सुविधाएं उपलब्ध न होने पर स्कूल में उनकी नियमित उपस्थिति और पढ़ाई प्रभावित होने का खतरा रहता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने जनवरी के फैसले में इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य को रेखांकित करते हुए मासिक धर्म स्वास्थ्य को शिक्षा और गरिमा से जोड़ा था। इसलिए सोमवार को सामने आया मामला केवल शौचालय निर्माण का प्रशासनिक प्रश्न नहीं, बल्कि लड़कियों के समान शैक्षणिक अवसर और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा विषय भी है।
शिक्षकों की संवेदनशीलता और जागरूकता पर भी अदालत का जोर
सुप्रीम कोर्ट के जनवरी के फैसले में मासिक धर्म और किशोरावस्था से जुड़े स्वास्थ्य विषयों पर जागरूकता बढ़ाने के लिए पाठ्यक्रम और शिक्षक प्रशिक्षण को भी महत्व दिया गया था। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद तथा राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषदों को मासिक धर्म, किशोरावस्था और संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं पर लैंगिक संवेदनशील पाठ्यक्रम विकसित करने की दिशा में काम करने को कहा गया था। अदालत का उद्देश्य मासिक धर्म से जुड़े सामाजिक कलंक और झिझक को कम करना तथा छात्राओं के साथ-साथ शिक्षकों को भी इस विषय पर पर्याप्त रूप से संवेदनशील बनाना था।
अब उसी पीठ के सामने आगे बढ़ेगा मामला
सोमवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने वर्तमान जनहित याचिका को न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका में उठाए गए मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन चूंकि इसी विषय पर पहले ही विस्तृत संवैधानिक निर्देश जारी हो चुके हैं, इसलिए नए मामले की सुनवाई उसी पीठ द्वारा होना अधिक उचित रहेगा। अब आगे की कार्यवाही में यह देखा जा सकता है कि जनवरी में जारी निर्देशों का राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कितना अनुपालन हुआ है और जहां अभी भी छात्राओं के लिए बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं की कमी है, वहां सुधार के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।