नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के उपचार में स्टेम सेल थेरेपी के इस्तेमाल को लेकर केंद्र सरकार से विस्तृत जानकारी तलब की है। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र से पूछा है कि 30 जनवरी के उसके फैसले के बाद इस तरह के उपचार से जुड़े किसी क्लिनिकल ट्रायल के लिए कोई नया आवेदन प्राप्त हुआ है या नहीं। अदालत ने ऐसे सभी स्वीकृत अथवा प्रस्तावित परीक्षणों का विवरण भी प्रस्तुत करने को कहा है। इसके साथ संबंधित संस्थानों के नाम और उनकी मरीजों को समायोजित करने की क्षमता की जानकारी मांगी गई है। अदालत की यह पहल ऐसे समय महत्वपूर्ण है जब ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल उपचार को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण, नियमन और मरीजों की सुरक्षा से जुड़े सवाल लंबे समय से चर्चा में हैं।
पहले से उपचार ले रहे मरीजों पर भी नजर
सुप्रीम कोर्ट ने केवल भविष्य में होने वाले शोध तक अपना ध्यान सीमित नहीं रखा है। पीठ ने केंद्र से यह भी बताने को कहा है कि वे मरीज, जो 30 जनवरी को अदालत के फैसले के समय स्टेम सेल उपचार करा रहे थे, उन्हें विनियमित शोध व्यवस्था में लाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। इस निर्देश का उद्देश्य ऐसे उपचार को अनियंत्रित व्यावसायिक सेवा के रूप में जारी रहने से रोकना और यदि वैज्ञानिक शोध के दायरे में इसकी कोई संभावना है तो उसे निर्धारित नियमों के तहत लाना है। अदालत की चिंता इस बात से जुड़ी दिखाई देती है कि किसी अप्रमाणित या अपर्याप्त रूप से स्थापित उपचार के लिए मरीजों और उनके परिवारों को ऐसे केंद्रों पर निर्भर न रहना पड़े, जहां उपचार की सुरक्षा, प्रभावशीलता और निगरानी को लेकर पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।
नियमित इलाज के तौर पर मान्यता नहीं
अदालत ने जनवरी में स्पष्ट किया था कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के लिए स्टेम सेल थेरेपी को सामान्य चिकित्सकीय सेवा या व्यावसायिक उपचार के रूप में उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। ऐसी थेरेपी को केवल स्वीकृत और निगरानी वाले क्लिनिकल ट्रायल या शोध व्यवस्था के भीतर ही किया जा सकता है। इस रुख का मूल आधार उपचार के वैज्ञानिक प्रमाण और मरीजों की सुरक्षा से जुड़ी सावधानियां हैं। स्टेम सेल आधारित उपचार को लेकर चिकित्सा विज्ञान में कई क्षेत्रों में शोध चल रहा है, लेकिन किसी विशेष बीमारी के लिए प्रयोगात्मक उपचार और स्थापित मानक उपचार के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश इसी अंतर को नियामकीय स्तर पर बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
स्वास्थ्य मंत्रालय की स्वीकृत सूची में ऑटिज्म शामिल नहीं
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार स्टेम सेल थेरेपी को सामान्य उपचार के रूप में सभी रोगों के लिए मंजूरी प्राप्त नहीं है। मंत्रालय द्वारा निर्धारित कुछ विशेष स्थितियों में इसे मानक उपचार के तौर पर अनुमति दी गई है, जबकि अन्य परिस्थितियों में इसका इस्तेमाल केवल शोध के संदर्भ में किया जा सकता है। ऑटिज्म उन स्वीकृत स्थितियों की सूची में शामिल नहीं है, जिनमें स्टेम सेल उपचार को नियमित चिकित्सा सेवा के रूप में अपनाने की अनुमति है। इसका सीधा अर्थ है कि ऑटिज्म के मामले में स्टेम सेल आधारित उपचार को सामान्य मरीज सेवा के रूप में पेश करना मौजूदा नियामकीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं माना जा सकता। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्लिनिकल ट्रायल और शोध संस्थानों का विस्तृत ब्यौरा मांगना विशेष महत्व रखता है।
आईसीएमआर ने भी शोध तक सीमित किया दायरा
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने भी मार्च में स्टेम सेल उपचार के इस्तेमाल को लेकर नियामकीय स्थिति स्पष्ट की थी। उसके अनुसार नियमित चिकित्सा व्यवस्था में स्टेम सेल उपचार केवल स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा मानक उपचार के रूप में स्वीकृत बीमारियों और स्थितियों में ही किया जा सकता है। स्वीकृत सूची से बाहर की स्थितियों में स्टेम सेल थेरेपी केवल शोध के संदर्भ में ही स्वीकार्य है। ऑटिज्म के मामले में यही प्रावधान महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि इस स्थिति के लिए स्टेम सेल उपचार को मानक चिकित्सा पद्धति के तौर पर स्वीकृति नहीं मिली है। ऐसे में किसी मरीज को व्यावसायिक आधार पर यह उपचार उपलब्ध कराए जाने और नियामकीय निगरानी के तहत शोध में शामिल किए जाने के बीच स्पष्ट कानूनी तथा चिकित्सकीय अंतर बना रहता है।
मरीजों की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल
ऑटिज्म से जुड़े उपचार के मामले में मरीजों और उनके परिवारों की उम्मीदें अक्सर उपचार के नए विकल्पों की ओर रहती हैं। इसी कारण ऐसे उपचारों के प्रति सावधानी और वैज्ञानिक जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी उपचार को क्लिनिकल ट्रायल के दायरे में रखने का उद्देश्य केवल उसकी प्रभावशीलता का परीक्षण करना नहीं होता, बल्कि उसकी सुरक्षा, संभावित जोखिम, उपयुक्त खुराक, मरीजों के चयन और दीर्घकालिक परिणामों का व्यवस्थित मूल्यांकन करना भी होता है। स्टेम सेल उपचार जैसे क्षेत्र में यह प्रक्रिया और महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि प्रयोगात्मक उपचार के परिणामों को लेकर पर्याप्त वैज्ञानिक निगरानी जरूरी होती है। सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा रुख इसी व्यापक मरीज-सुरक्षा दृष्टिकोण को कानूनी निगरानी से जोड़ता है।
अदालत के आदेश से शोध व्यवस्था पर बढ़ेगी स्पष्टता
केंद्र से सभी स्वीकृत और प्रस्तावित क्लिनिकल ट्रायल, संबंधित संस्थानों तथा उनकी मरीज क्षमता की जानकारी मांगने से इस क्षेत्र में मौजूद शोध ढांचे की वास्तविक तस्वीर अदालत के सामने आ सकेगी। इससे यह भी स्पष्ट होने की संभावना है कि ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल आधारित उपचार पर भारत में किस स्तर पर शोध चल रहा है और किन संस्थानों के पास उसे नियामकीय मानकों के तहत संचालित करने की क्षमता है। पहले से उपचार ले रहे मरीजों के संबंध में उठाया गया सवाल भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी प्रयोगात्मक उपचार पर अदालत की रोक या नियामकीय सीमा लागू होने के बाद उन मरीजों की स्थिति को स्पष्ट व्यवस्था की जरूरत होती है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी से उपचार, शोध और व्यावसायिक चिकित्सा के बीच सीमाएं अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है।
प्रयोगात्मक उपचार और मानक चिकित्सा में अंतर जरूरी
स्टेम सेल थेरेपी को लेकर वैज्ञानिक अनुसंधान भविष्य में चिकित्सा के कई क्षेत्रों में नए विकल्प खोल सकता है, लेकिन शोध के स्तर पर मौजूद किसी संभावना को तत्काल स्थापित उपचार मान लेना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होता। किसी उपचार को नियमित चिकित्सा सेवा का हिस्सा बनने के लिए कठोर वैज्ञानिक परीक्षण, सुरक्षा मूल्यांकन और नियामकीय स्वीकृति की आवश्यकता होती है। ऑटिज्म के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इसी बुनियादी सिद्धांत को रेखांकित करता है। अदालत अब केंद्र से प्राप्त होने वाली जानकारी के आधार पर यह देखेगी कि मौजूदा शोध व्यवस्था किस स्थिति में है और पहले से उपचार ले रहे मरीजों के हितों की रक्षा के लिए क्या व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं। इस पूरे मामले में वैज्ञानिक प्रमाण, नियामकीय निगरानी और मरीजों की सुरक्षा तीनों को समान महत्व मिलना तय माना जा रहा है।